PART11
PART 11
प्राचीन काल में ऋषियों ने संस्कारों का निर्माण मनुष्य के समग्र व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए किया था। यह विश्वास किया जाता था कि संस्कारों के अनुष्ठान से व्यक्ति में दैवी गुणों का आविर्भाव हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को अनुशासित किया जाना उसकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है। आध्यात्मिक उन्नति मानव के चरम विकास का पर्याय है संस्कारों से इसी की पूर्ति होती है।
सनातन धर्म में व्यक्ति के जीवन के लिए जो भी नियम बनाएं गए हैं, उनका वैज्ञानिक आधार भी है, जैसे जीवन को चार आश्रमों में बांटा गया है, इन आश्रमों में रहते हुए मनुष्य को 16 प्रकार के संस्कारों का पालन करना अनिवार्य माना गया है। जीवन के इन नियमों को बनाने का श्रेय महर्षि वेदव्यास को जाता है, मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक पवित्र सोलह संस्कार बनाएं गए हैं , और इसे मैं जीवन विज्ञान कहता हूँ ।।
सनातन संस्कृति के वैदिक साहित्यो में महर्षि अंगिरा ने 25 संस्कारों का जिक्र किया है, जबकि, कुछ जगहों पर मनुष्य जीवन के 48 तरीके बताए गए हैं, लेकिन इन सबमें सबसे सटीक विवरण महर्षि वेद व्यास ने किया है. यही कारण है कि हिंदुओं में उनके बताए गए 16 संस्कारों का प्रचलन है।
मनीषियों ने हमें सुसंस्कृत तथा सामाजिक बनाने के लिए पहले शोध किए और फिर परिणाम देखने के बाद नियमों का संकलन किया है। हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों को सामाजिक शास्त्र और मनोविज्ञान से जुड़े चिकित्सक और वैज्ञानिकों ने भी मान्यता दी है। मैं क्रमशः हर पोस्ट में 3 संस्कार के बारे में और उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विषय मे बताऊंगा ये 16 संस्कार है -
1. गर्भाधान, 2. पुंसवन, 3. सीमन्तोन्नयन, 4. जातकर्म, 5. नामकरण, 6. निष्क्रमण, 7. अन्नप्राशन, 8. चूड़ाकर्म, 9. कर्णवेध, 10. उपनयन, 11. वेदारम्भ, 12. समावर्तन, 13. विवाह, 14. वानप्रस्थ, 15. संन्यास एवं 16. अन्त्येष्टि
1. गर्भाधान, 2. पुंसवन, 3. सीमन्तोन्नयन, 4. जातकर्म, 5. नामकरण, 6. निष्क्रमण, 7. अन्नप्राशन, 8. चूड़ाकर्म, 9. कर्णवेध, 10. उपनयन, 11. वेदारम्भ, 12. समावर्तन, 13. विवाह, 14. वानप्रस्थ, 15. संन्यास एवं 16. अन्त्येष्टि
आज गर्भाधान और पुंसवन के बारे में आइये जानते है -
-------------------------- #गर्भाधान ---------------------------
योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त करने के लिए मनुष्य जीवन का यह पहला संस्कार है, इसे गर्भाधान संस्कार कहा गया है, गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम कर्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है ।
#आधुनिक_वैज्ञानिक_दृष्टिकोण -
गर्भवती होने की सही उम्र 22 से 29 वर्ष होती है और इसमें भी सबसे उपयुक्त उम्र 25 की है। क्योंकि, इस समय एक युवती शारीरिक व मानसिक रूप से गर्भवती होने के लिए तैयार रहती है। मेंस्ट्रूएल पीरियड्स के सात दिन बाद ओव्यूलेशन साइकिल शुरू होती है और यह पीरियड्स के शुरू होने से सात दिन पहले तक रहती है। ओव्यूलेशन पीरियड ही वह समय होता है, जिसमें महिला गर्भधारण कर सकती है। इस स्थिति को फर्टाइल स्टेज भी कहते हैं। यदि स्त्री सहवास के वक्त ऑर्गज्म प्राप्त कर लेती है तो गर्भधारण की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है। क्योंकि, तब शुक्राणु को सही जगह जाने का समय और माहौल मिलता है तथा शुक्राणु ज्यादा समय तक जीवित रहते हैं।
