PART 5

PART 5
भारत विश्व के प्रमुख कृषि प्रधान देशों में से एक है और इसकी संपत्ति के सबसे बड़े स्रोतों में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है-भूमि की पैदावार। देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका है। इसका योगदान सकल घरेलू उत्पाद का 29.4% है। इससे करीब 64% कार्यबल जुड़ा है। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में वर्ष दर वर्ष कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज् की गई है। कृषि विज्ञान-आधारित, उच्च-प्रौद्योगिकीय क्षेत्र है तथा इससे संबंधित रोजगार की व्यापक संभावनाएं हैं।
कृषि विज्ञान एक व्यापक बहुविषयक क्षेत्र है, जिसमें प्राकृतिक, आर्थिक और सामाजिक विज्ञान हिस्से हैं, जिन्हें कृषि के व्यवहार तथा इसे समझने के लिए प्रयोग किया जाता है। इस क्षेत्र में निम्नलिखित पर अनुसंधान एवं विकास कार्य किए जाते हैं:- उत्पादन तकनीकें (जैसे कि, सिंचाई प्रबंधन, अनुशंसित नाइट्रोजन इनपुट्स) गुणवत्ता और मात्रा की दृष्टि से कृषि उत्पादन में सुधार (जैसे कि सूखा झेलने वाली फसलों तथा पशुओं का चयन, नए कीटनाशकों का विकास, खेती-संवेदन प्रौद्योगिकियां, फसल वृद्धि के सिमुलेशन मॉडल, इन-विट्रो सैल कल्चर तकनीकें) प्राथमिक उत्पादों का अंतिम-उपभोक्ता उत्पादों में परिवर्तन (जैसे कि डेरी उत्पादों का उत्पादन, संरक्षण और पैकेजिंग) विपरीत पर्यावरणीय प्रभावों की रोकथाम तथा सुधार (जैसे कि मृदा निम्नीकरण, कचड़ा प्रबंधन, जैव-पुनः उपचार) सैद्धांतिक उत्पादन पारिस्थितिकी, फसल उत्पादन मॉडलिंग से संबंधित परंपरागत कृषि प्रणालियां, कई बार इसे जीविका कृषि भी कहा जाता है, जो विश्व के सर्वाधिक गरीब लोगों का भरण-पोषण करती है। ये परंपरागत पद्धतियां काफी रुचिकर हैं क्योंकि कई बार ये औद्योगिक कृषि की बजाए ज्यादा प्राकृतिक पारिस्थितिकी व्यवस्था के साथ समाकलन का स्तर कायम रखती हैं जो कि कुछ आधुनिक कृषि प्रणालियों की अपेक्षा ज्यादा दीर्घकालिक होती हैं।
कृषि विद्या के संबंध में जो ग्रंथ भारत की निधि रहे हैं, उनमें 'केदारकल्‍प' 'वृक्षायुर्वेद' नामक कतिपय ग्रंथ सूचियों में मिलते है। कृषि विद्या को हमारे यहां सस्‍यवेद भी कहा गया है और इस कर्म की महत्‍ता अनेकत्र मिलती है -
सुभिक्षं कृषिके नित्‍यम्।
इससे संबंधित कश्‍यप, सारस्‍वत, पराशर आदि के नाम से कुछ ग्रंथ मिलते हैं। जीवन में कृषि कार्य की उपयोगिता, कृषि का माहात्‍म्‍य, खेतों व कृषि भूमि के प्रकार, सिंचाई आदि के उपाय, कृषि से संबंधित बैल, हल आदि औजारों का परिचय और उनके प्रयोग, वृक्षायुर्वेद तथा मौसम विज्ञान आदि के बारे में इन ग्रंथों में जानकारी मिलती है । इनमें कृषि से जुडे देवी देवताओं की स्‍तुतियां भी हो सकती है
सन् 1996 में डॉ वाय एल नेने (एशियन एग्रो-हिस्ट्री फाउन्डेशन, भारत) ने यूके के बोल्डियन पुस्तकालय (आक्सफोर्ड) से इसकी पाण्डुलिपि प्राप्त की। डॉ नलिनी साधले ने इसका अनुवाद अंग्रेजी में किया।
वृक्षायुर्वेद की पाण्दुलिपि देवनागरी के प्राचीन रूप वाली लिपि में लिखी गयी है। 60 पृष्ठों में 325 परस्पर सुगठित श्लोक हैं जिनमें अन्य बातों के अलावा 170 पौधों की विशेषताएँ दी गयीं हैं। इसमें बीज खरीदने, उनका संरक्षण, उनका संस्कार (ट्रीटमेन्ट) करने, रोपने के लिये गड्ढ़ा खोदने, भूमि का चुनाव, सींचने की विधियाँ, खाद एवं पोषण, पौधों के रोग, आन्तरिक एवं वाह्य रोगों से पौधों की सुरक्षा, चिकित्सा, बाग का विन्यास (ले-आउट) आदि का वर्नन है। इस प्रकार यह वृक्षों के जीवन से सम्बन्धित सभी मुद्दों पर ज्ञान का भण्डार है।
