ईल्लु २८
इल्लुमिनाति का भारत मे शिक्षा व्यवस्था पर षड्यंत्र!
भाग-28
स्कूली विद्यार्थियों को टारगेट बनाना।
मित्रो भारत के लोगो को लगता था और अभी भी लगता है कि अख़बार अलग है पत्रिकाएं अलग होती है।
फिल्मे कोई बनाता है।
टीवी अलग होती है।
और ये सब स्वतंत्र होते है।
पर इन माध्यमो की खबरों के तरीके गुणवत्ता पर ध्यान देंगे तो पता चल जाएगा कि उपर्युक्त सबके पीछे कोई नियंत्रक भी बैठा है।
मेरे पिता जी बताते है कि 1988-89 में सुबह 8 बजे दुरदर्शन पर teenage turmoil नामक एक कार्यक्रम आता था जिसमे स्कुल के कक्षा 9 से ऊपर के विद्यार्थियों लड़के लड़कियों को एक दूसरे की तरफ आकर्षित होते दिखाने वाला कार्यक्रम होता था।
और ये वही समयकाल था जब स्कूलों में पहली बार यौन शिक्षा के नाम पर महिला पुरुष के गुप्त अंगो के चित्र सहित जीव विज्ञान की किताब में अध्याय आरम्भ हुआ था।
ये वही समयकाल था जब अखबारों में टेनिस खिलाड़ियों मार्टिना नवरातिलोवा के मैच के दौरान महिला खिलाड़ी के विशिष्ट अंगो को दिखाने वाले बड़े बड़े फोटो अखबारों में आते थे।
ये वही समयकाल था जब बॉलीवुड में राजकपूर की प्रसिद्ध फिल्मों में कुछ मिनट का स्त्री शरीर के अंग को दिखाने वाला कोई दृश्य होता और इनकी फिल्म अंग्रेजी स्कूल पर आधारित होती थी।
ये वही समय था जब जो जीता वही सिकन्दर नाम की स्कूली विद्यार्थियों की प्रेम कहानी और प्रतियोगिता प्रतिद्वंदिता को लेकर फिल्म बनी जिसमे महंगे अंग्रेजी स्कूलों की पृष्ठभूमि ही थी और इस फ़िल्म में स्कूली लड़के लड़कियों में अवैध संबंधों की बात दिखाई गई उस तरह के डायलॉग, एक्शन रखे गए थे।
और ये अब वही समयकाल है जब एक फिल्म में एक सीन में अमिताभ के हाथ में कंडोम दिखाया गया विवाह रजिस्ट्री कार्यालय में।
ये वही समयकाल है जब कंडोम का सर्वजिनिक विज्ञापन हो रहा है।
और आप सोचते है की भारत के अखबार, टीवी, फिल्मे, पत्रिकाएं अलग अलग लोगो के स्वतंत्र अधिकार में है।
भ्रामक तथ्य है ये!
वास्तविकता ये है कि परदे के पीछे कोई है जो इन सब माध्यमो को एक साथ एक विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति हेतु संचालित करता है मॉध्यम अलग अलग पर उत्तेजक कथा कहानी एक जैसे।
एक विशिष्ट वर्ग को एक साथ एक ही समय काल में टारगेट करते हुए ये है इल्लु की ताकत भारत में!
हम भारतीय इनके बनाये कुचक्र को अपनाकर आधुनिकता का परिचय देते हैं और अपनी संस्कृति का विनाश करते हैं।
संज्ञान लीजिये
जय श्री राम
⚔️🦁🚩
भाग-28
स्कूली विद्यार्थियों को टारगेट बनाना।
मित्रो भारत के लोगो को लगता था और अभी भी लगता है कि अख़बार अलग है पत्रिकाएं अलग होती है।
फिल्मे कोई बनाता है।
टीवी अलग होती है।
और ये सब स्वतंत्र होते है।
पर इन माध्यमो की खबरों के तरीके गुणवत्ता पर ध्यान देंगे तो पता चल जाएगा कि उपर्युक्त सबके पीछे कोई नियंत्रक भी बैठा है।
मेरे पिता जी बताते है कि 1988-89 में सुबह 8 बजे दुरदर्शन पर teenage turmoil नामक एक कार्यक्रम आता था जिसमे स्कुल के कक्षा 9 से ऊपर के विद्यार्थियों लड़के लड़कियों को एक दूसरे की तरफ आकर्षित होते दिखाने वाला कार्यक्रम होता था।
और ये वही समयकाल था जब स्कूलों में पहली बार यौन शिक्षा के नाम पर महिला पुरुष के गुप्त अंगो के चित्र सहित जीव विज्ञान की किताब में अध्याय आरम्भ हुआ था।
ये वही समयकाल था जब अखबारों में टेनिस खिलाड़ियों मार्टिना नवरातिलोवा के मैच के दौरान महिला खिलाड़ी के विशिष्ट अंगो को दिखाने वाले बड़े बड़े फोटो अखबारों में आते थे।
ये वही समयकाल था जब बॉलीवुड में राजकपूर की प्रसिद्ध फिल्मों में कुछ मिनट का स्त्री शरीर के अंग को दिखाने वाला कोई दृश्य होता और इनकी फिल्म अंग्रेजी स्कूल पर आधारित होती थी।
ये वही समय था जब जो जीता वही सिकन्दर नाम की स्कूली विद्यार्थियों की प्रेम कहानी और प्रतियोगिता प्रतिद्वंदिता को लेकर फिल्म बनी जिसमे महंगे अंग्रेजी स्कूलों की पृष्ठभूमि ही थी और इस फ़िल्म में स्कूली लड़के लड़कियों में अवैध संबंधों की बात दिखाई गई उस तरह के डायलॉग, एक्शन रखे गए थे।
और ये अब वही समयकाल है जब एक फिल्म में एक सीन में अमिताभ के हाथ में कंडोम दिखाया गया विवाह रजिस्ट्री कार्यालय में।
ये वही समयकाल है जब कंडोम का सर्वजिनिक विज्ञापन हो रहा है।
और आप सोचते है की भारत के अखबार, टीवी, फिल्मे, पत्रिकाएं अलग अलग लोगो के स्वतंत्र अधिकार में है।
भ्रामक तथ्य है ये!
वास्तविकता ये है कि परदे के पीछे कोई है जो इन सब माध्यमो को एक साथ एक विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति हेतु संचालित करता है मॉध्यम अलग अलग पर उत्तेजक कथा कहानी एक जैसे।
एक विशिष्ट वर्ग को एक साथ एक ही समय काल में टारगेट करते हुए ये है इल्लु की ताकत भारत में!
हम भारतीय इनके बनाये कुचक्र को अपनाकर आधुनिकता का परिचय देते हैं और अपनी संस्कृति का विनाश करते हैं।
संज्ञान लीजिये
जय श्री राम
⚔️🦁🚩
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