PART 9
PART 9
पर्यावरणीय विज्ञान (environmental science)
पर्यावरण के भौतिकीय, रासायनिक और जैविक अवयवों के बीच पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन है। पर्यावरणीय विज्ञान पर्यावरणीय व्यवस्था के अध्ययन के लिए समन्वित, परिमाणात्मक और अन्तरविषयक दृष्टिकोण उपलब्ध कराता है। आसान शब्दो मे - पर्यावरण के अध्ययन के विज्ञान को पर्यावरण विज्ञान कहा जाता है। पर्यावरण विज्ञान का वह क्षेत्र, जिसमें पर्यावरण के भौतिक, रासायनिक और जैविक घटकों के संबंधों का अध्ययन किया जाता है और पर्यावरण में जीवों के साथ इन घटकों के प्रभावों और रिश्तों का भी अध्ययन होता है। पर्यावरण विज्ञान में कई विषयों से जानकारी और विचार शामिल हैं और पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान का पता चलता है। प्राकृतिक विज्ञान के भीतर, जीव विज्ञान, भूविज्ञान, पारिस्थितिकी, महासागरीय विज्ञान और रसायन विज्ञान जैसे क्षेत्रों को पर्यावरण विज्ञान में शामिल किया गया है।
पर्यावरण के भौतिकीय, रासायनिक और जैविक अवयवों के बीच पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन है। पर्यावरणीय विज्ञान पर्यावरणीय व्यवस्था के अध्ययन के लिए समन्वित, परिमाणात्मक और अन्तरविषयक दृष्टिकोण उपलब्ध कराता है। आसान शब्दो मे - पर्यावरण के अध्ययन के विज्ञान को पर्यावरण विज्ञान कहा जाता है। पर्यावरण विज्ञान का वह क्षेत्र, जिसमें पर्यावरण के भौतिक, रासायनिक और जैविक घटकों के संबंधों का अध्ययन किया जाता है और पर्यावरण में जीवों के साथ इन घटकों के प्रभावों और रिश्तों का भी अध्ययन होता है। पर्यावरण विज्ञान में कई विषयों से जानकारी और विचार शामिल हैं और पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान का पता चलता है। प्राकृतिक विज्ञान के भीतर, जीव विज्ञान, भूविज्ञान, पारिस्थितिकी, महासागरीय विज्ञान और रसायन विज्ञान जैसे क्षेत्रों को पर्यावरण विज्ञान में शामिल किया गया है।
#आधुनिक_विज्ञान_और_पर्यावरण_संरक्षण -
ऐसा अनुमान है कि पृथ्वी की सम्पूर्ण जैव विविधता का एक चौथाई भाग आने वाले 20-30 वर्षों में विलुप्त होने की सम्भावना है। इस प्रकार उष्ण कटिबन्धीय वन पृथ्वी के 7 प्रतिशत भू-भाग में फैला हुआ है परन्तु विश्व की आधे से अधिक प्रजातियाँ इन्हीं क्षेत्रों में मिलती हैं। एक अनुमान के अनुसार 2020 तक इन वनों के विनाश से 5-15 प्रतिशत प्रजातियाँ या 15,000-500,000 प्रजातियाँ प्रतिवर्ष या 40-140 प्रजातियाँ प्रतिदिन लुप्त होंगी। विश्व संरक्षण एवं अनुमापन केन्द्र कनाडा के अनुसार करीब 22,000 पादप तथा जीव-जन्तु वास्तव में विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गए हैं। जैव विविधता में कमी का मुख्य कारण मानवीय क्रिया-कलाप, कृत्रिम परिर्वतन एवं पर्यावरणीय विनाश है।
पृथ्वी का तीन चौथाई भाग जल है, जिसमें 97 प्रतिशत सामुद्रिक खारा पानी तथा 3.00 प्रतिशत स्वच्छ जल है। इसका भी 77 प्रतिशत ध्रुवों एवं हिमानी के रूप में, 22 प्रतिशत भूमिगत जल और शेष एक प्रतिशत नदियों, झीलों तथा तालाबों में पाया जाता है।