कुछ साल पहले थियोसोफीकल सोसायटी, चेन्नई में पचास से अधिक आम के पेड़ रोगग्रस्त हो गए थे। आधुनिक कृषि-डॉक्टरों को कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी समय की आँधी में कहीं गुम हो गया सदियों पुराना ‘वृक्षायुर्वेद’ का ज्ञान काम आया।
सेंटर फॉर इण्डियन नॉलेज सिस्टम (सीआईकेएस) की देखरेख में नीम और कुछ दूसरी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया गया। देखते-ही-देखते बीमार पेड़ों में एकबार फिर हरियाली छा गई। ठीक इसी तरह चेन्नई के स्टेला मेरी कॉलेज में बॉटनी के छात्रों ने जब गुलमेंहदी के पेड़ में ‘वृक्षायुर्वेद’ में सुझाए गए नुस्खों का प्रयोग किया तो पता चला कि पेड़ में ना सिर्फ फूलों के घने गुच्छे लगे, बल्कि उनका आकार भी पहले से बहुत बड़ा था।
सीआईकेएस में बीते कई सालों से वृक्षायुर्वेद और ऐसे ही पुराने ग्रंथों पर शोध चल रहे हैं। यहाँ बीजों के संकलन, चयन, और उन्हें सहेजकर रखने से लेकर पौधों को रोपने, सिंचाई, बीमारियों से मुक्ति आदि की सरल पारम्परिक प्रक्रियाओं को लोकप्रिय बनाने के लिये आधुनिक डिग्रियों से लैस कई वैज्ञानिक प्रयासरत हैं। पशु आयुर्वेद, सारंगधर कृत उपवन विनोद और वराहमिरीह की वृहत्त्त संहिता में सुझाए गए चमत्कारी नुस्खों पर भी यहाँ काम चल रहा है।
महर्षि पराशर रचित " कृषि पाराशर " में वर्षा को मापने का वर्णन भी मिलता है -
अथ जलाढक निर्णयः।
शतयोजनविस्तीर्णं त्रिंशद्योजनमुच्छि्रतम्‌ ।
अढकस्य भवेन्मानं मुनिभिः परिकीर्तितक्‌ ॥
अर्थात - पूर्व में ऋषियों ने वर्षा को मापने का पैमाना तय किया है । अढकक याने 100 योजन विस्तीर्ण तथा 300 योजन ऊँचाई में वर्षा के पानी की मात्रा ।
योजन अर्थात्‌‌ - 1 अंगुली की चौड़ाई
1 द्रोण = 4 अढक = 6.4 cm
आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी आजका वर्षा मापन इतना ही आता है । कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र में द्रोण आधार पर वर्षा मापने का उल्लेख तथा देश में कहाँ कहाँ कितनी वर्षा होती है, इसका उल्लेख भी मिलता है ।
#ग्राफ्टिंग - वराहमिहिर अपनी वृहत्‌ संहिता में ग्राफ्टिंग जिसे उपरोपण भी कहते है की दो विधियाँ बताते हैं ।
1- जड़ से पेड़ में काटना और दूसरे को तने ( trunk ) से काटकर सन्निविष्ट ( insert ) करना ।
2- Inserting the cutting of tree into the stem of another जहाँ दोनों जुडे़गे वहाँ मिट्टी और गोबर से उनको बंदकर आच्छादित करना ।
आज की ग्राफ्टिंग तकनीकी भी यही है जिसे आधुनिक विज्ञान में नवीनतम माना जाता है ।।
इसी क्रम में वराहमिहिर ने किस मौसम में किस प्रकार के पौधे की उपरोपण करना चाहिए, इसका भी उल्लेख करते हैं ।
#शिशिर_ऋतु ( दिसम्बर - जनवरी ) जिनकी शाखांए बहुत हैं उनका उपरोपण करना चाहिए ।
#शरद_ऋतु ( अगस्त - सितम्बर ) - जिसकी शाखाएं कम हो उसका उपरोपण करना चाहिए ।
प्राचीन काल से भारत में कृषि एक विज्ञान के रूप में विकसित हुआ । जिसके कारण हजारों वर्ष बीतने के बाद भी हमारे यहाँ भूमि की उर्वरा शक्ति अक्षुण्ण बनी रही, जबकि कुछ ही शताब्दियों में ही रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग से अमेरिका में लाखों हेक्टेयर भूमि बंजर हो गयी है।
