PART 4
प्राचीन भारतीय संस्कृति में भवन निर्माण कला की बारीकी और उन्नत तकनीकी सभी को आकर्षित और आश्चर्यचकित करती है , आधुनिक भवन निर्माण तकनीकी की यदि हम प्राचीन निर्माण तकनीकी से तुलना करें तो आज की आधुनिक तकनीक कही पीछे है जहाँ आज वास्तु कला जिसे आर्किटेक्टर कहते है सिर्फ ईट, गारा, फिनिशिंग और भूकंपरोधी तकनीकी के इस्तेमाल भर है वही प्राचीन वास्तुकला , शिल्पशास्त्र , स्थापत्यकला ,वास्तु शास्त्र , और उन्नत भूकम्परोधी विज्ञान के मिश्रित निर्माण शैली रखते है सिर्फ यही नही सूर्य की ब्रह्मांड की रश्मियां, उसके प्रकाश और ताप, वायु प्रवाह की दिशा, पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव तथा पृथ्वी पर अंतरिक्षीय ग्रह-पिंडों के प्रभाव का भी विशेष ध्यान रखा जाता था ।।
#सीमेंट_या_आयुर्वेदिक_मसाला -
आधुनिक सीमेंट का असली नाम पोर्टलैंड सीमेंट है जिसे सामान्य भाषा मे पोर्टल सीमेंट कहते है ,और पोर्टल कोई ब्रांड या कंपनी का नाम नहीं है यह सिर्फ पोर्टलैंड की भाषा में इसे पोर्टल सीमेंट कहा जाता है। सबसे पहले सन ,1824 में यूसुफ असपदीन ने पोर्टलैंड सीमेंट” को पेटेंट करवाया उन्होंने इसे मिट्टी और चूना पत्थर से बनाया इसे कंक्रीट से बनाया था इसलिए इसे पोर्टलैंड सीमेंट कहा क्योकि पोर्टलैंड चुना पत्थर की तरह दिखता है, और सन 1845 में एशेज जॉनसन ने पोर्टलैंड सीमेंट को आधुनिक उपयोग के लिए बनाया। सामान्यतः सीमेंट की उम्र लगभग 200 से 250साल होती है मतलब यदि किसी की जुड़ाई सीमेंट से करे तो 300 साल बाद मिट्टी से जुड़ी होने जितनी आसानी से उन्हें अलग किया जा सकता है ।
आधुनिक सीमेंट का असली नाम पोर्टलैंड सीमेंट है जिसे सामान्य भाषा मे पोर्टल सीमेंट कहते है ,और पोर्टल कोई ब्रांड या कंपनी का नाम नहीं है यह सिर्फ पोर्टलैंड की भाषा में इसे पोर्टल सीमेंट कहा जाता है। सबसे पहले सन ,1824 में यूसुफ असपदीन ने पोर्टलैंड सीमेंट” को पेटेंट करवाया उन्होंने इसे मिट्टी और चूना पत्थर से बनाया इसे कंक्रीट से बनाया था इसलिए इसे पोर्टलैंड सीमेंट कहा क्योकि पोर्टलैंड चुना पत्थर की तरह दिखता है, और सन 1845 में एशेज जॉनसन ने पोर्टलैंड सीमेंट को आधुनिक उपयोग के लिए बनाया। सामान्यतः सीमेंट की उम्र लगभग 200 से 250साल होती है मतलब यदि किसी की जुड़ाई सीमेंट से करे तो 300 साल बाद मिट्टी से जुड़ी होने जितनी आसानी से उन्हें अलग किया जा सकता है ।
#वैदिक_साहित्य_में_आयुर्वेदिक_भवन_निर्माण_मसाला -