स्वच्छ जल से पादपों, जीव-जन्तुओं का पोषक होता है एवं जलीय जीव-जन्तुओं एवं पादपों का आवास बनाता है। इसके अतिरिक्त यह कृषि उद्योग तथा दैनिक जीवन में भी काम आता है। वर्तमान समय में विश्व में कृषि के लिये 68 प्रतिशत उद्योगों के लिये 24 प्रतिशत तथा दैनिक उपयोग, पशुओं, मनोरंजन तथा अन्य कार्यों में 08 प्रतिशत जल का उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार भारत में 93.37 प्रतिशत कृषि, 1.08 प्रतिशत पशुओं 1.26 प्रतिशत उद्योगों और 3.13 प्रतिशत नगर पालिकाओं एवं ग्रामीण जल आपूर्ति के लिये किया जाता है।
ऐसा अनुमान है कि पृथ्वी की सम्पूर्ण जैव विविधता का एक चौथाई भाग आने वाले 20-30 वर्षों में विलुप्त होने की सम्भावना है। इस प्रकार उष्ण कटिबन्धीय वन पृथ्वी के 7 प्रतिशत भू-भाग में फैला हुआ है परन्तु विश्व की आधे से अधिक प्रजातियाँ इन्हीं क्षेत्रों में मिलती हैं। एक अनुमान के अनुसार 2020 तक इन वनों के विनाश से 5-15 प्रतिशत प्रजातियाँ या 15,000-500,000 प्रजातियाँ प्रतिवर्ष या 40-140 प्रजातियाँ प्रतिदिन लुप्त होंगी। विश्व संरक्षण एवं अनुमापन केन्द्र कनाडा के अनुसार करीब 22,000 पादप तथा जीव-जन्तु वास्तव में विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गए हैं। जैव विविधता में कमी का मुख्य कारण मानवीय क्रिया-कलाप, कृत्रिम परिर्वतन एवं पर्यावरणीय विनाश है।
पृथ्वी का तीन चौथाई भाग जल है, जिसमें 97 प्रतिशत सामुद्रिक खारा पानी तथा 3.00 प्रतिशत स्वच्छ जल है। इसका भी 77 प्रतिशत ध्रुवों एवं हिमानी के रूप में, 22 प्रतिशत भूमिगत जल और शेष एक प्रतिशत नदियों, झीलों तथा तालाबों में पाया जाता है।
स्वच्छ जल से पादपों, जीव-जन्तुओं का पोषक होता है एवं जलीय जीव-जन्तुओं एवं पादपों का आवास बनाता है। इसके अतिरिक्त यह कृषि उद्योग तथा दैनिक जीवन में भी काम आता है। वर्तमान समय में विश्व में कृषि के लिये 68 प्रतिशत उद्योगों के लिये 24 प्रतिशत तथा दैनिक उपयोग, पशुओं, मनोरंजन तथा अन्य कार्यों में 08 प्रतिशत जल का उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार भारत में 93.37 प्रतिशत कृषि, 1.08 प्रतिशत पशुओं 1.26 प्रतिशत उद्योगों और 3.13 प्रतिशत नगर पालिकाओं एवं ग्रामीण जल आपूर्ति के लिये किया जाता है।
शुक्ल यजुर्वेद में ऋषि प्रार्थना करता है, ‘द्योः शांतिरंतरिक्षं...’ (शुक्ल यजुर्वेद, 36/17)। इसलिए वैदिक काल से आज तक चिंतकों और मनीषियों द्वारा समय-समय पर पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता को अभिव्यक्त कर मानव –जाति को सचेष्ट करने के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह किया गया है।
ऐतेरेयोपनिषत् के अनुसार ब्रह्मांड का निर्माण पाँच तत्वों पृथ्वी, वायु, आकाश, जल एवं अग्नि को मिलाकर हुआ है –
इमानि पंचमहाभूतानि पृथिवीं, वायुः, आकाशः, आपज्योतिषि। (3:3)।
इन्हीं पाँच तत्वों के संतुलन का ध्यान वेदों मै रखा गया है। इन तत्वों में किसी भी प्रकार के असंतुलन का परिणाम ही सूनामी, ग्लोबल वार्मिंग, भूस्खल, भूकम्प आदि प्राकृतिक आपदायें हैं वेदों में प्राकृति के प्रत्येक घटक को दिव्य स्वरूप प्रदान किया गया है।
