ईल्लु २४
इल्लुमिनाति का भारत मे शिक्षा व्यवस्था पर षड्यंत्र!
भाग-24
शैक्षणिक सत्र(अवकाश)
मित्रो 1947 के बाद भारत में 32 करोड़ हिन्दू और 5 करोड़ मुस्लिम थे और भारतवासियों का मुख्य व्यवसाय और कमाई का साधन कृषि ही था और व्यापार जगत भी इसी कृषि उत्पाद आधारित था उद्योग आधारित नहीं।
तो जुलाई में स्कूल खुलते हैं पूरे भारत में मार्च तक परीक्षाएं होती हैं!
फिर गेहू की फसल कटने के बाद घरों में शादियां होती थी सभी सम्बन्धी जन मामा,चाचा, फूफा,जीजा,मौसी आदि घर में विवाह कार्यक्रम में एकत्रित होते थे पारिवारिक सम्बन्ध प्रगाढ़ होते थे छोटे बच्चों को सभी सम्बन्धियो से स्नेह मिलता था जो कि सभी के लिये हितकारी होता था भविष्य में।
पूरे देश में जुलाई से अप्रैल तक का सत्र लगता था और 2 माह बच्चे पूरी तरह मानसिक रूप से स्वस्थ मुक्त रहते थे और ज्येष्ठ माह की भीषण गर्मी के पहले विवाह कार्य निपट जाते थे।
पर पता नही ये सामाजिक,पारिवारिक सद्भाव किस हिन्दू विरोधी को पसंद नही आया और शिक्षा सत्र अप्रैल से आरम्भ हुआ और भारतीय हिन्दू पारिवारिक कार्य पूरी तरह बिखर गए और अब लोग केवल 2 दिन की छुट्टी ही लेकर आ पाते है कार्यक्रम में सम्मिलित हो पाते हैं।
दूसरा पक्ष इसका ये है कि अप्रैल में शिक्षा सत्र समाप्त होने से इसाई मिशनरियों को अपने स्कूलों का ताम झाम बनाये रखने में बहुत दिक्कत होती है क्योंकि संलग्न स्टाफ़ को वेतन तो देना ही पड़ता था तो पहले बहुमत बढ़ाने के लिये निजी स्कूल खोलने के नियमो में शिथिलता की गई और कक्षा 4 तक तो अनुमति विशेष की आवश्यकता भी नही रही।
ये शायद 1990 के बाद की बात है अब निजी स्कूलों की संख्या बहुत बढ़ गई तो फिर बिना किसी मांग के बच्चों के माता पिता से पूछे बिना अचानक नियम बना दिया गया कि शिक्षा सत्र अप्रैल से आरम्भ होगा जुलाई से नहीं।
इस तरह एक झटके में देश के निजी स्कूलों को गर्मी के 2 माह की मुफ्त फीस मिलने लगी और खर्चे ताम झाम व्यवस्थित हो गए!
अब सोचिये शहर में चलने वाले आपके परिचित का एक बहुत बड़ा स्कूल है क्या मात्र उनके कहने पर शिक्षा मंत्रालय नियम बदल देगा??
वास्तव में विभिन्न नामो से संचालित शक्तिशाली जियोनिस्ट लाबी ने ये सब करवाया था।
देश के नीति नियमो के निर्धारक कौन ??
संज्ञान लीजिये
जय श्री राम
⚔️🦁🚩
भाग-24
शैक्षणिक सत्र(अवकाश)
मित्रो 1947 के बाद भारत में 32 करोड़ हिन्दू और 5 करोड़ मुस्लिम थे और भारतवासियों का मुख्य व्यवसाय और कमाई का साधन कृषि ही था और व्यापार जगत भी इसी कृषि उत्पाद आधारित था उद्योग आधारित नहीं।
तो जुलाई में स्कूल खुलते हैं पूरे भारत में मार्च तक परीक्षाएं होती हैं!
फिर गेहू की फसल कटने के बाद घरों में शादियां होती थी सभी सम्बन्धी जन मामा,चाचा, फूफा,जीजा,मौसी आदि घर में विवाह कार्यक्रम में एकत्रित होते थे पारिवारिक सम्बन्ध प्रगाढ़ होते थे छोटे बच्चों को सभी सम्बन्धियो से स्नेह मिलता था जो कि सभी के लिये हितकारी होता था भविष्य में।
पूरे देश में जुलाई से अप्रैल तक का सत्र लगता था और 2 माह बच्चे पूरी तरह मानसिक रूप से स्वस्थ मुक्त रहते थे और ज्येष्ठ माह की भीषण गर्मी के पहले विवाह कार्य निपट जाते थे।
पर पता नही ये सामाजिक,पारिवारिक सद्भाव किस हिन्दू विरोधी को पसंद नही आया और शिक्षा सत्र अप्रैल से आरम्भ हुआ और भारतीय हिन्दू पारिवारिक कार्य पूरी तरह बिखर गए और अब लोग केवल 2 दिन की छुट्टी ही लेकर आ पाते है कार्यक्रम में सम्मिलित हो पाते हैं।
दूसरा पक्ष इसका ये है कि अप्रैल में शिक्षा सत्र समाप्त होने से इसाई मिशनरियों को अपने स्कूलों का ताम झाम बनाये रखने में बहुत दिक्कत होती है क्योंकि संलग्न स्टाफ़ को वेतन तो देना ही पड़ता था तो पहले बहुमत बढ़ाने के लिये निजी स्कूल खोलने के नियमो में शिथिलता की गई और कक्षा 4 तक तो अनुमति विशेष की आवश्यकता भी नही रही।
ये शायद 1990 के बाद की बात है अब निजी स्कूलों की संख्या बहुत बढ़ गई तो फिर बिना किसी मांग के बच्चों के माता पिता से पूछे बिना अचानक नियम बना दिया गया कि शिक्षा सत्र अप्रैल से आरम्भ होगा जुलाई से नहीं।
इस तरह एक झटके में देश के निजी स्कूलों को गर्मी के 2 माह की मुफ्त फीस मिलने लगी और खर्चे ताम झाम व्यवस्थित हो गए!
अब सोचिये शहर में चलने वाले आपके परिचित का एक बहुत बड़ा स्कूल है क्या मात्र उनके कहने पर शिक्षा मंत्रालय नियम बदल देगा??
वास्तव में विभिन्न नामो से संचालित शक्तिशाली जियोनिस्ट लाबी ने ये सब करवाया था।
देश के नीति नियमो के निर्धारक कौन ??
संज्ञान लीजिये
जय श्री राम
⚔️🦁🚩
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