प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में 64 कलाओं का उल्लेख मिलता है, जिनका ज्ञान प्रत्येक सुसंस्कृत नागरिक के लिए अनिवार्य समझा जाता था। इसीलिए भर्तृहरि ने तो यहाँ तक कह डाला 'साहित्य, संगीत, कला विहीनः साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः।' अर्थात् साहित्य, संगीत और कला से विहीन व्यक्ति पशु के समान है। भारतीय संस्कृति में इसी में एक कला भवन निर्माण की भी है भारतीय संस्कृति में चिनाई के मसाले बनाने की तकनीकें बहुत प्राचीनकाल से विकसित हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता में कई प्रकार के मसाले इस्तेमाल किए जाते थे। मोहनजोदड़ो के खंडहर शहर में सन् 2600 ईसापूर्व से भी पुराने चिनाई के मसाले का प्रयोग मिलता है। कुओं और नालियों को बनाने के लिए यहाँ हलकी भूरी रंग की खरिया मिट्टी (हरसौंठ या जिपसम) का मसाला इस्तेमाल होता था जो रेत, मुल्तानी मिटटी, चूना और कैल्शियम कार्बोनेट मिलकर बनाई जाती थी। मोहन जोदड़ो के महास्नानघर में प्रयोग होने वाले मसाले में डामर (बिटुमन) भी मिलाया गया था जो पानी चूने से रोकता है। प्राचीन निर्माणों में जोड़ने के लिए जो मसाले प्रयोग में लाये जाते थे उन्हें बनाने का तरीका बेहद सामान्य और सस्ता होता था और आसानी से उपलब्ध भी हो जाता था इनमें - बेल (वुड एप्पल) तम्बाकू ,चुना जिप्सम , लासा (रेजीन्स) जैसे तत्व सम्मिलित किये जाते थे ।इनकी मजबूती सीमेंट से 400 गुना अधिक मजबूत होती है ।।
प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में 64 कलाओं का उल्लेख मिलता है, जिनका ज्ञान प्रत्येक सुसंस्कृत नागरिक के लिए अनिवार्य समझा जाता था। इसीलिए भर्तृहरि ने तो यहाँ तक कह डाला 'साहित्य, संगीत, कला विहीनः साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः।' अर्थात् साहित्य, संगीत और कला से विहीन व्यक्ति पशु के समान है। भारतीय संस्कृति में इसी में एक कला भवन निर्माण की भी है भारतीय संस्कृति में चिनाई के मसाले बनाने की तकनीकें बहुत प्राचीनकाल से विकसित हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता में कई प्रकार के मसाले इस्तेमाल किए जाते थे। मोहनजोदड़ो के खंडहर शहर में सन् 2600 ईसापूर्व से भी पुराने चिनाई के मसाले का प्रयोग मिलता है। कुओं और नालियों को बनाने के लिए यहाँ हलकी भूरी रंग की खरिया मिट्टी (हरसौंठ या जिपसम) का मसाला इस्तेमाल होता था जो रेत, मुल्तानी मिटटी, चूना और कैल्शियम कार्बोनेट मिलकर बनाई जाती थी। मोहन जोदड़ो के महास्नानघर में प्रयोग होने वाले मसाले में डामर (बिटुमन) भी मिलाया गया था जो पानी चूने से रोकता है। प्राचीन निर्माणों में जोड़ने के लिए जो मसाले प्रयोग में लाये जाते थे उन्हें बनाने का तरीका बेहद सामान्य और सस्ता होता था और आसानी से उपलब्ध भी हो जाता था इनमें - बेल (वुड एप्पल) तम्बाकू ,चुना जिप्सम , लासा (रेजीन्स) जैसे तत्व सम्मिलित किये जाते थे ।इनकी मजबूती सीमेंट से 400 गुना अधिक मजबूत होती है ।।
#आधुनिक -
