ईल्लु १७

इल्लुमिनाति का भारत मे शिक्षा व्यवस्था पर षड्यंत्र

भाग-17

स्कूली समय
(विद्यालय जाने का समय)

भारत देश का विस्तार देशांस (longitude) 68 डिग्री पूर्व से 98 डिग्री पूर्व तक है अर्थात 30 डिग्री का फर्क।

1 डिग्री स्थल को सूर्य के सामने से पार होने में 4 मिनट लगते है अर्थात 30 डिग्री पार होने में 120 मिनट लगेंगे यानी 2 घण्टे।

अर्थात अरुणाचल में यदि सूर्योदय सुबह 5.30 पर दिखाई पड़ा तो गुजरात के अंतिम छोर पर सुबह 8 बजे लोगो को सूर्य के दर्शन होंन्गे।

इसलिये इस झंझट को दूर करने के लिये मिर्जापुर प्रयागराज से गुजरने वाले देशांश 82 डिग्री को ही आधार माना गया और समय का भारतीय समय IST का निर्धारण इसी से होता है और पूरे देश की घड़ियां इसी से एक साथ चलती है।

पर भारत में जहॉ कि कश्मीर का मौसम अलग, मध्यप्रदेश का अलग,हिमाचल का अलग, राजस्थान,चेन्नई का अलग होता है तो क्या केंद्रीय विद्यालय CBSC पैटर्न के स्कूलों का पुरे देश में एक समय पर खुलना बन्द होना न्यायपूर्ण है???

क्या इस पध्दति को स्थानिक समय स्थानिक मौसम के अनुरूप नहीं होना चाहिए?

ये परिवर्तन आखिर क्यों नही हुआ?

किसी व्यवस्था को परिवर्तित करते समय तर्कपूर्ण तथ्य दिए जाते है किंतु वर्ष 2000 तक 9 बजे से लगने वाला स्कुल 2001 में 7.30 बजे से लगने लगा बिना किसी स्पष्टीकरण के?

क्यों?

जब 9 बजे से स्कुल लगता तो हिन्दू परम्परा में सुबह उठकर नहाकर बच्चे माता पिता के साथ पूजा आदि करके ही फिर पढ़ने बैठते फिर समय होने पर ऑटो या बस या अन्य साधन से स्कुल जाते थे।

बच्चे 6 बजे भी उठते तो मुह धोना पेट हल्का करना, नहाना फिर पेट हल्का होने के बाद हल्की भूख लगती तो कुछ हल्का नाश्ता करके जाते हैं स्कुल में टिफिन खाते 12 बजे फिर 2.30 बजे वापस और रात का भोजन सबके साथ ये व्यवस्थित दिनर्चया थी।

किंतु 2001 से नई टाइमिंग के अनुसार अब बच्चे सुबह 5.30 बजे उठते है और केवल मुह धोकर ही हड़बड़ी में तैयार होकर चले जाते है।

सुबह पेट साफ नही हुआ तो स्कुल में पेट में गैस होगी रात का भोजन सड़ने से और इससे पेट फुला लगेगा
सुबह नही नहा पाये तो शरीर बेचैन सा लगेगा स्कुल में , जिससे पढ़ाई से भी ध्यान हटेगा फिर 10.30 बजे लंच की छुट्टी होती है।
तो जिस बालक ने सुबह पेट साफ नही किया आंतो में सड़ते हुए भोजेन के ऊपर फिर से नए भोजन की परत आ जाती है।

नतीजा बालक का पेट फूल जाता है (स्वयं देखिये CBSC के बच्चों को पेट फुला तोंद दिखेगी ) मोटापा बढ़ेगा।

आंतो में सड़े हुए भोजेन का विष होने से पेट की बीमारियां,पेशाब कब्ज सम्बन्धी बीमारियां,सिरदर्द, यादाश्त कमजोर,बाल सफेद,आँखों में चश्मा लगने लग जाता है।

अब यही बालक दोपहर में 3 या 4 बजे तक घर पहुचता है तो शरीर थका होता है क्योंकि भोजन व्यवस्था पूरी बिगड़ी होती है तो बालक सोता है या बेमन से ट्यूशन आदि जाता है।

देखा जाए तो ऐसे केंद्रीय स्कुल की समय सारणी में अधिकाँश इसाई मिशनरी स्कुल होते पहले (फिर वर्ष 1990 से निजी स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह खुल चुके) जिनमे ईसा मसीह की चर्चा चर्च आदि के लोग सुबह से बच्चे को दिखाई पड़ते है जिससे वो बाल्यावस्था में ही इनका मानसिक गुलाम हो जाता है और फिर जीवन में कभी चर्च का विरोध नही कर पाता है।

तो मित्रो इस तरह CBSC स्कुल की टाइमिंग हिन्दू घर में  विद्यार्थी की प्रात:कालिक सनातन धर्म प्रक्रिया को ख़त्म करने गलत अप्राकृतिक समय पर भोजन करवा के उनको रोगी बनाने की योजनाबद्ध नीति है जिसका असर खूब दिख रहा है।

डाक्टरो के लिये नए तरह के छोटे मरीजो की श्रृंखला आरम्भ हो जाती है और विदेश से आने वाली दवाईयो, बाल गिरने,बढ़ाने वाले तेलों,पेट दर्द गैस की दैवाईयो की बिक्री बढ़ जाती है।

ये पूरी की पूरी नीति एक श्रृंखलाबद्ध गिरोह की रणनीति ही जानिये अरुणाचल से गुजरात तक 2900 किलोमीटर के विशाल देश में ये भेड़ चाल क्यों और किसके दवाब में ??

ऐसी केंद्रीयकृत टाइमिंग की आवाश्यकता है क्या स्कूलों को?

वास्तव में केंद्रीय बोर्ड को केवल पाठ्यक्रम और प्रक्रिया निर्धारित करनी चाहिए।

संज्ञान लीजिए।

जय श्री राम
⚔️🦁🚩

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