– पुरूणि रत्ना दधतौ नयस्मे अनु
पूर्वाणि चख्यथुर्युगानि। ऋग्वेद 7:70:4।
पूर्वाणि चख्यथुर्युगानि। ऋग्वेद 7:70:4।
इस प्रकार ऋग्वेद वनों को विनाश से बचाने का निर्देश देता है – वनानि नः प्रजहितानि (8:1:13)। पद्म
पुराण में तो एक वृक्ष को दस पुत्रों के समान माना गया है –
दशपुत्रसमो दु्रमः (1:44:455)।
तात्पर्य यह है कि अपने पुत्र के समान ही हमे वृक्षों की देखभाल करनी चाहिए। यजुर्वेद प्रार्थना करता है कि मैं पृथ्वी सम्पदा को हानि न पहुँचाऊँ
– पृथिवी मातर्मा हिंसी मा अहं त्वाम् (10:23)।
पुराण में तो एक वृक्ष को दस पुत्रों के समान माना गया है –
दशपुत्रसमो दु्रमः (1:44:455)।
तात्पर्य यह है कि अपने पुत्र के समान ही हमे वृक्षों की देखभाल करनी चाहिए। यजुर्वेद प्रार्थना करता है कि मैं पृथ्वी सम्पदा को हानि न पहुँचाऊँ
– पृथिवी मातर्मा हिंसी मा अहं त्वाम् (10:23)।
जल की महत्ता एवं उपयोगिता का महिमामंडन वेदों में अत्यधिक हुआ है। शतपत ब्राह्मण में इसे अमृत कहा गया है
– अमृत वा आपः (1:9:3:7)।
केवल वैदिक संस्कृति में ही नदियों को माँ एवं इनके जल को मोक्ष का माध्यम कहा गया है। पदम् पुराण जल प्रदूषण की कड़ी शब्दों में भर्त्सना करता है –
– अमृत वा आपः (1:9:3:7)।
केवल वैदिक संस्कृति में ही नदियों को माँ एवं इनके जल को मोक्ष का माध्यम कहा गया है। पदम् पुराण जल प्रदूषण की कड़ी शब्दों में भर्त्सना करता है –
सुकूपानां तड़ागानां प्रपानां च परंतप।
सरसां चैव भैत्तारो नरा निरयगामिनः।।
(पदम् पुराण 96:7:8)
भावार्थ – वह व्यक्ति जो तालाब, कुओं अथवा झील के जल को प्रदूषित करता है, नरकगामी होता है।
वर्तमान समय में जल प्रदूषण से उत्पन्न बीमारियां किसी नरक से कम नहीं हैं। हमारी सभ्यता नदियों को नाली एवं गन्दगी द्वारा प्रदूषित करने की नहीं रही है, परन्तु आज हमारी नदियां नाम मात्र के लिए पवित्र रह गयी हैं।
सरसां चैव भैत्तारो नरा निरयगामिनः।।
(पदम् पुराण 96:7:8)
भावार्थ – वह व्यक्ति जो तालाब, कुओं अथवा झील के जल को प्रदूषित करता है, नरकगामी होता है।
वर्तमान समय में जल प्रदूषण से उत्पन्न बीमारियां किसी नरक से कम नहीं हैं। हमारी सभ्यता नदियों को नाली एवं गन्दगी द्वारा प्रदूषित करने की नहीं रही है, परन्तु आज हमारी नदियां नाम मात्र के लिए पवित्र रह गयी हैं।
वायु शरीर के अन्दर प्राण के रूप में व्याप्त है
– वायुर्ड वा प्राणो भूत्वा शरीरमाविशत्। -तैत्तिरीयोपनिषत् (2:4)।
ऋग्वेद में वायु को प्राणदायिनी औषधि के रूप में सराहा गया है जो कल्याण एवं आनन्द
लाती है
– वात आ वातु भेषतं शंभु मयोभु नो हृदे। (10:186:1)।
वैदिक संस्कृति लोग वायु के महत्व से भलिभाँति परिचित थे। सुखी एवं दीर्घ जीवन हेतु उन्होंने शुद्धि एवं प्रदूषण रहित वायु पर बल दिया है।
– वायुर्ड वा प्राणो भूत्वा शरीरमाविशत्। -तैत्तिरीयोपनिषत् (2:4)।
ऋग्वेद में वायु को प्राणदायिनी औषधि के रूप में सराहा गया है जो कल्याण एवं आनन्द
लाती है
– वात आ वातु भेषतं शंभु मयोभु नो हृदे। (10:186:1)।
वैदिक संस्कृति लोग वायु के महत्व से भलिभाँति परिचित थे। सुखी एवं दीर्घ जीवन हेतु उन्होंने शुद्धि एवं प्रदूषण रहित वायु पर बल दिया है।