आधुनिक विज्ञान कहता है कि मकान को बनाने से पहले उसका नक्शा किसी योग्य आर्किटेक्ट से बनवाएं। मकान की नींव ईंटों के स्थान पर आरसीसी की बनवाएं, बीम कालम छत ये वो ऐसी बहोत से कहानियां मिलेंगी लेकिन यदि रिएक्टर 10 या उससे ऊपर के भूकम्प आये तो ये तकनीकी मकानों की तरह धूल में मिली दिखेगी जबकि वही वैदिक साहित्य के ज्ञान को आइये देखते है ।
आधुनिक विज्ञान कहता है कि मकान को बनाने से पहले उसका नक्शा किसी योग्य आर्किटेक्ट से बनवाएं। मकान की नींव ईंटों के स्थान पर आरसीसी की बनवाएं, बीम कालम छत ये वो ऐसी बहोत से कहानियां मिलेंगी लेकिन यदि रिएक्टर 10 या उससे ऊपर के भूकम्प आये तो ये तकनीकी मकानों की तरह धूल में मिली दिखेगी जबकि वही वैदिक साहित्य के ज्ञान को आइये देखते है ।
#वैदिक -
प्राचीन भवन निर्माण तकनीकी के अनुसार यदि 11 से लेकर 13 रिएक्टर तक भी भूकम्प आये तो भी उससे बचा जा सकता है उदाहरण के लिए एक तकनीकी साझा कर रहा हूँ -
भारत के सिरपुर सुरंग टीला के शिवमंदिर के प्रत्येक गर्भगृह के सामने एक मीटर लंबा, आधा मीटर चौड़ा और 60 से 80 फीट गहरा कुंड खोदा गया है, जिसको वैक्यूम बनाकर सील कर दिया गया है। जैसा कि सब जानते हैं कि शून्य में भूकंप आदि ध्वनि की तरंग प्रवेश नहीं कर सकती, जिसके कारण पूरा मंदिर सुरक्षित रहा है ,11वीं शताब्दी में सिरपुर में भयंकर भूकंप आया था. इसके चलते दूसरे मकान या मंदिर की सीढ़ी तो ढह गए, लेकिन इन सुरंग टीलों को कोई नुकसान नहीं हुआ वो आज भी सुरक्षित है । ऐसी बहोत सी तकनीकियां है जिनपर आज के मैकाले पुत्र रिसर्च न करके पश्चिमी सभ्यता की अंधाधुंध नकल कर रहे है।
प्राचीन भवन निर्माण तकनीकी के अनुसार यदि 11 से लेकर 13 रिएक्टर तक भी भूकम्प आये तो भी उससे बचा जा सकता है उदाहरण के लिए एक तकनीकी साझा कर रहा हूँ -
भारत के सिरपुर सुरंग टीला के शिवमंदिर के प्रत्येक गर्भगृह के सामने एक मीटर लंबा, आधा मीटर चौड़ा और 60 से 80 फीट गहरा कुंड खोदा गया है, जिसको वैक्यूम बनाकर सील कर दिया गया है। जैसा कि सब जानते हैं कि शून्य में भूकंप आदि ध्वनि की तरंग प्रवेश नहीं कर सकती, जिसके कारण पूरा मंदिर सुरक्षित रहा है ,11वीं शताब्दी में सिरपुर में भयंकर भूकंप आया था. इसके चलते दूसरे मकान या मंदिर की सीढ़ी तो ढह गए, लेकिन इन सुरंग टीलों को कोई नुकसान नहीं हुआ वो आज भी सुरक्षित है । ऐसी बहोत सी तकनीकियां है जिनपर आज के मैकाले पुत्र रिसर्च न करके पश्चिमी सभ्यता की अंधाधुंध नकल कर रहे है।
#भवन_निर्माण_और_पर्यावरण -