#आधुनिक_वैज्ञानिक_दृष्टिकोण -
गर्भवती होने की सही उम्र 22 से 29 वर्ष होती है और इसमें भी सबसे उपयुक्त उम्र 25 की है। क्योंकि, इस समय एक युवती शारीरिक व मानसिक रूप से गर्भवती होने के लिए तैयार रहती है। मेंस्ट्रूएल पीरियड्स के सात दिन बाद ओव्यूलेशन साइकिल शुरू होती है और यह पीरियड्स के शुरू होने से सात दिन पहले तक रहती है। ओव्यूलेशन पीरियड ही वह समय होता है, जिसमें महिला गर्भधारण कर सकती है। इस स्थिति को फर्टाइल स्टेज भी कहते हैं। यदि स्त्री सहवास के वक्त ऑर्गज्म प्राप्त कर लेती है तो गर्भधारण की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है। क्योंकि, तब शुक्राणु को सही जगह जाने का समय और माहौल मिलता है तथा शुक्राणु ज्यादा समय तक जीवित रहते हैं।
#गर्भधारण_की_आयु -
आयुर्वेद के अनुसार पुरुष की न्यूनतम आयु 25 वर्ष तथा स्त्री की 16 वर्ष आवश्यक होती है। बच्चे के जन्म के पहले स्त्री और पुरुष को अपनी सेहत और मानसिक अवस्था का अनुमाप करना चाहिए, नियमों, तिथि, नक्षत्र आदि के अनुसार ही गर्भधारण करना चाहिए। ताकि शिशु निरोग और गुणवान हो सके।
गर्भाधान के संबध में स्मृतिसंग्रह में लिखा है -
निषेकाद् बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते।
क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्।।
अर्थात -
विधिपूर्वक संस्कार से युक्त गर्भाधान से अच्छी और सुयोग्य संतान उत्पन्न होती है। इस संस्कार से वीर्यसंबधी पाप का नाश होता है, दोष का मार्जन तथा क्षेत्र का संस्कार होता है। यही गर्भाधान-संस्कार का फल है।
आयुर्वेद के अनुसार पुरुष की न्यूनतम आयु 25 वर्ष तथा स्त्री की 16 वर्ष आवश्यक होती है। बच्चे के जन्म के पहले स्त्री और पुरुष को अपनी सेहत और मानसिक अवस्था का अनुमाप करना चाहिए, नियमों, तिथि, नक्षत्र आदि के अनुसार ही गर्भधारण करना चाहिए। ताकि शिशु निरोग और गुणवान हो सके।
गर्भाधान के संबध में स्मृतिसंग्रह में लिखा है -
निषेकाद् बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते।
क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्।।
अर्थात -
विधिपूर्वक संस्कार से युक्त गर्भाधान से अच्छी और सुयोग्य संतान उत्पन्न होती है। इस संस्कार से वीर्यसंबधी पाप का नाश होता है, दोष का मार्जन तथा क्षेत्र का संस्कार होता है। यही गर्भाधान-संस्कार का फल है।
#गर्भधारण_का_समय -
धर्मसूत्रों और स्मृति ग्रन्थों में गर्भाधान संस्कार का और भी विस्तृत निर्देश उपलब्ध होता है। इन ग्रन्थों में गर्भाधान के समय की उपयुक्तता और विधि पर सूक्ष्मतापूर्वक विचार किया जाता है। मनुस्मृतिकार पत्नी के ऋतु- काल की प्रथम चार रात्रि, ग्यारहवीं तथा तेरहवीं रात्रि का निषेध कर शेष दस रात्रियों को इस संस्कार के लिए प्रशस्त बतलाता है।
तासामाद्यश्चतस्रस्तु निन्दितेकादशी च या।
त्रयोदशी च शेषास्तु प्रशस्ताः दश रात्रयः।। मनु-3.47
इसके अतिरिक्त अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा एवं सम्पूर्ण पर्व की रात्रियाँ भी इस कार्य के लिये निषिध्द मानी गई हैं -
