ईल्लु २५
इल्लुमिनाति का भारत मे शिक्षा व्यवस्था पर षड्यंत्र
भाग-25
टॉफी बांटो
मित्रो आप यदि जागरूक है तो बच्चों के लिये वर्षो पहले और आज भी टॉफी नहीं खरीदते होंगे किंतु बच्चों में टॉफी बाजार में टॉफी सामने क्यों रखी और इतनी बिक्री कैसे?
जियोनिस्ट आकाओं के इशारे पर मिशनरी,इसाई उद्योग, व्यापार, विज्ञापन सब एक साथ जुड़े हुए होते है तो भारत में शुभ अवसरों पर मिठाई खाने खिलाने का प्रचलन रहा है सरकारी स्कूलों एवम अन्य स्कूलों,संस्थाओं में, 15 अगस्त, 26 जनवरी एवम अन्य अवसरों पर मिठाई, बूंदी के लड्डू ,नमकीन आदि बांटे जाते रहे है।
अब भारतीय बच्चों में टॉफी कैसे लोकप्रिय हो इसके लिए इसाई स्कूलों एवम जहॉ जहॉ इसाई प्रिंसिपल आदि रहे है वहां स्कुली बच्चों का जन्मदिन स्कुल में ही मनाने को प्रोत्साहित किया गया और इसके लिये बच्चों को टॉफी बाटने की प्रेरणा दी गई तो कुछ बच्चों ने ये आरम्भ किया और कुछ वर्ष बीतने पर ये एक परम्परा बन गई स्कूलों में और भारतीय लोगो की गुलामी मानसिकता ये है कि
महाजनों येन गता सा पन्था।
अर्थात-बड़े लोग,समृद्ध लोग,जिस दिशा में चले वही अच्छा रास्ता है।
तो अन्य स्कूलों में भी ये टॉफी बाटने की परंपरा आरम्भ हो गई जबकि 1990 तक स्कुली बच्चों के दांतों में समस्याए आने पर स्कूलों में चिकित्सा परामर्श डाक्टरो द्वारा दिए जाने लगे थे जिसमें टॉफी को दांतों के लिये बहुत हानिकारक बताया गया था क्योंकि इसमें निकल, मैंगनीज आदि खतरनाक धातु तत्व होने की बात कही गई थी और टॉफी दांतो के बीच घुस जाती है तो चिपक जाती है जो कि दांत सड़ने की पहली अवस्था होती है।
जबकि गुड़ , मिठाई आदि ये प्राकृतिक तत्व होते है जोकि लार के सम्पर्क में रहते कुछ घण्टो में घुल जाते है जबकि टॉफी अप्राकर्तिक धातु उपस्थित होने के कारण लम्बे समय तक दांतो के बीच फ़सी रहती है।
चाकलेट के अलग मीठे स्वाद के कारण बच्चों को ये टाफियां अच्छी लगी विज्ञापन दिखाये गए विशेष स्कूलों ने अप्रत्यक्क्ष मार्केटिंग में सहयोग किया और दांतों के डाक्टरो की संख्या में वृद्धि सम्बंधित अंग्रेजी विदेशी दवाईयो की बिक्री अरबो रूपये की प्रतिवर्ष होने लगी है।
दांतो और शरीर के लिये लाभदायक संतरे की गोली,शहद,और गुड़पाग (जिसको खाने से बुखार नही होता, लिवर स्वस्थ रहता है) गायब हो गए!
कैसे??
संज्ञान लीजिये
जय श्री राम
⚔️🦁🚩
भाग-25
टॉफी बांटो
मित्रो आप यदि जागरूक है तो बच्चों के लिये वर्षो पहले और आज भी टॉफी नहीं खरीदते होंगे किंतु बच्चों में टॉफी बाजार में टॉफी सामने क्यों रखी और इतनी बिक्री कैसे?
जियोनिस्ट आकाओं के इशारे पर मिशनरी,इसाई उद्योग, व्यापार, विज्ञापन सब एक साथ जुड़े हुए होते है तो भारत में शुभ अवसरों पर मिठाई खाने खिलाने का प्रचलन रहा है सरकारी स्कूलों एवम अन्य स्कूलों,संस्थाओं में, 15 अगस्त, 26 जनवरी एवम अन्य अवसरों पर मिठाई, बूंदी के लड्डू ,नमकीन आदि बांटे जाते रहे है।
अब भारतीय बच्चों में टॉफी कैसे लोकप्रिय हो इसके लिए इसाई स्कूलों एवम जहॉ जहॉ इसाई प्रिंसिपल आदि रहे है वहां स्कुली बच्चों का जन्मदिन स्कुल में ही मनाने को प्रोत्साहित किया गया और इसके लिये बच्चों को टॉफी बाटने की प्रेरणा दी गई तो कुछ बच्चों ने ये आरम्भ किया और कुछ वर्ष बीतने पर ये एक परम्परा बन गई स्कूलों में और भारतीय लोगो की गुलामी मानसिकता ये है कि
महाजनों येन गता सा पन्था।
अर्थात-बड़े लोग,समृद्ध लोग,जिस दिशा में चले वही अच्छा रास्ता है।
तो अन्य स्कूलों में भी ये टॉफी बाटने की परंपरा आरम्भ हो गई जबकि 1990 तक स्कुली बच्चों के दांतों में समस्याए आने पर स्कूलों में चिकित्सा परामर्श डाक्टरो द्वारा दिए जाने लगे थे जिसमें टॉफी को दांतों के लिये बहुत हानिकारक बताया गया था क्योंकि इसमें निकल, मैंगनीज आदि खतरनाक धातु तत्व होने की बात कही गई थी और टॉफी दांतो के बीच घुस जाती है तो चिपक जाती है जो कि दांत सड़ने की पहली अवस्था होती है।
जबकि गुड़ , मिठाई आदि ये प्राकृतिक तत्व होते है जोकि लार के सम्पर्क में रहते कुछ घण्टो में घुल जाते है जबकि टॉफी अप्राकर्तिक धातु उपस्थित होने के कारण लम्बे समय तक दांतो के बीच फ़सी रहती है।
चाकलेट के अलग मीठे स्वाद के कारण बच्चों को ये टाफियां अच्छी लगी विज्ञापन दिखाये गए विशेष स्कूलों ने अप्रत्यक्क्ष मार्केटिंग में सहयोग किया और दांतों के डाक्टरो की संख्या में वृद्धि सम्बंधित अंग्रेजी विदेशी दवाईयो की बिक्री अरबो रूपये की प्रतिवर्ष होने लगी है।
दांतो और शरीर के लिये लाभदायक संतरे की गोली,शहद,और गुड़पाग (जिसको खाने से बुखार नही होता, लिवर स्वस्थ रहता है) गायब हो गए!
कैसे??
संज्ञान लीजिये
जय श्री राम
⚔️🦁🚩
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