आधुनिक समय मे पर्यावरण की सुरक्षा के दृष्टिकोण से अच्छे भवनों के निर्माण के लिए तीन मुख्य उपायों पर ध्यान दिया जा सकता है। शीत या तापकरण के लिए सूर्य और वायु जैसे प्राकृतिक स्रोतों का दोहन, जलवायु नियंत्रण व्यवस्था के लिए कुशल उपकरणों का चयन और भूकंपरोधी परिष्कृत निर्माण सामग्रियों का इस्तेमाल। सूर्य की आकाशीय स्थिति को ध्यान में रखकर मकान बनाए जाने से उसमें मौसम के अनुकूल सुविधाएं सहज उपलब्ध हो जाती हैं और उनके लिए ऊर्जा की खपत भी नहीं होती। सूर्य की किरणों से शीत-ताप नियंत्रण व्यवस्था में उत्तर रूख के मकान उपयुक्त माने गए हैं। इसी तरह खिड़कियों के भी सूर्य की स्थिति के अनुरूप लगाने से कमरों में रोशनी का समुचित प्रबंध संभव है।
आधुनिक समय मे पर्यावरण की सुरक्षा के दृष्टिकोण से अच्छे भवनों के निर्माण के लिए तीन मुख्य उपायों पर ध्यान दिया जा सकता है। शीत या तापकरण के लिए सूर्य और वायु जैसे प्राकृतिक स्रोतों का दोहन, जलवायु नियंत्रण व्यवस्था के लिए कुशल उपकरणों का चयन और भूकंपरोधी परिष्कृत निर्माण सामग्रियों का इस्तेमाल। सूर्य की आकाशीय स्थिति को ध्यान में रखकर मकान बनाए जाने से उसमें मौसम के अनुकूल सुविधाएं सहज उपलब्ध हो जाती हैं और उनके लिए ऊर्जा की खपत भी नहीं होती। सूर्य की किरणों से शीत-ताप नियंत्रण व्यवस्था में उत्तर रूख के मकान उपयुक्त माने गए हैं। इसी तरह खिड़कियों के भी सूर्य की स्थिति के अनुरूप लगाने से कमरों में रोशनी का समुचित प्रबंध संभव है।
वही वैदिक साहित्य में वास्तु विज्ञान में इसका उत्कृष्ट प्रदर्शन है इसके अनुसार उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम ये चार मूल दिशाएं हैं। वास्तु विज्ञान में इन चार दिशाओं के अलावा 4 विदिशाएं हैं। आकाश और पाताल को भी इसमें दिशा स्वरूप शामिल किया गया है। इस प्रकार चार दिशा, चार विदिशा और आकाश पाताल को जोड़कर इस विज्ञान में दिशाओं की संख्या कुल दस माना गया है। मूल दिशाओं के मध्य की दिशा ईशान, आग्नेय, नैऋत्य और वायव्य को विदिशा कहा गया है। यदि भवन निर्माण कला में से वास्तु विज्ञान को निकाल दिया जाए तो उसकी कीमत शून्य है। वह केवल ईंट, पत्थर, लोहे, सीमेंट के ढेर के सिवाय और कुछ नहीं। वास्तु नियमों का पालन करने से व्यक्ति को आकाशीय ऊर्जा अधिक प्राप्त होती है। शास्त्र और विज्ञान दोनों के अनुसार आकाशीय ऊर्जा अधिक मिलने से शरीर की शक्ति बढ़ती है तथा मन प्रसन्न रहता है। जीवन के लिए पांच तत्वों की परम आवश्यकता होती है। इन पांच तत्वों की दिशाएं निर्धारित हैं। ये तत्व हैं वायु, आकाश, अग्नि, जल तथा पृथ्वी। इनमें से पृथ्वी तत्व की मात्रा ज्यादा होने के कारण मनुष्य के अस्तित्व को एक स्पष्ट आकार मिलता है। इन पंच महाभूतों के अनुसार रहन-सहन हो तो इसका पूरा-पूरा लाभ मनुष्य को प्राप्त होगा।
#विशेष -