अमावस्यामष्टमीं च पौर्णमासीं चतुर्दशीम्।
ब्रह्मचारी भवेन्नित्यामप्यृतौ स्नातको व्दिजः।। मनु- 4.128
पर्ववर्जं व्रजेच्चैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया। मनु-3.45
महर्षि याज्ञवल्क्य शास्त्रविहित रात्रियों में भी मघा और मूल नक्षत्र के समय गर्भाधान का निषेध करते है-
मघां मूलं च वर्जयेत्।
भारतिय मनीषा मनोवांछित संतान - प्राप्ति हेतु यह परामर्श देती है कि पुत्रकामी को छठी, आठवीं, दसवीं, बारहवीं, आदि युग्म रात्रियों में गर्भाधान संस्कार सम्पन्न करना चाहिए और पुत्री चाहनेवालों को पाॅचवीं, सातवीं, आदि अयुग्म रात्रियों में-
युग्मासु पुत्रा जायन्तेऽस्त्रियोयुग्मासु रात्रिषु।
वस्तुतः भारतीय शास्त्रों ने गर्भाधान कर्म को एक पवित्र संस्कार का स्वरूप प्रदान किया है। शास्त्रकारों की स्पष्ट मान्यता है कि सहवास काल में पति- पत्नी के विचार - व्यवहार भावी सन्तति के संस्कार को पूर्णरूपेण प्रभावित करते हैं। केवल इन्द्रिय- सुख के उद्देश्य से सम्पन्न समागम के फलस्वरूप जो आकस्मिक गर्भाधान होता है, उससे धार्मिक, सदाचारी और यशस्वी सन्तान- प्राप्ति की आशा नहीं की जा सकती। अतः सर्वगुणसम्पन्न संन्तान के लिए गर्भाधान संस्कार में पति-पत्नी के तन-मन की पवित्रता के साथ-साथ मांगलिक परिवेश और ईश्वराराधन का विशेष अनुरोध दिखलाई पड़ता है। लगभग दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है ।
धर्मसूत्रों और स्मृति ग्रन्थों में गर्भाधान संस्कार का और भी विस्तृत निर्देश उपलब्ध होता है। इन ग्रन्थों में गर्भाधान के समय की उपयुक्तता और विधि पर सूक्ष्मतापूर्वक विचार किया जाता है। मनुस्मृतिकार पत्नी के ऋतु- काल की प्रथम चार रात्रि, ग्यारहवीं तथा तेरहवीं रात्रि का निषेध कर शेष दस रात्रियों को इस संस्कार के लिए प्रशस्त बतलाता है।
तासामाद्यश्चतस्रस्तु निन्दितेकादशी च या।
त्रयोदशी च शेषास्तु प्रशस्ताः दश रात्रयः।। मनु-3.47
इसके अतिरिक्त अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा एवं सम्पूर्ण पर्व की रात्रियाँ भी इस कार्य के लिये निषिध्द मानी गई हैं -
अमावस्यामष्टमीं च पौर्णमासीं चतुर्दशीम्।
ब्रह्मचारी भवेन्नित्यामप्यृतौ स्नातको व्दिजः।। मनु- 4.128
पर्ववर्जं व्रजेच्चैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया। मनु-3.45
महर्षि याज्ञवल्क्य शास्त्रविहित रात्रियों में भी मघा और मूल नक्षत्र के समय गर्भाधान का निषेध करते है-
मघां मूलं च वर्जयेत्।
भारतिय मनीषा मनोवांछित संतान - प्राप्ति हेतु यह परामर्श देती है कि पुत्रकामी को छठी, आठवीं, दसवीं, बारहवीं, आदि युग्म रात्रियों में गर्भाधान संस्कार सम्पन्न करना चाहिए और पुत्री चाहनेवालों को पाॅचवीं, सातवीं, आदि अयुग्म रात्रियों में-
युग्मासु पुत्रा जायन्तेऽस्त्रियोयुग्मासु रात्रिषु।
वस्तुतः भारतीय शास्त्रों ने गर्भाधान कर्म को एक पवित्र संस्कार का स्वरूप प्रदान किया है। शास्त्रकारों की स्पष्ट मान्यता है कि सहवास काल में पति- पत्नी के विचार - व्यवहार भावी सन्तति के संस्कार को पूर्णरूपेण प्रभावित करते हैं। केवल इन्द्रिय- सुख के उद्देश्य से सम्पन्न समागम के फलस्वरूप जो आकस्मिक गर्भाधान होता है, उससे धार्मिक, सदाचारी और यशस्वी सन्तान- प्राप्ति की आशा नहीं की जा सकती। अतः सर्वगुणसम्पन्न संन्तान के लिए गर्भाधान संस्कार में पति-पत्नी के तन-मन की पवित्रता के साथ-साथ मांगलिक परिवेश और ईश्वराराधन का विशेष अनुरोध दिखलाई पड़ता है। लगभग दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है ।