जल जीवन का प्रमुख तत्त्व है। इसलिए, वेदों में अनेक सन्दर्भों में उसके महत्त्व पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। ऋग्वेद (1.23.248) में 'अप्सु अन्तः अमृतं, अप्सु भेषजं' के रूप में जल का वैशिष्ट्य बताया गया है। अर्थात्, जल में अमृत है, जल में औषधि-गुण विद्यमान रहते हैं। अस्तु, आवश्यकता है जल की शुद्धता-स्वच्छता को बनाए रखने की।
अथर्ववेदीय पृथ्वीसूक्त में जलतत्त्व पर विचार करते हुए उसकी शुद्धता को स्वस्थ जीवन के लिए नितान्त आवश्यक माना गया है।
‘शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु’।
-(अथर्ववेद, 12.1.30)
-(अथर्ववेद, 12.1.30)
निस्सन्देह, जल-सन्तुलन से ही भूमि में अपेक्षित सरसता रहती है, पृथ्वी पर हरीतिमा छायी रहती है, वातावरण में स्वाभाविक उत्साह दिखाई पड़ता है एवं समस्त प्राणियों का जीवन सुखमय तथा आनन्दमय बना रहता हैः
‘वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृता सानो दधातु भद्रया प्रिये धामनि धामनि’
-(अथर्ववेद, 12.1.52)
-(अथर्ववेद, 12.1.52)
जल के साथ-साथ सभी ऋतुओं को अनुकूल रखने का वर्णन भी वेदों में मिलता है। ऋग्वेद में स्पष्टतया व्यंजित हैः
‘उतो स मह्यं इदुंभिः युक्तान् षट् सेषिधत्।’
वायु में जीवनदायिनी शक्ति है। इसलिए, इसकी स्वच्छता पर्यावरण की अनुकूलता के लिए परम अपेक्षित है। वेदों में वायु की स्तुति की गई है, जिससे जीवों का निरन्तर सम्यक् विकास होता रहेः
यजुर्वेद (36.18) में 'मित्रस्याहं भक्षुसा सर्वाणि भूतानि समीक्षे’ का संकल्प व्यक्त है। अर्थात्, सभी प्राणियों के प्रति सहृदयता का परिचय देना ही जीवन का सही लक्षण है। आज जिसे पारिस्थितिकी-तन्त्र कहते हैं, उसमें भी तो रचना तथा कार्य की दृष्टि से विभिन्न जीवों और वातावरण की मिली-जुली इकाई का ही स्वरूप-विश्लेषण किया जाता है।
नदी की शुद्धि को लेकर चाणक्य नीति में स्पष्ट कहा गया है कि नदी का वेग बना रहना चाहिए। इसके बगैर नदी जल की शुद्धता की कल्पना करना भी व्यर्थ है। गंगा कार्य योजना से लेकर नमामि गंगे परियोजना तक में क्या हमने कोई ऐसा कार्यक्रम शामिल किया, जो नदी के प्राकृतिक वेग को बनाये रखने में पूरी समग्रता के साथ सहायक होगा?
नदी की शुद्धि को लेकर चाणक्य नीति में स्पष्ट कहा गया है कि नदी का वेग बना रहना चाहिए। इसके बगैर नदी जल की शुद्धता की कल्पना करना भी व्यर्थ है। गंगा कार्य योजना से लेकर नमामि गंगे परियोजना तक में क्या हमने कोई ऐसा कार्यक्रम शामिल किया, जो नदी के प्राकृतिक वेग को बनाये रखने में पूरी समग्रता के साथ सहायक होगा?
ऋग्वेद में अग्नि को पिता के समान कल्याण करनेवाला कहा गया है।
‘अग्ने। सूनवे पिता इव नः स्वस्तये आ सचस्व।’
वेद का शुभारम्भ ही ‘अग्नितथव’ के स्तवन से होता है, जो सफल जीवन का निर्माता-अग्रणी नेता है। उसे स्वयं आगे आकर समस्त परिवेश का हित करनेवाला, सामाजिक संगठन का सच्चा संचालक तथा शुभदायक माना गया हैः
‘अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देव ऋत्विजम्।
होतारं रत्नघातमम्।।’ (ऋग्वेद, 1.1.1.)
होतारं रत्नघातमम्।।’ (ऋग्वेद, 1.1.1.)
