ईल्लु १८
इल्लुमिनाति का भारत मे शिक्षा व्यवस्था पर षड्यंत्र
भाग-18
आर्थिक सहायता
इसे CBSE पाठ्यक्रम केंद्रीय सरकार के कर्मचारियो की सुविधा के लिये आरम्भ किया गया था ताकि दूसरे स्थान दूसरे राज्य में ट्रांसफर होने पर बच्चे को किसी स्कुल के पाठ्यक्रम में दिक्कत ना हो।
फिर धीऱे से इस पाठ्यक्रम को मिशनरी स्कूलों ने अपना लिया केंद्रीय विद्यालय के अलावा इन मिशनरी स्कूलों में भी केंद्र के अधिकारी,कर्मचारी अपने बच्चों को भेजने लगे विभिन्न कॉर्यक्रम होने लगे और ये स्कुल लोकप्रिय हुए चमक दमक के कारण जिससे व्यापारी वर्ग भी अपने बच्चों को भेजने लगा।
तो अब जब भी केंद्र सरकार का नया वेतनमान आता है तो इन मिशनरी स्कूलों की फीस तिगुनी हो जाती है महंगी फीस के कारण केंद्र के कर्मचारी इन मिशनरी स्कूलों से विमुख ना हो जाए इसके लिए वर्ष 2008 से केंद्र सरकार ने कर्मचारीयो को शिक्षा भत्ता देना आरम्भ किया(कांग्रेस सरकार ने) जोकि वर्तमान में 18 हजार रूपये प्रति स्कुली विद्यार्थी प्रतिवर्ष है यानी 2 बच्चे का 36 हजार रूपये एक कर्मचारी के द्वारा सरकार ने मिशनरी स्कूल को भिजवा दीए।
कर्मचारी सोच रहे है कि सरकार उनके बच्चे को पढ़ाने हेतु आर्थिक सहायता दे रही है जबकि वास्तव में जनता से टेक्स द्वारा वसूले गए रुपयों को एक केंद्र सरकार के कर्मचारी के मॉध्यम से मिशनरी स्कूलों तक पहुचाया जा रहा है।
जोकि फिर एकत्रित होकर अमेरिका,इंग्लैंड आदि चला जाता है और फिर विदेशी सहायता/ कर्जे के रूप में वापस भारत आता है जिसके कारण आज प्रत्येक भारतीय पर 30 हजार रूपये का कर्ज है।
अगर सरकार समस्त स्कुल,कालेजो की फीस पर नियंत्रण रखती कम करवाती तो हर बच्चे को लाभ मिलता लेकिन उद्देश्य तो ये नही है।
केंद्र सरकार के कर्मचारी के बच्चे मिशनरी के अलावा अन्य निजी स्कूलों में भी पढ़ते है इस तरह शिक्षा को महंगी करने में सरकार का भी योगदान है और अनेक स्कूलों को पहुच रही आर्थिक सहायता में से बड़ा अंश मिशनरी स्कूलों को पहुचता है।
कितन घुमावदार सफल आर्थिक रास्ता वाह!
संज्ञान लीजिए
जय श्री राम
⚔️🦁🚩
भाग-18
आर्थिक सहायता
इसे CBSE पाठ्यक्रम केंद्रीय सरकार के कर्मचारियो की सुविधा के लिये आरम्भ किया गया था ताकि दूसरे स्थान दूसरे राज्य में ट्रांसफर होने पर बच्चे को किसी स्कुल के पाठ्यक्रम में दिक्कत ना हो।
फिर धीऱे से इस पाठ्यक्रम को मिशनरी स्कूलों ने अपना लिया केंद्रीय विद्यालय के अलावा इन मिशनरी स्कूलों में भी केंद्र के अधिकारी,कर्मचारी अपने बच्चों को भेजने लगे विभिन्न कॉर्यक्रम होने लगे और ये स्कुल लोकप्रिय हुए चमक दमक के कारण जिससे व्यापारी वर्ग भी अपने बच्चों को भेजने लगा।
तो अब जब भी केंद्र सरकार का नया वेतनमान आता है तो इन मिशनरी स्कूलों की फीस तिगुनी हो जाती है महंगी फीस के कारण केंद्र के कर्मचारी इन मिशनरी स्कूलों से विमुख ना हो जाए इसके लिए वर्ष 2008 से केंद्र सरकार ने कर्मचारीयो को शिक्षा भत्ता देना आरम्भ किया(कांग्रेस सरकार ने) जोकि वर्तमान में 18 हजार रूपये प्रति स्कुली विद्यार्थी प्रतिवर्ष है यानी 2 बच्चे का 36 हजार रूपये एक कर्मचारी के द्वारा सरकार ने मिशनरी स्कूल को भिजवा दीए।
कर्मचारी सोच रहे है कि सरकार उनके बच्चे को पढ़ाने हेतु आर्थिक सहायता दे रही है जबकि वास्तव में जनता से टेक्स द्वारा वसूले गए रुपयों को एक केंद्र सरकार के कर्मचारी के मॉध्यम से मिशनरी स्कूलों तक पहुचाया जा रहा है।
जोकि फिर एकत्रित होकर अमेरिका,इंग्लैंड आदि चला जाता है और फिर विदेशी सहायता/ कर्जे के रूप में वापस भारत आता है जिसके कारण आज प्रत्येक भारतीय पर 30 हजार रूपये का कर्ज है।
अगर सरकार समस्त स्कुल,कालेजो की फीस पर नियंत्रण रखती कम करवाती तो हर बच्चे को लाभ मिलता लेकिन उद्देश्य तो ये नही है।
केंद्र सरकार के कर्मचारी के बच्चे मिशनरी के अलावा अन्य निजी स्कूलों में भी पढ़ते है इस तरह शिक्षा को महंगी करने में सरकार का भी योगदान है और अनेक स्कूलों को पहुच रही आर्थिक सहायता में से बड़ा अंश मिशनरी स्कूलों को पहुचता है।
कितन घुमावदार सफल आर्थिक रास्ता वाह!
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