#विशेष - पर्यावरण शुद्धि व जलवायु नियंत्रण के सिद्धांतों पर आधारित वैदिक कृषि पद्धति हमारी देव संस्कृति के क्रांतिदर्शी ऋषियों के ऐसे उत्कृष्ट चिंतन का परिणाम है जिसका आज भी कोई सानी नहीं है। खेती की वैदिक पद्धति भारत की ऋषि संस्कृति का मानव समुदाय को दिया गया ऐसा अनूठा उपहार है जिसकी उपयोगिता उस युग की तुलना में आज कई गुना अधिक है। प्रयोगों व प्रमाणों की कसौटी पर कस कर इस विधा को आधुनिक कृषि विज्ञानी भी स्वीकार कर चुके हैं।
कृषि क्षेत्र में पंक्ति में बोने के तरीके को इस क्षेत्र में बहुत कुशल और उपयोगी अनुसंधान माना जाता है। आस्ट्रिया में इसका प्रयोग सन्‌ 1662 तथा इंग्लैण्ड में 1730 में हुआ। हालांकि इसका व्यापक प्रचार-प्रसार वहां इसके 50 वर्ष बाद हो पाया। पर मेजर जनरल अलेक्झेंडर वाकर के अनुसार पंक्ति में बोने का प्रयोग भारत में अत्यन्त प्राचीन काल से ही होता आया है। थॉमस राल्काट ने 1797 में इंग्लैण्ड के कृषि बोर्ड को लिखे एक पत्र में बताया कि, भारत में इसका प्रयोग प्राचीन काल से होता रहा है। उसने बोर्ड को पंक्तियुक्त हलों के तीन सेट लन्दन भेजे ताकि इन हलों की नकल अंग्रेज कर सकें, क्योंकि ये अंग्रेजी हलों की अपेक्षा अधिक उपयोगी और सस्ते थे।
भारतीय कृषि पद्धति की सराहना करते हुए सर वाकर लिखते हैं- ‘भारत में शायद विश्व के किसी भी देश से अधिक किस्मों का अनाज बोया जाता है और तरह-तरह की पौष्टिक जड़ों वाली फसलों का भी यहां प्रचलन है। मेरी समझ में नहीं आता कि हम भारत को क्या दे सकते हैं, क्योंकि जो खाद्यान्न हमारे यहां हैं, वे तो वहां हैं ही, और भी अनेक विशेष प्रकार के अन्न वहां हैं।
वैदिक कृषि को दीर्घकालिक जैविक कृषि के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो स्वस्थ भोजन और जीवन के लिये पोषणकारी प्रभाव उत्पन्न करती है। वैदिक जैविक कृषि प्राकृतिक विधान के सामन्जस्य युक्त कृषि है । यह कृषि की वह प्रणाली है जो किसान, उसकी फसल एवं पर्यावरण का बड़े स्तर पर पोषण व समर्थन करती है । कृषि में पूर्णता की अभिव्यक्ति लाने के लिए हम इसे वैदिक जैविक कृषि कहते हैं।
इस समय रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों को देखते हुए देश के प्रगतिशील कृषकों का रुझान पुन: तेजी से कृषि की इस पद्धति की ओर बढ़ रहा है। इसका कारण है कि इस पद्धति से उत्पादित फसल गुणवत्ता की दृष्टि से तो बेहतर होती ही है, भूमि की उर्वरा शक्ति भी इससे बरकरार रहती है। इसके साथ ही पर्यावरण को संरक्षित करके इसके द्वारा ईको सिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) का संतुलन भी बरकरार रखा जा सकता है।
भारत में जैविक कृषि के सफल प्रयोगों से प्रेरित होकर आस्ट्रेलिया, कनाडा, अस्ट्रिया, पोलैण्ड, जर्मनी, रूस, अमरीका, कम्बोडिया, पेरू, चिली अर्जेन्टीना आदि देशों में भी जैविक कृषि के द्वारा भूमि व मनुष्य दोनों की सेहत को सुधारने के प्रयास युद्धस्तर पर शुरू हो चुके हैं।और हमे पश्चिम की तरफ देखने की बजाय अपने वैदिक साहित्यो का अध्धययन करना चाहिए और प्राचीन खोजो को और उन्नत और आज के समयोपयोगी बनाने की दिशा में प्रयासरत होना चाहिए ।।
‘हल की नोक से खींची रेखा मानव इतिहास में जंगलीपन और सभ्यता के बीच की विभाजक रेखा है।‘

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