-अग्नि का यह स्तवन समाज-सन्तुलन का संकेत करता है, त्याग का महत्त्व-प्रतिपादन करता है। त्याग से ही समाज में सन्तुलन बना रहता है। यहाँ ‘देव ऋत्विजम्’ से अभिप्राय है स्वयं उत्सुक होकर हित करना। कारण यह है कि त्याग की भावना से प्रेरित नहीं रहने पर स्वार्थ की प्रवृत्ति बढ़ती है और उससे कटुता उत्पन्न हो जाती है, जो असन्तुलन का मूल कारण सिद्ध होता है।
वेदों में पर्यावरण-सन्तुलन का महत्त्व अनेक प्रसंगों में व्यंजित है। महावेदश महर्षि यास्क ने अग्नि को पृथ्वी-स्थानीय, वायु को अन्तरिक्ष स्थानीय एवं सूर्य को द्युस्थानीय देवता के रूप में महत्त्वपूर्ण मानकर सम्पूर्ण पर्यावरण को स्वच्छ, विस्तृत तथा सन्तुलित रखने का भाव व्यक्त किया है।
इन्द्र भी वायु का ही एक रूप है। इन दोनों का स्थान अन्तरिक्ष में अर्थात् पृथ्वी तथा अकाश के बीच है। द्युलोक से अभिप्राय आकाश से ही है। अन्तरिक्ष से ही वर्षा होती है और आँधी-तूफान भी वहीं से आते हैं। सूर्य आकाश से प्रकाश देता है पृथ्वी और औषधियों के जल को वाष्प बनाता है, मेघ का निर्माण करता है। उद्देश्य होता है पृथ्वी को जीवों के अनुकूल बनाकर रखना। परन्तु, अग्नि केवल पृथ्वी पर नहीं है, वह अन्तरिक्ष और आकाश में भी है। अन्तरिक्ष में विद्युत के रूप में और द्युलोक-आकाश से सूर्य-रूप में भी अग्नि ही है। पृथ्वी पर तो वह है ही। अभिप्राय यह कि ये सब एकसूत्र में सम्बद्ध हैं- यही प्राकृतिक अनुकूलता है- पर्यावरण-सन्तुलन का अन्यतम निदर्शन है।
यह आज हिंसा से विश्वपर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, उससे कर्म में असन्तुलन उपस्थित हो गया है। इससे बचने के लिए वेद-प्रतिपादित सात्त्विक भाव अपनाना पड़ेगा।
‘स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्या चन्द्र मसाविव। पुनर्ददताsध्नता जानता संगमेमदि।।’
(ऋग्वेद 2.11.4)
(ऋग्वेद 2.11.4)
इसी से ऋग्वेद (1.555.1976) के ऋषि का आशीर्वादात्मक उद्गार हैः 'पृथ्वीः पूः च उर्वी भव।' अर्थात्, समग्र पृथ्वी, सम्पूर्ण परिवेश परिशुद्ध रहे, नदी, पर्वत, वन, उपवन सब स्वच्छ रहें, गाँव, नगर सबको विस्तृत और उत्तम परिसर प्राप्त हो, तभी जीवन का सम्यक् विकास हो सकेगा।
पर्यावरण को स्वच्छ-सुन्दर रखने का आग्रह सिर्फ भावनात्मक स्तर पर किया गया हो, ऐसी बात नहीं है। वैज्ञानिक अनुसन्धान के सन्दर्भ में भी सात्विकता की भावना से अनुप्राणित होकर गहरे मानवीय सम्बन्ध की स्थापना पर पर्याप्त बल दिया गया है। उदाहरणार्थ, ऋग्वेद (1.164.33) में वैज्ञानिक अनुसन्धान की प्रक्रिया में भी सूर्य को पिता, पृथ्वी को माता और किरण-समूह को बन्धु के समान आदर देने का स्पष्ट निर्देश है। आज तो गलत प्रतिस्पर्धा के कारण विश्वपर्यावरण विषाक्त बनता जा रहा है। प्रशीतन एवं वातानुकूलन के कृत्रिम प्रयास पारिस्थिति के लिए अभूतपूर्व संकट उत्पन्न कर रहे हैं।
