PART 2
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माता–पिता से पीढ़ी–दर–पीढ़ी आसानी से संचरित होने वाले मौलिक गुण ‘आनुवांशिक गुण’ कहलाते हैं और आनुवांशिक गुणों के संचरण की प्रक्रिया एवं उसके कारणों का अध्ययन को ‘आनुवांशिकी’ कहा जाता है। ग्रेगर जॉन मेंडल को ‘आनुवांशिकी का जनक’ कहा जाता है। इन्होंने आनुवांशिकता और आनुवांशिक सिद्धांत का वैज्ञानिक अध्ययन किया था। उनके अध्ययन का तरीका बगीचे की मटर की विभिन्न प्रजातियों व स्पष्ट लक्षणों वाले विरोधी युग्मों के संकरण (Crossbreeding) पर आधारित था। उन्होंने अलगाव (Segregation), प्रभुत्व (Dominance) और स्वतंत्र वर्गीकरण (Independent Assortment) का सिद्धांत दिया, जो आनुवांशिकी के विज्ञान का मौलिक आधार बन गया। जीन (मेंडेल द्वारा दिया गया कारक) गुणसूत्र (Chromosome) का मुख्य घटक है, जो आनुवांशिक गुणों का वहन करता है।
यौन प्रजनन की प्रक्रिया के दौरान गुणसूत्रों पर उपस्थित जीन के माध्यम से माता–पिता के गुण या लक्षण उनकी संतान में प्रेषित होते हैं। चूँकि जीन युग्म में काम करते हैं (एक प्रभावी और दूसरा अप्रभावी) और माता व पिता प्रत्येक के गुणसूत्रों के युग्म पर प्रत्येक गुण के लिए जीनों का एक युग्म उपस्थित होता है। इसलिए, नर और मादा युग्मक माता–पिता के जीन युग्मों से प्रत्येक गुण के लिए एक जीन धारण करता है। लेकिन जब निषेचन के दौरान नर और मादा युग्मक मिलते हैं तो युग्मनज (zygote) बनता है, जो नए जीव के रूप में वृद्धि करता है और विकिसत होता है। इसमें माता और पिता दोनों के गुण होते हैं, जो जीन के माध्यम से संचरित होते हैं।
हालांकि संतान अपने माता–पिता से दो जीन या जीन का एक युग्म प्राप्त करती है लेकिन विरासत में मिले दोनों जीनों में से जो जीन प्रमुख होगा, उसी के लक्षण संतान में दिखेंगे।
माता–पिता से पीढ़ी–दर–पीढ़ी आसानी से संचरित होने वाले मौलिक गुण ‘आनुवांशिक गुण’ कहलाते हैं और आनुवांशिक गुणों के संचरण की प्रक्रिया एवं उसके कारणों का अध्ययन को ‘आनुवांशिकी’ कहा जाता है। ग्रेगर जॉन मेंडल को ‘आनुवांशिकी का जनक’ कहा जाता है। इन्होंने आनुवांशिकता और आनुवांशिक सिद्धांत का वैज्ञानिक अध्ययन किया था। उनके अध्ययन का तरीका बगीचे की मटर की विभिन्न प्रजातियों व स्पष्ट लक्षणों वाले विरोधी युग्मों के संकरण (Crossbreeding) पर आधारित था। उन्होंने अलगाव (Segregation), प्रभुत्व (Dominance) और स्वतंत्र वर्गीकरण (Independent Assortment) का सिद्धांत दिया, जो आनुवांशिकी के विज्ञान का मौलिक आधार बन गया। जीन (मेंडेल द्वारा दिया गया कारक) गुणसूत्र (Chromosome) का मुख्य घटक है, जो आनुवांशिक गुणों का वहन करता है।
यौन प्रजनन की प्रक्रिया के दौरान गुणसूत्रों पर उपस्थित जीन के माध्यम से माता–पिता के गुण या लक्षण उनकी संतान में प्रेषित होते हैं। चूँकि जीन युग्म में काम करते हैं (एक प्रभावी और दूसरा अप्रभावी) और माता व पिता प्रत्येक के गुणसूत्रों के युग्म पर प्रत्येक गुण के लिए जीनों का एक युग्म उपस्थित होता है। इसलिए, नर और मादा युग्मक माता–पिता के जीन युग्मों से प्रत्येक गुण के लिए एक जीन धारण करता है। लेकिन जब निषेचन के दौरान नर और मादा युग्मक मिलते हैं तो युग्मनज (zygote) बनता है, जो नए जीव के रूप में वृद्धि करता है और विकिसत होता है। इसमें माता और पिता दोनों के गुण होते हैं, जो जीन के माध्यम से संचरित होते हैं।
