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Showing posts from July, 2018

PART 12

PART 12 -----------------------  # जीवन_विज्ञान  ----------------------- # 16_संस्कारो_का_विज्ञान  - #भाग - 02 प्राचीनकाल में यह महान दायित्व कुटुम्बियों के साथ-साथ संत, पुरोहित और परिव्राजकों को सौंपा गया था। वे आने वाली पीढ़ियों को सोलह अग्नि पुटों से गुजार कर खरे सोने जैसे व्यक्तित्व में ढालते थे। इस परम्परा का नाम ही संस्कार परम्परा है। जिस तरह अभ्रक, लोहा, सोना, पारद जैसी सर्वथा विषैली धातुएँ शोधने के बाद अमृत तुल्य औषधियाँ बन जाती हैं, उसी तरह किसी समय इस देश में मानवेतर योनियों में से घूमकर आई हेय स्तर की आत्माओं को भी संस्कारों की भट्ठी में तपाकर प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्तित्व के रूप में ढाल दिया जाता था। यह क्रम लाखों वर्ष चलता रहा उसी के फलस्वरूप यह देश 'स्वर्गादप गरीयसी' बना रहा, आज संस्कारों को प्रचलन समाप्त हो गया, तो पथ भूले बनजारे की तरह हमारी पीढ़ियाँ कितना भटक गयीं और भटकती जा रही हैं, यह सबके सामने है। आज के समय में जो व्यावहारिक नहीं है या नहीं जिनकी उपयोगिता नहीं रही, उन्हें छोड़ दें, तो शेष सभी संस्कार अपनी वैज्ञानिक महत्ता से सारे समाज को नई दिशा द...

PART11

PART 11 # 16_संस्कारो_का_विज्ञान  - प्राचीन काल में ऋषियों ने संस्कारों का निर्माण मनुष्य के समग्र व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए किया था। यह विश्वास किया जाता था कि संस्कारों के अनुष्ठान से व्यक्ति में दैवी गुणों का आविर्भाव हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को अनुशासित किया जाना उसकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है। आध्यात्मिक उन्नति मानव के चरम विकास का पर्याय है संस्कारों से इसी की पूर्ति होती है। सनातन धर्म में व्यक्ति के जीवन के लिए जो भी नियम बनाएं गए हैं, उनका वैज्ञानिक आधार भी है, जैसे जीवन को चार आश्रमों में बांटा गया है, इन आश्रमों में रहते हुए मनुष्य को 16 प्रकार के संस्कारों का पालन करना अनिवार्य माना गया है। जीवन के इन नियमों को बनाने का श्रेय महर्षि वेदव्यास को जाता है, मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक पवित्र सोलह संस्कार बनाएं गए हैं , और इसे मैं जीवन विज्ञान कहता हूँ ।। सनातन संस्कृति के वैदिक साहित्यो में महर्षि अंगिरा ने 25 संस्कारों का जिक्र किया है, जबकि, कुछ जगहों पर मनुष्य जीवन के 48 तरीके बताए गए हैं, लेकिन इन सबमें सबसे सटीक विवरण महर्षि वेद ...

