ईल्लु २२
इल्लुमिनाति का शिक्षा व्यवस्था पर षड्यंत्र!
भाग-22
ईसा मसीह और वेलेंटाइन डे
मित्रो भारत के स्कूलों में सर्वधर्म सद्भाव के अंतर्गत शिक्षा देने का कार्य 1947 के बाद निश्चित किया गया इसाई मिशनरियो को स्कुल खोलने की अनुमति दी गई निजी स्कूल के रूप में इसाई स्कुल हिन्दू जैन सिख ट्रस्टों द्वारा खोले गए स्कुल ही थे।
1947 में केवल जिला मुख्यालय शहर में स्थित इसाई स्कुल अब वर्तमान में तहसील से लेकर गांव तक पहुच चुके है तो हर इसाई स्कुल के प्रांगण में ईसा मसीह की सफ़ेद वस्त्रों में, कबूतर उड़ाते हुए, एक मूर्ति अवश्य होती है।
इन स्कूलों में जाने वाले हिन्दू बच्चे 4 साल की उम्र से ही ईसा मसीह को देखने लगते है और इसाई स्कुल के शिक्षकों को इस मूर्ति के सामने नमन करते देखते है
बस यही से बाल मन प्रभावित हो जाता है।
एक कहानी हम सब ने पढ़ी है कि बलिष्ठ विशाल युवा हाथी को एक मामूली सांकल से बांध कर रखा जा सकता है क्योंकि बचपन में ही जब वो उस सांकल में बंधा हुआ था तो उस छोटे हाथी ने कई बार सांकल तोड़कर उच्छल कूद करने का प्रयत्न किया किंतु उसकी उम्र की तुलना में सांकल अधिक मजबूत होने के कारण वो तोड़ नही पाया और उसके मन में ये धारणा बन गई कि यही मेरा जीवन है इतनी ही मेरी शक्ति है।
और यही मानसिकता होने के कारण युवावास्था में वही हाथी विशाल वृक्षो को तो उखाड़ देता है किंतु शाम को सांकल में बंध जाने के बाद वो गुलाम की तरह व्यवहार करने लग जाता है एक मामूली महावत के सामने।
तो इसाई मिशनरियों ने बस इसी मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त का उपयोग किया है भारत की नई पीढ़ी को गुलाम बनाने के लिये जब बालक बचपन से ही इसे मसीह की मूर्ति, नतमस्तक होते शिक्षकों को देखते है तो स्वयं भी ऐसा ही करते है और उनके निश्छल मन में ईसा मसीह के प्रति अज्ञात श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है।
अब इसाई मिशनरी या उनका मीडिया
रोज डे
प्रपोज डे
बेलेंटाइन डे
फ्रेंडशिप डे
आदि मनाने लग जाते है और नई पीढ़ी जब इन पाश्चात्य त्योहारों का इतिहास खोजती है google पर।
तो इसाई देश का इतिहास मिलता है जिसके भगवान ईसा मसीह होते है तो 4 साल की उम्र से ईसा मसीह को देखने वाला बालक 24 साल की उम्र में ईसाईयों द्वारा प्रचारित त्यौहार मनाने में बिल्कुल संकोच नहीं करता क्योंकि उसका अवचेतन मन इस प्रणाली को 4 साल की उम्र में स्वीकार कर चुका था।
इसाई स्कूलों में पढ़े विद्यार्थियों को आप कभी भी इसाई मत का विरोध करते नहीं पाओगे भले ही वो इस्लामिक आतंक का प्रखर विरोधी हो हिन्दू (सनातन, सिख, जैन, बौद्ध) धर्म में पूर्ण आस्थावान हो और यही कारण है कि पिछले मात्र 30 वर्षो में न्यू ईयर, फ्रेंडशिप डे, वेलेंटाइन डे आदि हर छोटे शहर तक में प्रचलित हो चुके है क्योंकि अब हर छोटे शहर में इसाई स्कुल में पढ़ा 4 साल का बच्चा 24 साल का हो चुका है।
और छोटी जगह में 50 ऐसे बच्चों के प्रभाव में (उस जगह के सबसे समृद्ध परिवार ), 500 साधारण बच्चे उनके पीछे अनुपालन करने में लग जाते है क्योंकि प्राचीन मनोवैज्ञानिक तथ्य है की महाजनो येन गता स पन्था: (जिधर बड़े लोग जाते है बाकी लोग उसी रास्ते पर चल पड़ते है )
ये सब बड़े योजनाबद्ध तरीके से एक पूरी पीढ़ी विकसित की गई है इसाई मिशनरियों के स्कूल खोल कर।
किनके सहयोग या मार्गदर्शन में?
पहचानिये?