हालांकि संतान अपने माता–पिता से दो जीन या जीन का एक युग्म प्राप्त करती है लेकिन विरासत में मिले दोनों जीनों में से जो जीन प्रमुख होगा, उसी के लक्षण संतान में दिखेंगे।
#वैदिक_अनुवांशिक_विज्ञान -
विरासत में मिला ये ज्ञान वैदिक साहित्य में उपलब्ध है -
विरासत में मिला ये ज्ञान वैदिक साहित्य में उपलब्ध है -
#भारतीय_गोत्र_प्रणाली_और_अनुवांशिकता -
उदाहरण के लिए मैं अपने को संदर्भ में रखता हूँ चूंकि मैं ब्राम्हण हूँ इसलिए इससे ही समझने का प्रयत्न कीजिये -
उदाहरण के लिए मैं अपने को संदर्भ में रखता हूँ चूंकि मैं ब्राम्हण हूँ इसलिए इससे ही समझने का प्रयत्न कीजिये -
#गोत्र_क्या_है - #जेनेटिक_आइडेंटिटी
ब्राह्मण स्वयं को निम्न आठ ऋषियों (सप्तऋषि एवं अगस्त्य जी ) का वंशज मानते है -
ब्राह्मण स्वयं को निम्न आठ ऋषियों (सप्तऋषि एवं अगस्त्य जी ) का वंशज मानते है -
उपरोक्त आठ ऋषि मुख्य गोत्रदायक ऋषि कहलाते है । तथा इसके पश्चात जितने भी अन्य ब्राम्हण गोत्र अस्तित्व में आये है वो इन्ही आठ मे से ही किसी एक से फलित हुए है और कालांतर में स्वयं के नाम से गौत्र स्थापित किया -
जैसे - अंगीरा की 8वीं पीडी में कोई ऋषि अमुक हुए तो परिस्थतियों के अनुसार उनके नाम से गोत्र चल पड़ा। और इनके वंशज अमुक गौत्र के कहलाये किन्तु अमुक गौत्र स्वयं अंगीरा से उत्पन्न हुआ है इसलिए उनका मूल गोत्र अंगिरा ही होगा ।
इस प्रकार अब तक कई गोत्र अस्तित्व में है । किन्तु सभी का मुख्य गोत्र आठ मुख्य गोत्रदायक ऋषियों मे से ही है ।
#आसान_शब्दो_मे - गोत्र किसी भी मनुष्य की जेनेटिक पहचान होती है , और गोत्र से उसके जेनेटिक आइडेंटिटी की पहचान करके उसे मिलान किया जाता है । गौत्र द्वारा पुत्र एवं उसके वंश की पहचान होती है । यह गोत्र पिता से स्वतः ही पुत्र को प्राप्त होता है । परन्तु पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नही होता ।
जैसे - अंगीरा की 8वीं पीडी में कोई ऋषि अमुक हुए तो परिस्थतियों के अनुसार उनके नाम से गोत्र चल पड़ा। और इनके वंशज अमुक गौत्र के कहलाये किन्तु अमुक गौत्र स्वयं अंगीरा से उत्पन्न हुआ है इसलिए उनका मूल गोत्र अंगिरा ही होगा ।
इस प्रकार अब तक कई गोत्र अस्तित्व में है । किन्तु सभी का मुख्य गोत्र आठ मुख्य गोत्रदायक ऋषियों मे से ही है ।
#आसान_शब्दो_मे - गोत्र किसी भी मनुष्य की जेनेटिक पहचान होती है , और गोत्र से उसके जेनेटिक आइडेंटिटी की पहचान करके उसे मिलान किया जाता है । गौत्र द्वारा पुत्र एवं उसके वंश की पहचान होती है । यह गोत्र पिता से स्वतः ही पुत्र को प्राप्त होता है । परन्तु पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नही होता ।
ऐसे समझीये - एक व्यक्ति का गोत्र अंगीरा है