वेद का स्पष्ट निर्देश है कि लोग प्रकृति के प्रति सदा पूर्ण श्रद्धा रखें और आनन्दमय जीवन व्यतीत करने के निमित्त उससे पर्यावरण की अनुकूलता प्राप्त करते रहें। शुक्ल-यजुर्वेद का शाश्वत सन्देश है; मधुयुक्त सरस-शुद्ध पवन गतिशील रहे, सागर मधुपूर्ण वर्षण करे। ओज प्रदान करने वाली अन्नादि वस्तुएँ भोजन के बाद मधुसदृश सुकोमल बन जाएँ। रात के साथ-साथ दिन भी मधुर रहे। पृथ्वी की धूल से लेकर अन्तरिक्ष तक मधुसंयुक्त हो। न केवल जीवित मनुष्यों का, अपितु पितरों का जीवन भी मधुमय रहे। सूर्य मधुमय रहें, गायें मधुर दूध देने वाली हों। निखिल ब्रह्नमाण्ड मधुमय रहे।
-(शुक्ल यजुर्वेद, 13.2729)
-(शुक्ल यजुर्वेद, 13.2729)
वेदों में जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि, वनस्पति, अन्तरिक्ष, आकाश आदि के प्रति असीम श्रद्धा प्रकट करने पर अत्यधिक बल दिया गया है। तत्त्वदर्शी ऋषियों के निर्देशों के अनुसार जीवन व्यतीत करने पर पर्यावरण-असन्तुलन की समस्या ही उत्पन्न नहीं हो सकती। पर्यावरण-सन्तुलन से तात्पर्य है जीवों के आसपास की समस्त जैविक एवं अजैविक परिस्थितियों के बीच पूर्ण सामंजस्य। इस सामंजस्य का महत्त्व वेदों में विस्तारपूर्वक वर्णित है।
कल्याणकारी संकल्पना, शुद्ध आचरण, निर्मल वाणी एवं सुनिश्चित गति क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की मूल विशेषताएँ मानी जाती हैं और पर्यावरण-सन्तुलन भी मुख्यतः इन्हीं गुणों पर समाश्रित है। पर्यावरण के संरक्षण के लिए प्रकृति तथा मानव प्रकृति में उचित सामंजस्य की आवश्यकता है। वेदों में इन दोनों तत्वों का वर्णन उपलब्ध है।
' ॐ पूर्णभदः पूर्णामिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥'
- अर्थात् इसका स्पष्ट भाव है कि हम प्रकृति से उतना ग्रहण करें जितना हमारे लिए आवश्यक हो तथा प्रकृति की पूर्णता को क्षति न पहुंचे ।।
और यही एक मात्र समाधान भी है वैदिक साहित्य में पर्यावरण संरक्षण के तरीके दिए गए है जो आज के आधुनिक तकनीक से कही बेहतर है जरूरत है उन्हें प्रयोग में लाने की ।।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥'
- अर्थात् इसका स्पष्ट भाव है कि हम प्रकृति से उतना ग्रहण करें जितना हमारे लिए आवश्यक हो तथा प्रकृति की पूर्णता को क्षति न पहुंचे ।।
और यही एक मात्र समाधान भी है वैदिक साहित्य में पर्यावरण संरक्षण के तरीके दिए गए है जो आज के आधुनिक तकनीक से कही बेहतर है जरूरत है उन्हें प्रयोग में लाने की ।।
#विशेष -
पर्यावरणीय तत्वों में समन्वय होना ही सुख शांति का आधार है। दूसरे शब्दों में पदार्थों का परस्पर समन्वय ही शांति है। प्राकृतिक पदार्थों में शांति की भावनाएं अनेक स्थलों पर हमें उपलब्ध होती हैं। जैसे-पृथ्वी हमारे लिए कंटकरहित और उत्तम बसने योग्य हो (ऋग्वेद, 7/35/3 तथा यजुर्वेद 36/13)। हमारे दर्शन के लिए अंतरिक्ष शांतिप्रद हो (ऋग्वेद, 10/35/5)। वह आकाश जिसमें बहुत पदार्थ रखे जाते हैं, हमारे लिए सुख करने वाला हो (ऋग्वेद, 7/35/2)। सूर्य, अपने विस्तीर्ण तेज के साथ हमारे लिए सुख करने वाला हो (ऋग्वेद, 10/35/8)। सूर्य, हमारे लिए सुखकारी तपे (यजुर्वेद, 36/10), चंद्रमा हम लोगों के लिए सुखरूप हो (ऋग्वेद, 7/35/7)। नदी, समुद्र और जल हमारे लिए सुखप्रद हो (ऋग्वेद, 7/35/8)। पीने का जल और वर्षा का जल हमारे लिए कल्याणकारी हो (यजुर्वेद, 36/12)। जलधाराएं तुम्हारे लिए अमृत वस्तुएं बरसाएं (अथर्ववेद, 