संज्ञान लीजिये
जय श्री राम
⚔️🦁🚩
भाग-22
ईसा मसीह और वेलेंटाइन डे
मित्रो भारत के स्कूलों में सर्वधर्म सद्भाव के अंतर्गत शिक्षा देने का कार्य 1947 के बाद निश्चित किया गया इसाई मिशनरियो को स्कुल खोलने की अनुमति दी गई निजी स्कूल के रूप में इसाई स्कुल हिन्दू जैन सिख ट्रस्टों द्वारा खोले गए स्कुल ही थे।
1947 में केवल जिला मुख्यालय शहर में स्थित इसाई स्कुल अब वर्तमान में तहसील से लेकर गांव तक पहुच चुके है तो हर इसाई स्कुल के प्रांगण में ईसा मसीह की सफ़ेद वस्त्रों में, कबूतर उड़ाते हुए, एक मूर्ति अवश्य होती है।
इन स्कूलों में जाने वाले हिन्दू बच्चे 4 साल की उम्र से ही ईसा मसीह को देखने लगते है और इसाई स्कुल के शिक्षकों को इस मूर्ति के सामने नमन करते देखते है
बस यही से बाल मन प्रभावित हो जाता है।
एक कहानी हम सब ने पढ़ी है कि बलिष्ठ विशाल युवा हाथी को एक मामूली सांकल से बांध कर रखा जा सकता है क्योंकि बचपन में ही जब वो उस सांकल में बंधा हुआ था तो उस छोटे हाथी ने कई बार सांकल तोड़कर उच्छल कूद करने का प्रयत्न किया किंतु उसकी उम्र की तुलना में सांकल अधिक मजबूत होने के कारण वो तोड़ नही पाया और उसके मन में ये धारणा बन गई कि यही मेरा जीवन है इतनी ही मेरी शक्ति है।
और यही मानसिकता होने के कारण युवावास्था में वही हाथी विशाल वृक्षो को तो उखाड़ देता है किंतु शाम को सांकल में बंध जाने के बाद वो गुलाम की तरह व्यवहार करने लग जाता है एक मामूली महावत के सामने।
तो इसाई मिशनरियों ने बस इसी मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त का उपयोग किया है भारत की नई पीढ़ी को गुलाम बनाने के लिये जब बालक बचपन से ही इसे मसीह की मूर्ति, नतमस्तक होते शिक्षकों को देखते है तो स्वयं भी ऐसा ही करते है और उनके निश्छल मन में ईसा मसीह के प्रति अज्ञात श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है।
अब इसाई मिशनरी या उनका मीडिया
रोज डे
प्रपोज डे
बेलेंटाइन डे
फ्रेंडशिप डे
आदि मनाने लग जाते है और नई पीढ़ी जब इन पाश्चात्य त्योहारों का इतिहास खोजती है google पर।
तो इसाई देश का इतिहास मिलता है जिसके भगवान ईसा मसीह होते है तो 4 साल की उम्र से ईसा मसीह को देखने वाला बालक 24 साल की उम्र में ईसाईयों द्वारा प्रचारित त्यौहार मनाने में बिल्कुल संकोच नहीं करता क्योंकि उसका अवचेतन मन इस प्रणाली को 4 साल की उम्र में स्वीकार कर चुका था।
इसाई स्कूलों में पढ़े विद्यार्थियों को आप कभी भी इसाई मत का विरोध करते नहीं पाओगे भले ही वो इस्लामिक आतंक का प्रखर विरोधी हो हिन्दू (सनातन, सिख, जैन, बौद्ध) धर्म में पूर्ण आस्थावान हो और यही कारण है कि पिछले मात्र 30 वर्षो में न्यू ईयर, फ्रेंडशिप डे, वेलेंटाइन डे आदि हर छोटे शहर तक में प्रचलित हो चुके है क्योंकि अब हर छोटे शहर में इसाई स्कुल में पढ़ा 4 साल का बच्चा 24 साल का हो चुका है।
और छोटी जगह में 50 ऐसे बच्चों के प्रभाव में (उस जगह के सबसे समृद्ध परिवार ), 500 साधारण बच्चे उनके पीछे अनुपालन करने में लग जाते है क्योंकि प्राचीन मनोवैज्ञानिक तथ्य है की महाजनो येन गता स पन्था: (जिधर बड़े लोग जाते है बाकी लोग उसी रास्ते पर चल पड़ते है )
ये सब बड़े योजनाबद्ध तरीके से एक पूरी पीढ़ी विकसित की गई है इसाई मिशनरियों के स्कूल खोल कर।
किनके सहयोग या मार्गदर्शन में?
पहचानिये?
संज्ञान लीजिये
जय श्री राम
⚔️🦁🚩
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