और उसका एक पुत्र है । और यह पुत्र एक कन्या से विवाह करता है जिसका पिता कश्यप गोत्र से है । तब लड़की का गोत्र स्वतः ही गोत्र अंगीरा में परिवर्तित हो जायेगा जबकि कन्या का पिता कश्यप गोत्र से था ।
इस प्रकार पुरुष का गोत्र अपने पिता का ही रहता है और स्त्री का पति के अनुसार होता है न की पिता के अनुसार ।
ऐसे बहोत से उदाहरण हम अपने देनिक जीवन में देखते ही है , अब आइये पहले हम गुणसूत्र के विषय मे थोड़ी जानकारी कर लेते है इससे आपको लड़कियों के नाम से गोत्र क्यों नही होते और इससे आपको आगे समझने में भी आसानी होगी -
और उसका एक पुत्र है । और यह पुत्र एक कन्या से विवाह करता है जिसका पिता कश्यप गोत्र से है । तब लड़की का गोत्र स्वतः ही गोत्र अंगीरा में परिवर्तित हो जायेगा जबकि कन्या का पिता कश्यप गोत्र से था ।
इस प्रकार पुरुष का गोत्र अपने पिता का ही रहता है और स्त्री का पति के अनुसार होता है न की पिता के अनुसार ।
ऐसे बहोत से उदाहरण हम अपने देनिक जीवन में देखते ही है , अब आइये पहले हम गुणसूत्र के विषय मे थोड़ी जानकारी कर लेते है इससे आपको लड़कियों के नाम से गोत्र क्यों नही होते और इससे आपको आगे समझने में भी आसानी होगी -
हर मनुष्य में 23 जोड़े गुणसूत्र होते है । प्रत्येक जोड़े में एक गुणसूत्र माता से तथा एक गुणसूत्र पिता से आता है । इस प्रकार प्रत्येक कोशिका में कुल 46 गुणसूत्र होते है जिसमे 23 माता से और 23 पिता से आते है । इन 23 में से एक जोड़ा लिंग गुणसूत्र कहलाता है यह होने वाली संतान का लिंग निर्धारण करता है अर्थात पुत्र होगा अथवा पुत्री और ये पुरुष के गुणसूत्र में होता है ना कि स्त्री में , यदि इस एक जोड़े में गुणसूत्र xx हो तो सन्तति पुत्री होगी और यदि xy हो तो पुत्र होगा । परन्तु दोनों में x सामान है । जो माता द्वारा मिलता है और शेष रहा वो पिता से मिलता है । अब यदि पिता से प्राप्त गुणसूत्र x हो तो xx मिल कर स्त्रीलिंग निर्धारित करेंगे और यदि पिता से प्राप्त y हो तो पुलिंग निर्धारित करेंगे । इस प्रकार x पुत्री के लिए व् y पुत्र के लिए होता है । इस प्रकार पुत्र व् पुत्री का उत्पन्न होना पूर्णतया पिता से प्राप्त होने वाले x अथवा y गुणसूत्र पर निर्भर होता है माता पर नही ।
#आधुनिक_जेनेटिक_साइंस -
मेंण्डल के नियम के अनुसार प्रत्येक जीन जोड़ी के कारक (जीन ) युग्मकों के निर्माण के समय एक-दूसरे से पृथक होकर अलग-अलग युग्मकों में चले जाते हैं तथा युग्मनज (zygote) निर्माण में ये कारक पुंन: एक-दूसरे के साथ आ जाते हैं तथा अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं | इस प्रकार जीन या कारक द्वारा अपना अस्तित्व या जीन की शुद्धता बनाए रखने के कारण इस नियम को युग्मकों की शुद्धता का नियम कहते हैं , कोशिकाओं को नियंत्रित करने का कार्य गुणसूत्र में मौजूद डीएनए का होता है। हमें डीएनए का एक हिस्सा मां से और दूसरा हिस्सा पिता से मिलता है। डीएनए में हमारा जेनेटिक कोड होता है, जिससे माता-पिता की आदतें व रोग संतान तक पहुंचती हैं। इसी में खराबी से जेनेटिक डिसॉर्डर होने की आशंका बढ़ती है, और यदि हम एक संकर संकरण के प्रयोग में जब एक ही लक्षण के दो विरोधी गुणों वाले पौधों के बीच संकरण कराया जाता हैं , तो