ईल्लु २१

इल्लुमिनाति का भारत मे शिक्षा व्यवस्था पर षड्यंत्र

भाग-21

प्राथमिक पाठ्यक्रम

द्वितीय विश्व युद्ध के समय यूरोप में केजी,नर्सरी आदि कक्षाओ का आरम्भ हुआ बच्चों को एकसाथ रखने के लिये क्योंकि हर घर के वयस्क महिला पुरुष को गोला बारूद की फैक्टरी में युद्ध की तैयारी हेतु कार्य करना अनिवार्य था उनके यहां कोई विशिष्ट प्राचीन विकसित शिक्षा प्रणाली थी ही नहीं तो बच्चों को खिलौने देते थे, अक्षर ज्ञान कराते थे,कविताएं, छोटी कहानियां याद कराते थे।

1947 भारत स्वतंत्र हुआ और मौलाना अबुल कलाम जिसको भारत की प्राचीन गुरुकुल पद्धति का कोई ज्ञान ,ऋषियो के ग्रंथो में उपलब्ध गणित,आयुर्वेद, विज्ञान, भूगोल की कोई जानकारी नहीं थी जैसा जियोनिस्टो ने करवाया उसने वैसा ही किया।

उस गुलाम को देश का प्रथम शिक्षा मंत्री बनाया गया आश्चर्य है 32 करोड़ धर्मनिष्ठ हिन्दुओ का शिक्षमंत्री मदरसे में पढ़ा एक मौलाना क्यों??

जबकि पंडित रविशंकर जैसे कई विद्वान उपलब्ध थे इस मौलाना ने एवं बाद के सभी  शिक्षा मंत्रियों ने, यूरोप की शिक्षा प्रणाली को ही भारत में लागू किया वहीँ के जैसे पाठ्यक्रम को यहाँ के प्राथमिक कक्षाओ में लागू किया।

नतीजा बच्चे बुद्धिमान की जगह बुधू बन गए!

भारत जिसे प्राचीन ऋषियो ने जाना था कि गर्भ में ही बालक को ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता होती है एवं ये क्षमता जन्म के बाद से 9 वर्ष तक रहती है।

आज के वैज्ञानिक इसी बात की पुष्टि करते है तो बच्चों को घर में,गुरुकुल में आज कठिन समझे जाने वाले संस्कृत विषय की शिक्षा दी जाती थी हजारो मन्त्र ,श्लोक ,नीतियां रटाये जाते थे, जोकि उनके निश्छल , शुद्ध स्मृति पटल पर जीवन भर के लिये स्थाई हो जाते थे यही कारण है कि प्राचीन कहानियों में हमलोग नचिकेता जैसे अत्यंत बुद्धिमान बालको की कहानियां पढ़ते है।

आदि शंकराचार्य ने 6 वर्ष की उम्र में अनेक ग्रन्थ याद कर लिए थे अब आजादी के बाद स्कूलों में हिन्दू विद्यार्थी ही 95% प्रतिशत होते थे सरकारी स्कूलों में मुस्लिम बच्चे ना के बराबर होते थे इस्लामिक बस्तियो में मुस्लिम बच्चे मदरसे में पढ़ने जाते थे।

तो जिन बच्चों के dna में वेदो , गीता के श्लोको को याद करने की क्षमता थी उन बच्चों को बचपन से कैप्टल लेटर ABCD, छोटे लेटर abcd, टेढ़ी abcd, घुमावदा abcd, अंग्रेजी कविताएं याद करने में लगा दिया।

जोकि केवल बच्चों का समय,साल बर्बाद करने का एक तरीका है ये मूर्खतापूर्ण कार्य नर्सरी से लेकर कक्षा 3 तक होता है जबकि मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि मेरी बड़ी बहन की 4 साल की बेटी को हमलोग प्राण जी की पिंकी , चाचा चौधरी आदि कॉमिक्स पढ़कर सुनाते थे,हर चित्र पर ऊँगली रखकर संवाद पढ़ते थे।
तो बेटी को पूरे सम्वाद चित्र सहित याद हो गये थे और फिर वो घर में अकेले ही, ट्रेन में पिंकी की कॉमिक्स खोलकर ,चित्र पर ऊँगली रखकर संवाद बोलते हुए पन्ने पलटती जाती (स्मृति के आधार पर ही अक्षर ज्ञान नहीं था ) और ट्रेन में बैठे लोग पूछते कि इतनी कम उम्र में बेटी कैसे पढ लेती है?

हर हिन्दू (सनातन,सिख जैन बौद्ध) शिशु के शुद्ध DNA में प्राचीन काल के ज्ञान को स्टोर रखने का विशिष्ट गुण होता है बस उसको प्रकट कर पाने हेतु उचित प्रक्रिया, उचित गुरु चाहिए।

जो बालक ऐसे गुरु के मार्गदर्शन में पढ़ पाते है वो बचपन से विलक्षण बुद्धि के होते है हर साल टीवी पर तुलसी, चाणक्य जैसे बालक दिखाई पड़ते है इसी पध्दति के अनुकरण के कारण स्वतंत्र होने के बाद भारत में 6 वर्ष की उम्र में विद्वान् हो जाने वाले शंकराचार्य।
10 वर्ष की उम्र में जटिल गणित को हल कर लेने वाले रामानुजन।
18 वर्ष की उम्र में यूरोप के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रायड को गलत सिद्ध कर देने वाले रजनीश।
15 वर्ष की उम्र में डाक्टर बन जाने वाले बालक विकसित ना हो सके इसलिये यूरोपीय शिक्षा प्रणाली को भारत में लागू किया गया।

किसके इशारे पर?
किसके दवाब में?
पहचानिये उन हिन्दू विरोधियो को

जय श्री राम
⚔️🦁🚩

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