#गर्भधारण_के_लिए - कामशास्त्र के अनुसार उचित आसनों का प्रयोग वर्णित है जल्द ही लिखूंगा । यौन कमियों को दूर करने के लिए कुछ आसान जो कामशास्त्र में बताये गए है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समर्थित है-
#स्त्री_के_लिए - मुद्रासन - मुद्रासन तनाव को दूर करता है। महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े हए विकारों को दूर करने के अलावा यह आसन रक्तस्रावरोधक भी है। मूत्राशय से जुड़ी विसंगतियों को भी दूर करता है।
#पुरुष_के_लिए - पश्चिमोत्तनासन :सेक्स से जुड़ी समस्त समस्या को दूर करने में सहायक है। जैसे कि स्वप्नदोष, नपुंसकता और महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े दोषों को दूर करता है।
#पुरुष_के_लिए - पश्चिमोत्तनासन :सेक्स से जुड़ी समस्त समस्या को दूर करने में सहायक है। जैसे कि स्वप्नदोष, नपुंसकता और महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े दोषों को दूर करता है।
वैदिक साहित्य में उल्लेखित ज्ञान आज के आधुनिक समय के सभी मानकों पर खरा है । गर्भधारण के संदर्भ में एक पूर्ण ग्रन्थ ही संग्रहित है जिसे काम शास्त्र कहते है ,इस ग्रन्थ के विषय मे बहोत दुष्प्रचार किया जाता है हालांकि इसमें ऐसा कुछ भी नही है आज के सेक्स एजुकेशन से कही बेहतर और सटीक है ।।
------------------------- #पुंसवन -----------------------------
इसके तहत इस बात का ध्यान रखा जाता है कि गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाए ।
इसके तहत इस बात का ध्यान रखा जाता है कि गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाए ।
#आधुनिक_विज्ञानम - गर्भावस्था आम तौर पर तीन भागो( तिमाही) में बांटा गया है। पहली तिमाही में गर्भाधान से लेकर 12 से सप्ताह से है,गर्भाधान जब शुक्राणु अंडा निषेचित है। निषेचित अंडे तो फैलोपियन ट्यूब नीचे यात्रा और गर्भाशय के अंदर है, जहां यह भ्रूण और नाल आकार लेती है।पहली तिमाही के गर्भपात का सबसे ज्यादा खतरा (भ्रूण या भ्रूण की स्वाभाविक मृत्यु) माना जाता है।दूसरी तिमाही 13 सप्ताह से 28 सप्ताह है।जिसमे भ्रूण के आंदोलन को महसूस किया जा सकता है। 28 सप्ताह से अधिक समय के बच्चों को उच्च गुणवत्ता चिकित्सा देखभाल के ज़रिये 90% गर्भाशय के बाहर जीवित रखा जा सकता हैं। तीसरी तिमाही 29 सप्ताह से 40 सप्ताह क समय है।गर्भधारण के बाद मां को खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। खान-पान से ही मां का स्वास्थ्य ठीक रहेगा और हेल्दी बच्चा भी पैदा होगा। गर्भावस्था की पहली तिमाही में अगर महिला पौष्टिक आहार का सेवन करे तो गर्भावस्था की जटिलतायें कम होंगी और गर्भपात होने की संभावना नही रहेगी। 11वे हफ्ते में भ्रूण के लगभग सभी अंग काम भी करना शुरू हो जाते है, साथ ही शिशु के जननांग भी पुरुष या महिला रूप लेना शुरू कर देते है।
#वैदिक_साहित्य -