प्रथम पीढ़ी (F1) में वही गुण प्रदर्शित होता हैं जो प्रभावी होता हैं | इसी को प्रभाविता का नियम कहते हैं | इस क्रिया में जो गुण या कारक प्रकट होता हैं या जो दूसरे गुण को प्रदर्शित नही होने देता , उसे प्रभावी गुण या कारक (Dominant factor) कहते हैं | जबकि वह गुण जो प्रकट नही होता , उसे अप्रभावी गुण या कारक (Recessive factor) कहते हैं , और इस तरह हम जीन पृथक्करण करके अनुवांशिक बीमारियों की संभावना को न्यूनतम कर सकते है, और वैदिक ऋषियों ने यही तो किया उन्होंने जीन की शुद्धता बनाये रखने के लिए अलग अलग गोत्रो में शादियां कराई यानी अलग अलग युग्मक ।
मेंण्डल के नियम के अनुसार प्रत्येक जीन जोड़ी के कारक (जीन ) युग्मकों के निर्माण के समय एक-दूसरे से पृथक होकर अलग-अलग युग्मकों में चले जाते हैं तथा युग्मनज (zygote) निर्माण में ये कारक पुंन: एक-दूसरे के साथ आ जाते हैं तथा अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं | इस प्रकार जीन या कारक द्वारा अपना अस्तित्व या जीन की शुद्धता बनाए रखने के कारण इस नियम को युग्मकों की शुद्धता का नियम कहते हैं , कोशिकाओं को नियंत्रित करने का कार्य गुणसूत्र में मौजूद डीएनए का होता है। हमें डीएनए का एक हिस्सा मां से और दूसरा हिस्सा पिता से मिलता है। डीएनए में हमारा जेनेटिक कोड होता है, जिससे माता-पिता की आदतें व रोग संतान तक पहुंचती हैं। इसी में खराबी से जेनेटिक डिसॉर्डर होने की आशंका बढ़ती है, और यदि हम एक संकर संकरण के प्रयोग में जब एक ही लक्षण के दो विरोधी गुणों वाले पौधों के बीच संकरण कराया जाता हैं , तो प्रथम पीढ़ी (F1) में वही गुण प्रदर्शित होता हैं जो प्रभावी होता हैं | इसी को प्रभाविता का नियम कहते हैं | इस क्रिया में जो गुण या कारक प्रकट होता हैं या जो दूसरे गुण को प्रदर्शित नही होने देता , उसे प्रभावी गुण या कारक (Dominant factor) कहते हैं | जबकि वह गुण जो प्रकट नही होता , उसे अप्रभावी गुण या कारक (Recessive factor) कहते हैं , और इस तरह हम जीन पृथक्करण करके अनुवांशिक बीमारियों की संभावना को न्यूनतम कर सकते है, और वैदिक ऋषियों ने यही तो किया उन्होंने जीन की शुद्धता बनाये रखने के लिए अलग अलग गोत्रो में शादियां कराई यानी अलग अलग युग्मक ।
#वैदिक_गोत्र_प्रणाली -
वैदिक/ हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारन यह है की एक ही गोत्र से होने के कारन वह पुरुष व् स्त्री भाई बहिन कहलाये क्यू की उनका पूर्वज एक ही है । लेकिन इसके पीछे एक मुख्य कारन एक ही गोत्र होने के कारण गुणसूत्रों में समानता का भी है । आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों का साथ उत्पन्न होगी ।
वैदिक/ हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारन यह है की एक ही गोत्र से होने के कारन वह पुरुष व् स्त्री भाई बहिन कहलाये क्यू की उनका पूर्वज एक ही है । लेकिन इसके पीछे एक मुख्य कारन एक ही गोत्र होने के कारण गुणसूत्रों में समानता का भी है । आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों का साथ उत्पन्न होगी ।
ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता। ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं जिन्हें वैदिक ऋषियो ने दूसरे गोत्र में विवाह करने से दूर किया। शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था।
#धर्मसूत्र कहता है-
‘संगौत्राय दुहितरेव प्रयच्छेत्”
अर्थात - समान गौत्र के पुरुष को कन्या नहीं देना चाहिए)।
‘संगौत्राय दुहितरेव प्रयच्छेत्”
अर्थात - समान गौत्र के पुरुष को कन्या नहीं देना चाहिए)।
#बौधायन कहते है -
संगौत्रचेदमत्योपयच्छते मातृपयेनां विमृयात्
अर्थत - गौत्र जन्मना प्राप्त नहीं होता, इसलिए विवाह के पश्चात कन्या का गौत्र बदल जाता है और उसके लिए उसके पति का गौत्र लागू हो जाता है।
मनुस्मृति -
संगौत्रचेदमत्योपयच्छते मातृपयेनां विमृयात्
अर्थत - गौत्र जन्मना प्राप्त नहीं होता, इसलिए विवाह के पश्चात कन्या का गौत्र बदल जाता है और उसके लिए उसके पति का गौत्र लागू हो जाता है।
मनुस्मृति -
#आपस्तम्ब धर्मसूत्र कहता है- 'संगौत्राय दुहितरेव प्रयच्छेत्' (समान गौत्र के पुरुष को कन्या नहीं देना चाहिए)। असमान गौत्रीय के साथ विवाह न करने पर भूल पुरुष के ब्राह्मणत्व से च्युत हो
#गौतमधर्म सूत्र -
(4/2) में भी असमान प्रवर विवाह का निर्देश दिया गया है। (असमान प्रवरैर्विगत) आपस्तम्ब
(4/2) में भी असमान प्रवर विवाह का निर्देश दिया गया है। (असमान प्रवरैर्विगत) आपस्तम्ब
#मत्स्यपुराण (4/2) में -
ब्राह्मण के साथ संगौत्रीय शतरूपा के विवाह पर आश्चर्य और खेद प्रकट किया गया है।
ब्राह्मण के साथ संगौत्रीय शतरूपा के विवाह पर आश्चर्य और खेद प्रकट किया गया है।
#मनुस्मृति में -
असपिंडा च या मातुरसगोत्रा च या पितु:
सा प्रशस्ता द्विजातिनां दारकर्मणि मैथुने (3/5)
अर्थात - जो कन्या माता के कुल की छः पीढ़ियों में न हो और पिता के गोत्र की न हो , उस कन्या से विवाह करना उचित है । वर-वधू का एक वर्ण होते हुए भी उनके भिन्न-भिन्न गौत्र और प्रवर होना आवश्यक है (मनुस्मृति- 3/5)।
असपिंडा च या मातुरसगोत्रा च या पितु:
सा प्रशस्ता द्विजातिनां दारकर्मणि मैथुने (3/5)
अर्थात - जो कन्या माता के कुल की छः पीढ़ियों में न हो और पिता के गोत्र की न हो , उस कन्या से विवाह करना उचित है । वर-वधू का एक वर्ण होते हुए भी उनके भिन्न-भिन्न गौत्र और प्रवर होना आवश्यक है (मनुस्मृति- 3/5)।
हिनक्रियं निष्पुरुषम् निश्छन्दों रोम शार्शसम् ।
क्षय्यामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठीकुलानिच ।। मनुस्मृति3/7
अर्थात-
जो कुल सत्क्रिया से हिन्,सत्पुरुषों से रहित , वेदाध्ययन से विमुख , शरीर पर बड़े बड़े लोम , अथवा बवासीर , क्षय रोग , दमा , खांसी , आमाशय , मिरगी , श्वेतकुष्ठ और गलितकुष्ठयुक्त कुलो की कन्या या वर के साथ विवाह न होना चाहिए , क्यू की ये सब दुर्गुण और रोग विवाह करने वाले के कुल में प्रविष्ट हो जाते है ।
क्षय्यामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठीकुलानिच ।। मनुस्मृति3/7
अर्थात-