8/6/5)। ज्योतिर्मय अग्नि हम लोगों के लिए सुखरूप हो (ऋग्वेद, 7/35/4)। अग्नि दुःखदायक रोगादि को और अनावृष्टि आदि दुःखों का हनन करती है (सामवेद मंत्र-4)। इसी प्रकार अन्य पर्यावरणीय घटकों के लिए शुभकामनाएं की गई हैं। जैसे- शीघ्र चलने वाली वायु हम लोगों के लिए सब ओर से सुखरूप होकर बहे (ऋग्वेद, 7/35/4)। पवन हमारे लिए सुखकारी चले (यजुर्वेद, 36/10)। पूर्व आदि चारों दिशाएं व विदिशाएं हमारे लिए सुखरूप हों (ऋग्वेद, 7/35/8)। समस्त दिशाएं हमें मित्रवत सुख दें (अथर्ववेद, 19/15/16)। विशेष दीप्ति वाली उष्माएं हमारा कल्याण करें (ऋग्वेद 7/35/10)। दिन और रात्रि हमारे लिए सुखकारी हो (यजुर्वेद 36/11)। हम दिन और रात में अभय रहें (अथर्ववेद, 19/15/16)। मेघ हम प्रजाजनों के लिए शांतिप्रद हों (ऋग्वेद, 7/35/10)। बिजली और गरज के साथ शब्द करते हुए पर्जन्य (मेघ) देव की वर्षा कल्याणकारी हो (यजुर्वेद, 36/10), आज वैज्ञानिकों ने भी मौसम में बदलाव को नियंत्रित करने में बादलों की भूमिका को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है (टेक्सास ए एंड एम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शाइमा नसीरी, नवभारत, 4 जनवरी, 2011 के रायपुर संस्करण के पृष्ठ 5 पर)। उन्होंने शोध कर कहा कि मध्य स्तर के बादल छोटी बूंदों और बर्फ के कणों का निर्माण करते हैं। उन्होंने इस प्रकार के अध्ययन में नई सेटेलाइट टेक्नोलॉजी को वैज्ञानिक रहस्य उजागर करने में बहुत कारगर एवं सहयोगी बताया। नासा ने इस अध्ययन के लिए प्रो. शाइमी को न केवल सम्मानित किया, अपितु उन्हें भू-व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए 3 लाख 24 हजार डॉलर का तीन वर्ष के लिए अनुदान भी दिया।
आज वैदिक पर्यावरण संरक्षण की इस सुदीर्घ एवं अतिप्राचीन परंपरा का आधुनिकता की आग ने भारी नुकसान पहुँचाया है। दोहन और शोषण , वैभव एवं विलास की रीति नीति से पर्यावरण को संकट में डाल दिया है, फलतः जीवन भी संकटग्रस्त है, सब ओर विपन्नता है, प्राकृतिक आपदाओं का क्रूर ताँडव है। ‘पर्यावरण संरक्षित तो जीवन सुरक्षित ‘ यह उक्ति मात्र एक कहावत भर नहीं बल्कि अनिवार्य एवं अकाट्य सत्य है। पर्यावरण का संतुलन ही जीवनचक्र को नियंत्रित करता है और इसमें गतिरोध आते ही जीवन संकट में पड़ जाता है। यही कारण है कि इसकी सुरक्षा की चिंता प्राचीनकाल से होती आ रही है। वेदकालीन महर्षिगणों ने इसकी आवश्यकता एवं महत्ता को ध्यान में रखकर इसे शुद्ध एवं संरक्षित रखने हेतु नियम बना लिए थे। धर्म इन्हीं नियमों का व्यावहारिक रूप है। और हम आज उस धर्म को नकार कर खुद विनाश की ओर अग्रसर हो रहे है।।
पर्यावरणीय तत्वों में समन्वय होना ही सुख शांति का आधार है। दूसरे शब्दों में पदार्थों का परस्पर समन्वय ही शांति है। प्राकृतिक पदार्थों में शांति की भावनाएं अनेक स्थलों पर हमें उपलब्ध होती हैं। जैसे-पृथ्वी हमारे लिए कंटकरहित और उत्तम बसने योग्य हो (ऋग्वेद, 7/35/3 तथा यजुर्वेद 36/13)। हमारे दर्शन के लिए अंतरिक्ष शांतिप्रद हो (ऋग्वेद, 10/35/5)। वह आकाश जिसमें बहुत पदार्थ रखे जाते हैं, हमारे लिए सुख करने वाला हो (ऋग्वेद, 