संस्कारों में पुंसवन संस्कार द्वितीय संस्कार है। पुंसवन संस्कार गर्भधान संस्कार के तीन माह के पश्चात किया जाता है। पुंसवन संस्कार तीन महीने के पश्चात इसलिए आयोजित किया जाता है क्योंकि गर्भ में तीन महीने के पश्चात गर्भस्थ शिशु का मस्तिष्क विकसित होने लगता है।
धर्मग्रथों में पुंसवन-संस्कार करने के दो प्रमुख उद्देश्य मिलते हैं। पहला उद्देश्य पुत्र प्राप्ति और दूसरा स्वस्थ, सुंदर तथा गुणवान संतान पाने का है। मूलत: यह संस्कार वे लोग करते हैं जिन्हें पुत्र की कामना होती है। दूसरा पुंसवन-संस्कार का उद्देश्य बलवान, शक्तिशाली एवं स्वस्थ संतान को जन्म देना है। इस संस्कार से गर्भस्थ शिशु की रक्षा होती है तथा उसे उत्तम संस्कारों से पूर्ण बनाया जाता है।
संस्कारों में पुंसवन संस्कार द्वितीय संस्कार है। पुंसवन संस्कार गर्भधान संस्कार के तीन माह के पश्चात किया जाता है। पुंसवन संस्कार तीन महीने के पश्चात इसलिए आयोजित किया जाता है क्योंकि गर्भ में तीन महीने के पश्चात गर्भस्थ शिशु का मस्तिष्क विकसित होने लगता है।
धर्मग्रथों में पुंसवन-संस्कार करने के दो प्रमुख उद्देश्य मिलते हैं। पहला उद्देश्य पुत्र प्राप्ति और दूसरा स्वस्थ, सुंदर तथा गुणवान संतान पाने का है। मूलत: यह संस्कार वे लोग करते हैं जिन्हें पुत्र की कामना होती है। दूसरा पुंसवन-संस्कार का उद्देश्य बलवान, शक्तिशाली एवं स्वस्थ संतान को जन्म देना है। इस संस्कार से गर्भस्थ शिशु की रक्षा होती है तथा उसे उत्तम संस्कारों से पूर्ण बनाया जाता है।
सुश्रुतसंहिता, यजुर्वेद आदि में तो पुंसवन संस्कार को पुत्र प्राप्ति से भी जोड़ा गया है। स्मृतिसंग्रह में यह लिखा है - गर्भाद् भवेच्च पुंसूते पुंस्त्वस्य प्रतिपादनम् अर्थात गर्भस्थ शिशु पुत्र रूप में जन्म ले इसलिए पुंसवन संस्कार किया जाता है।
इसके तहत इस बात का ध्यान रखा जाता है कि गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाए। जैसे अच्छा खान-पान, सकारात्मक वातावरण, परिवार का आर्शीवाद आदि बेहद अहम होते हैं, शिशु के गर्भ में आने के बाद यदि उसके परिवार का माहौल सकारात्मक नहीं है तो इससे आने वाले नए जीवन के मानसिक विकास पर फर्क आता है।
इस लिए पुंसवन संस्कार के तहत 9 से 11 माह के भीतर परिवारों में आध्यात्मिक पूजा पाठ, प्रवचन, कर्म कांड आदि करवाया जाना अनिवार्य है, कहा जाता है कि गर्भवति स्त्री को रोजाना गीता और रामायण जैसे पवित्र ग्रंथों का ध्ययन रोजाना करना चाहिए। इससे शिशु का विचार तंत्र विकासित होता है। अध्ययनों में पाया गया है कि संगीत को होने वाले बच्चे न सिर्फ महसूस कर सकते हैं, बल्कि वह उस पर हलचल भी करने लगते हैं। अध्ययनों के अनुसार, 23 हफ्ते के बच्चे संगीत को महसूस करना शुरू कर देते हैं। यहाँ तक कि वह आपकी आवाज भी सुन सकते हैं। बहुत से अध्ययनों में पाया गया गया है कि यदि आप गर्भावस्था के दौरान कोई किताब बोल-बोलकर पढ़ते हैं, या अपने बच्चे से बाते करते हैं। तो निसंदेह आपका बच्चा भी उसे महसूस करता हैं। इसी तरह से संगीत सुनकर बच्चे हलचल करना शुरू कर देते हैं। यहाँ तक कि कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि संगीत से बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी अच्छा असर पड़ता है। संगीत सुनने के अलावा, महिलाओं के लिए यह भी जरूरी है कि वह किस तरह का संगीत सुने और कितनी वॉल्यूम में सुने। तो प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए धीमी आवाज में मधुर संगीत सुनना बहुत अच्छा होता है। महाभारत का वो क़िस्सा तो आपने पढ़ा ही होगा कि अर्जुन के बेटे अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में घुसने की कला मां के गर्भ में रहते हुए सीखी थी।