जो कुल सत्क्रिया से हिन्,सत्पुरुषों से रहित , वेदाध्ययन से विमुख , शरीर पर बड़े बड़े लोम , अथवा बवासीर , क्षय रोग , दमा , खांसी , आमाशय , मिरगी , श्वेतकुष्ठ और गलितकुष्ठयुक्त कुलो की कन्या या वर के साथ विवाह न होना चाहिए , क्यू की ये सब दुर्गुण और रोग विवाह करने वाले के कुल में प्रविष्ट हो जाते है ।
भारतीय गोत्र प्रणाली मेंडल के प्रतिपादित तीनो नियम -
1 – प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)
2 – विसंयोजन का नियम (Law of Segregation) या पृथक्करण का नियम (Law of Segregation) या युग्मकों की शुद्धता का नियम (Law of Purity of Gametes)
3 – स्वतन्त्र अपव्यूहन का नियम ( Law of Independent Assortment)
के प्रतिपादित किये जाने के हजारों सालों पहले से ना सिर्फ अस्तित्व में है बल्कि इस परंपरा को हम सदियो पहले से निर्वहन करते आ रहे है ।।
1 – प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)
2 – विसंयोजन का नियम (Law of Segregation) या पृथक्करण का नियम (Law of Segregation) या युग्मकों की शुद्धता का नियम (Law of Purity of Gametes)
3 – स्वतन्त्र अपव्यूहन का नियम ( Law of Independent Assortment)
के प्रतिपादित किये जाने के हजारों सालों पहले से ना सिर्फ अस्तित्व में है बल्कि इस परंपरा को हम सदियो पहले से निर्वहन करते आ रहे है ।।
#गोत्र_प्रणाली_से_लाभ -
आधुनिक विज्ञान कहता है कि जीन्स की संरचना में बदलाव आना आनुवंशिक रोगों का मुख्य कारण है। जीन्स, डीएनए का भाग होते हैं। डीएनए, आरएनए और प्रोटीन मिलकर क्रोमोजोम या गुणसूत्र का निर्माण करते हैं। जीन्स का रूप बदलने के कारण गुणसूत्रों में बदलाव आ जाता है। हमारे शरीर में लाखों कोशिकाएं हैं। हर कोशिका में 23 जोड़ों के रूप में कुल 46 गुणसूत्र होते हैं। यही गुणसूत्र एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक गुण व दोषों को पहुंचाते हैं। कोशिकाओं को नियंत्रित करने का कार्य गुणसूत्र में मौजूद डीएनए का होता है। हमें डीएनए का एक हिस्सा मां से और दूसरा हिस्सा पिता से मिलता है। डीएनए में हमारा जेनेटिक कोड होता है, जिससे माता-पिता की आदतें व रोग संतान तक पहुंचती हैं। इसी में खराबी से जेनेटिक डिसॉर्डर होने की आशंका बढ़ती है।
आधुनिक विज्ञान कहता है कि जीन्स की संरचना में बदलाव आना आनुवंशिक रोगों का मुख्य कारण है। जीन्स, डीएनए का भाग होते हैं। डीएनए, आरएनए और प्रोटीन मिलकर क्रोमोजोम या गुणसूत्र का निर्माण करते हैं। जीन्स का रूप बदलने के कारण गुणसूत्रों में बदलाव आ जाता है। हमारे शरीर में लाखों कोशिकाएं हैं। हर कोशिका में 23 जोड़ों के रूप में कुल 46 गुणसूत्र होते हैं। यही गुणसूत्र एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक गुण व दोषों को पहुंचाते हैं। कोशिकाओं को नियंत्रित करने का कार्य गुणसूत्र में मौजूद डीएनए का होता है। हमें डीएनए का एक हिस्सा मां से और दूसरा हिस्सा पिता से मिलता है। डीएनए में हमारा जेनेटिक कोड होता है, जिससे माता-पिता की आदतें व रोग संतान तक पहुंचती हैं। इसी में खराबी से जेनेटिक डिसॉर्डर होने की आशंका बढ़ती है।
#सारांश_में - गोत्र प्रणाली यानी जीन शुद्धिकरण से
अनुवांशिक बीमारियों की संभावना को खत्म करना -
अनुवांशिक बीमारियों की संभावना को खत्म करना -