7/35/2)। सूर्य, अपने विस्तीर्ण तेज के साथ हमारे लिए सुख करने वाला हो (ऋग्वेद, 10/35/8)। सूर्य, हमारे लिए सुखकारी तपे (यजुर्वेद, 36/10), चंद्रमा हम लोगों के लिए सुखरूप हो (ऋग्वेद, 7/35/7)। नदी, समुद्र और जल हमारे लिए सुखप्रद हो (ऋग्वेद, 7/35/8)। पीने का जल और वर्षा का जल हमारे लिए कल्याणकारी हो (यजुर्वेद, 36/12)। जलधाराएं तुम्हारे लिए अमृत वस्तुएं बरसाएं (अथर्ववेद, 8/6/5)। ज्योतिर्मय अग्नि हम लोगों के लिए सुखरूप हो (ऋग्वेद, 7/35/4)। अग्नि दुःखदायक रोगादि को और अनावृष्टि आदि दुःखों का हनन करती है (सामवेद मंत्र-4)। इसी प्रकार अन्य पर्यावरणीय घटकों के लिए शुभकामनाएं की गई हैं। जैसे- शीघ्र चलने वाली वायु हम लोगों के लिए सब ओर से सुखरूप होकर बहे (ऋग्वेद, 7/35/4)। पवन हमारे लिए सुखकारी चले (यजुर्वेद, 36/10)। पूर्व आदि चारों दिशाएं व विदिशाएं हमारे लिए सुखरूप हों (ऋग्वेद, 7/35/8)। समस्त दिशाएं हमें मित्रवत सुख दें (अथर्ववेद, 19/15/16)। विशेष दीप्ति वाली उष्माएं हमारा कल्याण करें (ऋग्वेद 7/35/10)। दिन और रात्रि हमारे लिए सुखकारी हो (यजुर्वेद 36/11)। हम दिन और रात में अभय रहें (अथर्ववेद, 19/15/16)। मेघ हम प्रजाजनों के लिए शांतिप्रद हों (ऋग्वेद, 7/35/10)। बिजली और गरज के साथ शब्द करते हुए पर्जन्य (मेघ) देव की वर्षा कल्याणकारी हो (यजुर्वेद, 36/10), आज वैज्ञानिकों ने भी मौसम में बदलाव को नियंत्रित करने में बादलों की भूमिका को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है (टेक्सास ए एंड एम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शाइमा नसीरी, नवभारत, 4 जनवरी, 2011 के रायपुर संस्करण के पृष्ठ 5 पर)। उन्होंने शोध कर कहा कि मध्य स्तर के बादल छोटी बूंदों और बर्फ के कणों का निर्माण करते हैं। उन्होंने इस प्रकार के अध्ययन में नई सेटेलाइट टेक्नोलॉजी को वैज्ञानिक रहस्य उजागर करने में बहुत कारगर एवं सहयोगी बताया। नासा ने इस अध्ययन के लिए प्रो. शाइमी को न केवल सम्मानित किया, अपितु उन्हें भू-व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए 3 लाख 24 हजार डॉलर का तीन वर्ष के लिए अनुदान भी दिया।
आज वैदिक पर्यावरण संरक्षण की इस सुदीर्घ एवं अतिप्राचीन परंपरा का आधुनिकता की आग ने भारी नुकसान पहुँचाया है। दोहन और शोषण , वैभव एवं विलास की रीति नीति से पर्यावरण को संकट में डाल दिया है, फलतः जीवन भी संकटग्रस्त है, सब ओर विपन्नता है, प्राकृतिक आपदाओं का क्रूर ताँडव है। ‘पर्यावरण संरक्षित तो जीवन सुरक्षित ‘ यह उक्ति मात्र एक कहावत भर नहीं बल्कि अनिवार्य एवं अकाट्य सत्य है। पर्यावरण का संतुलन ही जीवनचक्र को नियंत्रित करता है और इसमें गतिरोध आते ही जीवन संकट में पड़ जाता है। यही कारण है कि इसकी सुरक्षा की चिंता प्राचीनकाल से होती आ रही है। वेदकालीन महर्षिगणों ने इसकी आवश्यकता एवं महत्ता को ध्यान में रखकर इसे शुद्ध एवं संरक्षित रखने हेतु नियम बना लिए थे। धर्म इन्हीं नियमों का व्यावहारिक रूप है। और हम आज उस धर्म को नकार कर खुद विनाश की ओर अग्रसर हो रहे है।।
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