ईल्लु ७
इल्लुमिनाती का भारत मे शिक्षा व्यवस्था पर षड्यंत्र
भाग-7
मित्रो यूरोप के वैज्ञानिक मनुष्य के दिमाग पर बहुत रिसर्च करते आ रहे है जिसमे उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि 5 से 9 साल के बच्चे में तथ्यों को याद रखने की बहुत अद्भुत क्षमता होती है।
अब ध्यान दीजिएगा हमारे प्राचीन ऋषि मुनि लाखो साल पहले इस तथ्य से परिचित थे इसलिये 4 या 6 साल की उम्र में ही बालक को गुरु के अधीन कर दिया जाता था।
बचपन में आरंभिक शिक्षा में वेद मन्त्र, अनेकानेक गणितीय, वैज्ञानिक, खगोलिकीय सूत्र मंत्रो, श्लोको के मॉध्यम से रटा दिये जाते थे बाद में उच्च कक्षाओ में इस रटे हुए ज्ञान की मीमांसा,विश्लेषण होता था।
अर्थात गुरुकुल पद्धति के अंतर्गत पहले ज्ञान का भंडार बालक के मस्तिष्क में भर दिया जाता था फिर उसके बाद की उच्च कक्षाओ में में उस ज्ञान को processed किया जाता था इसलिये 20 या 25 वर्ष के गुरुकुल के विद्यार्थियों के तेज को देखकर लोग स्वयं सर झुका लेते थे।
प्राचीन काल से लेकर शायद वर्ष 1970, 75 तक भारत में स्कूली गाणित की प्राथमिक कक्षाओ में सवैया,अढैया के पहाड़े होते थे यानी आज की भाषा में 1.5, 2.5 का टेबल।
इस पहाड़े को रट लेने से घरेलु जीवन एवम व्यापार के अनेक कार्य जुबानी मौखिक हो जाते थे बड़े बड़े प्रश्नों को हल करने के लिए किसी कैलकुलेटर यंत्र की आवश्यकता नहीं पडती थी।
यदि आप गाँव की छोटी सी कपड़े की दूकान से कुर्ते का 2.20 मीटर एवं पजामे का 2.75 मीटर का कपड़ा 165 रूपये मीटर के हिसाब से खरीदते तो दुकानदार तुरंत मुंहजबानी हिसाब लगा देता था लेकिन आज आपके लिए ये एक जोड़ी कपड़े का हिसाब बहुत बड़ा सिरदर्द होगा।
ये था अढैया,सवैया जैसे पहाड़ो का चमत्कार लेकिन बड़े ही षड्यंत्रपूर्वक इस गणित को हटाया गया पाठ्यक्रम से ये तर्क देकर की बच्चों के दिमाग पर बहुत बोझ पड़ता है और इसकी जगह, बच्चों का समय नष्ट करने के लिये, kg1 से कक्षा 3 तक हिंदी ,अंग्रेजी अक्षर,सीधे,टेढ़े मेढ़े, घुमावदार लिखने की किताब चला दी गई जिसका कोई उपयोग लाभ नहीं।
इन कक्षाओ में बालक केवल गिनती और अक्षर ही लिखते रह जाता है और उसके जीवन का सबसे कीमती समय नष्ट कर दिया जाता है।
इनके पीछे कौन है षड्यंत्रकारी ??
जब देशी गणितीय पहाड़ो को ख़त्म कर दिया गया नतीजा बच्चों को केवल जोड़ घटाना ही मौखिक करते बना और गुणा,भाग के लिए लिखित कार्य करने की जरुरत होने लगी।
अब जिन बच्चों ने 1970 में प्राचीन गाणित नहीं पढ़ी थी वो जब 1980 में दूकान पर बैठने लगे तो साधारण हिसाब के लिये भी परेशान होने लगे फिर परिदृश्य में आता है छोटा वाला casio कैलकुलेटर जिसमे जोड़, घटाना,गुणा,भाग ही रहते है।
अब 1980 के बाद से भारत की दुकानों में हर व्यापारी के पास ये कैलकुलेटर अनिवार्य हो गया और इस तरह, प्राचीन शिक्षा प्रणाली को धवस्त करके विदेशी व्यापारी ने अपने उत्पाद को भारत में बेचकर खरबो रूपये कमा लिए।
इसी तरह वैलेंटाइन नामक त्योहार को भारत मे लाकर विदेशी उत्पाद चॉकलेट टॉफी आदि से खरबो रुपये कमा लेते हैं।
यूरोप,अमेरिका में बैठे इल्लु के जियोनिस्ट इस तरह अपने उत्पाद बेचने के लिए भारत की नीतियां प्रभावित करते रहते है जिसका प्रभाव 20 वर्ष बाद समझ आता है।
संज्ञानात्मक
जय श्री राम