उनके पिता अर्जुन, जब सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदकर बाहर निकलने का तरीक़ा बता रहे थे, तो सुभद्रा सो गईं थी। इसलिए अभिमन्यु चक्रव्यूह में घुसने का तरीक़ा तो सीख गए, मगर उससे निकलने का नहीं। आख़िर में अभिमन्यु की मौत चक्रव्यूह में घिरकर हुई।
बहुत से लोग इस क़िस्से पर यक़ीन करते हैं। मगर, बहुत से इसे पौराणिक गल्पकथा मानकर गंभीरता से नहीं लेते। पर क्या वाक़ई में इंसान, मां के गर्भ में रहते हुए बहुत सी बातें सीखता है?
बहुत से लोग इस क़िस्से पर यक़ीन करते हैं। मगर, बहुत से इसे पौराणिक गल्पकथा मानकर गंभीरता से नहीं लेते। पर क्या वाक़ई में इंसान, मां के गर्भ में रहते हुए बहुत सी बातें सीखता है?
वैज्ञानिक इस सवाल का जवाब हां में देते हैं। खान-पान, स्वाद, आवाज़, ज़बान जैसी चीज़ें सीखने की बुनियाद हमारे अंदर तभी पड़ गई थीं, जब हम मां के पेट में पल रहे थे। इस लिए पुंसवन संस्कार के तहत 9 से 11 माह के भीतर परिवारों में आध्यात्मिक पूजा पाठ, प्रवचन, कर्म कांड आदि करवाया जाना अनिवार्य है, कहा जाता है कि गर्भवति स्त्री को रोजाना गीता और रामायण जैसे पवित्र ग्रंथों का ध्ययन रोजाना करना चाहिए। इससे शिशु का विचार तंत्र विकासित होता है जो आज के आधुनिक विज्ञान के मानकों पर बिल्कुल खरा है और जो रिसर्च अभी जीव विज्ञानी कर रहे है वो पहले से वैदिक साहित्य में उपलब्ध है ।।
#विशेष - महर्षि चरक के अनुसार- ‘‘संस्कारों हि गुणन्तराधानमुच्यते।’’ अर्थात् वस्तु में नये गुणों का आधान करने का नाम संस्कार है। मामूली से धातु अयस्क को जब विविध प्रक्रियाओं द्वारा संस्कारित किया जाता है तो वही पदार्थ बहुमुल्य धातु या रसायन बन जाती है। मनुष्य के अन्दर भी दिव्य गुणों का समावेश हो सके कुसंस्कारों का निष्कासन हो सके इसके लिए संस्कार आवश्यक है।प्राचीन काल में ऋषियों ने संस्कारों का निर्माण मनुष्य के समग्र व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए किया था। यह विश्वास किया जाता था कि संस्कारों के अनुष्ठान से व्यक्ति में दैवी गुणों का आविर्भाव हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को अनुशासित किया जाना उसकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है। आध्यात्मिक उन्नति मानव के चरम विकास का पर्याय है संस्कारों से इसी की पूर्ति होती है। भारतीय संस्कृति के आदि प्रवक्ता भगवान मनु का कथन है कि ‘‘संस्कार शरीर को शुद्ध करके उसे आत्मा के निवास के उपयुक्त बनाते हैं। यह एक तथ्य है कि जन्म से प्रत्येक व्यक्ति शुद्र होता है, संस्कारों द्वारा परिमार्जित होकर ही वह द्विज बनता है। ‘जन्मना जायते शूद्र:, संस्काराद् द्विज उच्यते।’ इस तरह मानव जीवन को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने वाले आध्यात्मिक उपचार का नाम ही संस्कार है।’’
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