युगों के द्रुत विकासक्रम में वास्तुकला विकसी, ढली और मानव की परिवर्तनशील आवश्यकताओं के - उसकी सुरक्षा, कार्य, धर्म, आनंद और अन्य युगप्रर्वतक चिह्नों, अनुरूप बनी। मिस्र के सादे स्वरूप, चीन के मानक अभिकल्प-स्वरूप, भारत के विदेशी तथा समृद्ध स्वरूप, मैक्सिको के मय और ऐजटेक की अनगढ़ महिमा, यूनान के अत्यंत विकसित देवायतन, रोमन साम्राज्य की बहुविध आवश्यकताओं की पूर्ति करनेवाले जटिल प्रकार के भवन, पुराकालीन आडंबरहीन गिरजे, महान् गाथिक गिरजा भवन और चित्रोपम दुर्ग, तुर्की इमारतों के उत्कृष्ट विन्यास एवं अनुपात और यूरोपीय पुनरुत्थान के भव्य वास्तुकीय स्मारक ऐतिहासिक वास्तु के सतत विकास का लेखा प्रस्तुत करते हैं। ये सब इमारतें मानव विकास के महान युगों की ओर इंगित करती हैं, जिनमें वास्तुकला जातीय जीवन से अत्यधिक संबंधित होने के कारण उन जातियों की प्रतिभा और महत्वाकांक्षा का, जिनकी उनके स्मारकों पर सुस्पष्ट छाप हैं, दिग्दर्शन कराती हैं। और इनकी तकनिकी आज की आधुनिक तकनिकियो से कही उन्नत थी इसी क्रम में एक मंदिर -
युगों के द्रुत विकासक्रम में वास्तुकला विकसी, ढली और मानव की परिवर्तनशील आवश्यकताओं के - उसकी सुरक्षा, कार्य, धर्म, आनंद और अन्य युगप्रर्वतक चिह्नों, अनुरूप बनी। मिस्र के सादे स्वरूप, चीन के मानक अभिकल्प-स्वरूप, भारत के विदेशी तथा समृद्ध स्वरूप, मैक्सिको के मय और ऐजटेक की अनगढ़ महिमा, यूनान के अत्यंत विकसित देवायतन, रोमन साम्राज्य की बहुविध आवश्यकताओं की पूर्ति करनेवाले जटिल प्रकार के भवन, पुराकालीन आडंबरहीन गिरजे, महान् गाथिक गिरजा भवन और चित्रोपम दुर्ग, तुर्की इमारतों के उत्कृष्ट विन्यास एवं अनुपात और यूरोपीय पुनरुत्थान के भव्य वास्तुकीय स्मारक ऐतिहासिक वास्तु के सतत विकास का लेखा प्रस्तुत करते हैं। ये सब इमारतें मानव विकास के महान युगों की ओर इंगित करती हैं, जिनमें वास्तुकला जातीय जीवन से अत्यधिक संबंधित होने के कारण उन जातियों की प्रतिभा और महत्वाकांक्षा का, जिनकी उनके स्मारकों पर सुस्पष्ट छाप हैं, दिग्दर्शन कराती हैं। और इनकी तकनिकी आज की आधुनिक तकनिकियो से कही उन्नत थी इसी क्रम में एक मंदिर -
श्रीरंगम को दुनिया का सबसे बड़ा क्रियाशील हिन्दू मंदिर माना जा सकता है क्योंकि इसका क्षेत्रफल लगभग 6,31,000 वर्ग मी (156 एकड़) है जिसकी परिधि 4 किमी (10,710 फीट) है। श्रीरंगम सबसे बड़ा क्रियाशील मंदिर होने का दावा करता है क्योंकि भले ही अंगकोर वट दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर है लेकिन गैर-क्रियाशील हिन्दू मंदिर है।श्रीरंगम मंदिर का परिसर 7 संकेंद्रित दीवारी अनुभागों और 21 गोपुरम से बना है ।मंदिर के गोपुरम को राजगोपुरम कहा जाता है और यह 236 फीट (72 मी) है जो एशिया में सबसे लम्बा है।इसके बारे में एक मिथक है कि गोपुरम के ऊपर से श्रीलंका के तट को देखा जा सकता है। मंदिर का गठन सात प्रकारों (उन्नत घेरों) से हुआ है जिसका गोपुरम अक्षीय पथ से जुड़ा हुआ है जो सबसे बाहरी प्रकार की तरफ सबसे ऊंचा और एकदम अन्दर की तरफ सबसे नीचा है।
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