#विशेष -
हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक ही गौत्र या एक ही कुल में विवाह करना पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है। विज्ञान मानता है कि एक ही गोत्र में शादी करने का सीधा असर संतान पर पड़ता है। एक ही गौत्र या कुल में विवाह होने पर दंपत्ति की संतान अनुवांशिक दोष के साथ उत्पन्न होती है। ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता। साथ ही ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। कई शोध में भी इस बात का खुलासा हो चुका है कि एक ही गोत्र में शादी करने पर अधिकांश दंपत्तियों की संतान मानसिक रूप से विकलांग, नकरात्मक सोच वाले, अपंगता और अन्य गंभीर रोगों के साथ जन्म लेती है। इसलिए एक ही गोत्र में शादी करने से बचना चाहिए।
विज्ञान कहता है कि स्त्री-पुरुष के गोत्र में जितनी अधिक दूरी होगी संतान उतनी ही स्वस्थ, प्रतिभाशाली और गुणी पैदा होगी। उनमें आनुवंशिक रोग होने की संभावनाएं कम से कम होती हैं। उनके गुणसूत्र बहुत मजबूत होते हैं और वे जीवन-संघर्ष में सपरिस्थितियों का दृढ़ता के साथ मुकाबला करते हैं। इन कारणों से शास्त्रों में एक ही गोत्र में विवाह करने की मनाही है। कहा जाता है कि वर और कन्या के एक ही गोत्र में विवाह करने से उनकी संतान स्वस्थ नहीं होती है एवं उसे कोई ना कोई कष्ट झेलना ही पड़ता है।
आधुनिक अनुवांशिक विज्ञान जिसकी जानकारी सदियो पहले से उपलब्ध है बस उपेक्षा के कारण आज भी हम उसके ज्ञान से वंचित रह रहे है ।
हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक ही गौत्र या एक ही कुल में विवाह करना पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है। विज्ञान मानता है कि एक ही गोत्र में शादी करने का सीधा असर संतान पर पड़ता है। एक ही गौत्र या कुल में विवाह होने पर दंपत्ति की संतान अनुवांशिक दोष के साथ उत्पन्न होती है। ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता। साथ ही ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। कई शोध में भी इस बात का खुलासा हो चुका है कि एक ही गोत्र में शादी करने पर अधिकांश दंपत्तियों की संतान मानसिक रूप से विकलांग, नकरात्मक सोच वाले, अपंगता और अन्य गंभीर रोगों के साथ जन्म लेती है। इसलिए एक ही गोत्र में शादी करने से बचना चाहिए।
विज्ञान कहता है कि स्त्री-पुरुष के गोत्र में जितनी अधिक दूरी होगी संतान उतनी ही स्वस्थ, प्रतिभाशाली और गुणी पैदा होगी। उनमें आनुवंशिक रोग होने की संभावनाएं कम से कम होती हैं। उनके गुणसूत्र बहुत मजबूत होते हैं और वे जीवन-संघर्ष में सपरिस्थितियों का दृढ़ता के साथ मुकाबला करते हैं। इन कारणों से शास्त्रों में एक ही गोत्र में विवाह करने की मनाही है। कहा जाता है कि वर और कन्या के एक ही गोत्र में विवाह करने से उनकी संतान स्वस्थ नहीं होती है एवं उसे कोई ना कोई कष्ट झेलना ही पड़ता है।
आधुनिक अनुवांशिक विज्ञान जिसकी जानकारी सदियो पहले से उपलब्ध है बस उपेक्षा के कारण आज भी हम उसके ज्ञान से वंचित रह रहे है ।
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