PART 10

PART 10 ----------------------  # सर्वेक्षण_विज्ञान  ---------------------- सर्वेक्षण (Surveying) उस कलात्मक विज्ञान को कहते हैं जिससे पृथ्वी की सतह पर स्थित बिंदुओं की समुचित माप लेकर, किसी पैमाने पर आलेखन (plotting) करके, उनकी सापेक्ष क्षैतिज और ऊर्ध्व दूरियों का कागज या, दूसरे माध्यम पर सही-सही ज्ञान कराया जा सके। इस प्रकार का अंकित माध्यम लेखाचित्र या मानचित्र कहलाता है। ऐसी आलेखन क्रिया की संपन्नता और सफलता के लिए रैखिक और कोणीय, दोनों ही माप लेना आवश्यक होता है। सिद्धांतत: आलेखन क्रिया के लिए रेखिक माप का होना ही पर्याप्त है। मगर बहुधा ऊँची नीची भग्न भूमि पर सीधे रैखिक माप प्राप्त करना या तो असंभव होता है, या इतना जटिल होता है कि उसकी यथार्थता संदिग्ध हो जाती है। ऐसे क्षेत्रों में कोणीय माप रैखिक माप के सहायक अंग बन जाते हैं और गणितीय विधियों से अज्ञात रैखिक माप ज्ञात करना संभव कर देते हैं। इस प्रकार सर्वेक्षण में तीन कार्य सम्मिलित होते हैं - 1 - क्षेत्र अध्ययन 2 - मानचित्रण 3 - अभिकलन # आधुनिक_विज्ञान  - सबसे प्राचीन प्रमाण ईसा से 370 वर्ष पूर्व का मिला है, ...

PART 9

PART 9 # पर्यावरणीय_विज्ञान  ( # environmental_science ) पर्यावरणीय विज्ञान (environmental science) पर्यावरण के भौतिकीय, रासायनिक और जैविक अवयवों के बीच पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन है। पर्यावरणीय विज्ञान पर्यावरणीय व्यवस्था के अध्ययन के लिए समन्वित, परिमाणात्मक और अन्तरविषयक दृष्टिकोण उपलब्ध कराता है। आसान शब्दो मे - पर्यावरण के अध्ययन के विज्ञान को पर्यावरण विज्ञान कहा जाता है। पर्यावरण विज्ञान का वह क्षेत्र, जिसमें पर्यावरण के भौतिक, रासायनिक और जैविक घटकों के संबंधों का अध्ययन किया जाता है और पर्यावरण में जीवों के साथ इन घटकों के प्रभावों और रिश्तों का भी अध्ययन होता है। पर्यावरण विज्ञान में कई विषयों से जानकारी और विचार शामिल हैं और पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान का पता चलता है। प्राकृतिक विज्ञान के भीतर, जीव विज्ञान, भूविज्ञान, पारिस्थितिकी, महासागरीय विज्ञान और रसायन विज्ञान जैसे क्षेत्रों को पर्यावरण विज्ञान में शामिल किया गया है। # आधुनिक_विज्ञान_और_पर्यावरण_संरक्षण  - ऐसा अनुमान है कि पृथ्वी की सम्पूर्ण जैव विविधता का एक चौथाई भाग आने वाले 20-30 वर्षों में विल...

PART 8

PART 8 --------  # सैन्य_विज्ञान  -  # मार्शल_आर्ट_का_जन्म  -------- -------------------------------------------------------------------- ‘सैन्य विज्ञान मानव ज्ञान की वह शाखा है जो आदि काल से ही सामाजिक शान्ति स्थापना करने तथा बाह्य आक्रमण से निजी प्रभुसत्ता की रक्षा करने के लिए महत्वपूर्ण समझी जाती रही है, इसके अन्तर्गत शान्ति स्थापन साधनों, सेना के संगठन, शस्त्रास्त्रों के प्रयोग और विकास, युद्ध शैलियों का मानसिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है।’’ सैन्य विज्ञान के प्रमुख अंग है युद्ध कला , मार्शल आर्ट तथा शस्त्राभ्यास जिसका उद्गम भी वैदिक साहित्य ही हैं। वेदों में अट्ठारह (18) ज्ञान तथा कलाओं के विषयों पर मौलिक ज्ञान अर्जित है। यजुर्वेद का उपवेद ‘धनुर्वेद’ पूर्णतया धनुर्विद्या को समर्पित है। अग्नि पुराण में भी धनुर्वेद के विषय में विस्तृत उल्लेख किया गया है जिसमे निम्न पांच विधाएं प्रमुख है - # यन्त्र_मुक्ता  – अस्त्र-शस्त्र के उपकरण जैसे घनुष और बाण। # पाणि_मुक्ता  – हाथ से फैंके जाने वाले अस्त्र जैस...