⚔️🦁🚩
भाग-7
मित्रो यूरोप के वैज्ञानिक मनुष्य के दिमाग पर बहुत रिसर्च करते आ रहे है जिसमे उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि 5 से 9 साल के बच्चे में तथ्यों को याद रखने की बहुत अद्भुत क्षमता होती है।
अब ध्यान दीजिएगा हमारे प्राचीन ऋषि मुनि लाखो साल पहले इस तथ्य से परिचित थे इसलिये 4 या 6 साल की उम्र में ही बालक को गुरु के अधीन कर दिया जाता था।
बचपन में आरंभिक शिक्षा में वेद मन्त्र, अनेकानेक गणितीय, वैज्ञानिक, खगोलिकीय सूत्र मंत्रो, श्लोको के मॉध्यम से रटा दिये जाते थे बाद में उच्च कक्षाओ में इस रटे हुए ज्ञान की मीमांसा,विश्लेषण होता था।
अर्थात गुरुकुल पद्धति के अंतर्गत पहले ज्ञान का भंडार बालक के मस्तिष्क में भर दिया जाता था फिर उसके बाद की उच्च कक्षाओ में में उस ज्ञान को processed किया जाता था इसलिये 20 या 25 वर्ष के गुरुकुल के विद्यार्थियों के तेज को देखकर लोग स्वयं सर झुका लेते थे।
प्राचीन काल से लेकर शायद वर्ष 1970, 75 तक भारत में स्कूली गाणित की प्राथमिक कक्षाओ में सवैया,अढैया के पहाड़े होते थे यानी आज की भाषा में 1.5, 2.5 का टेबल।
इस पहाड़े को रट लेने से घरेलु जीवन एवम व्यापार के अनेक कार्य जुबानी मौखिक हो जाते थे बड़े बड़े प्रश्नों को हल करने के लिए किसी कैलकुलेटर यंत्र की आवश्यकता नहीं पडती थी।
यदि आप गाँव की छोटी सी कपड़े की दूकान से कुर्ते का 2.20 मीटर एवं पजामे का 2.75 मीटर का कपड़ा 165 रूपये मीटर के हिसाब से खरीदते तो दुकानदार तुरंत मुंहजबानी हिसाब लगा देता था लेकिन आज आपके लिए ये एक जोड़ी कपड़े का हिसाब बहुत बड़ा सिरदर्द होगा।
ये था अढैया,सवैया जैसे पहाड़ो का चमत्कार लेकिन बड़े ही षड्यंत्रपूर्वक इस गणित को हटाया गया पाठ्यक्रम से ये तर्क देकर की बच्चों के दिमाग पर बहुत बोझ पड़ता है और इसकी जगह, बच्चों का समय नष्ट करने के लिये, kg1 से कक्षा 3 तक हिंदी ,अंग्रेजी अक्षर,सीधे,टेढ़े मेढ़े, घुमावदार लिखने की किताब चला दी गई जिसका कोई उपयोग लाभ नहीं।
इन कक्षाओ में बालक केवल गिनती और अक्षर ही लिखते रह जाता है और उसके जीवन का सबसे कीमती समय नष्ट कर दिया जाता है।
इनके पीछे कौन है षड्यंत्रकारी ??
जब देशी गणितीय पहाड़ो को ख़त्म कर दिया गया नतीजा बच्चों को केवल जोड़ घटाना ही मौखिक करते बना और गुणा,भाग के लिए लिखित कार्य करने की जरुरत होने लगी।
अब जिन बच्चों ने 1970 में प्राचीन गाणित नहीं पढ़ी थी वो जब 1980 में दूकान पर बैठने लगे तो साधारण हिसाब के लिये भी परेशान होने लगे फिर परिदृश्य में आता है छोटा वाला casio कैलकुलेटर जिसमे जोड़, घटाना,गुणा,भाग ही रहते है।
अब 1980 के बाद से भारत की दुकानों में हर व्यापारी के पास ये कैलकुलेटर अनिवार्य हो गया और इस तरह, प्राचीन शिक्षा प्रणाली को धवस्त करके विदेशी व्यापारी ने अपने उत्पाद को भारत में बेचकर खरबो रूपये कमा लिए।
इसी तरह वैलेंटाइन नामक त्योहार को भारत मे लाकर विदेशी उत्पाद चॉकलेट टॉफी आदि से खरबो रुपये कमा लेते हैं।
यूरोप,अमेरिका में बैठे इल्लु के जियोनिस्ट इस तरह अपने उत्पाद बेचने के लिए भारत की नीतियां प्रभावित करते रहते है जिसका प्रभाव 20 वर्ष बाद समझ आता है।
संज्ञानात्मक
जय श्री राम
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