ईल्लु १६

इल्लुमिनाति का भारत मे शिक्षा व्यवस्था पर षड्यंत्र

भाग-16

बीएड, एमएड

मित्रो वर्ष 2000 से पहले तक स्कूलों में कार्यरत पढाने वाले शिक्षक को ही बीएड,एमएड करने का प्रावधान था ताकि बच्चों को पाठ सिखाने का सही तरीका, सरल तरीका, उनके मनोविज्ञान को समझने, उनको प्रोत्साहित करने के तरीके सिखाये, समझाए जा सके।

वर्ष 2000 के बाद अचानक पूरे देश में बरसाती कुकुरमुत्ते या पान की तरह बीएड कालेज खुल गए और
निजी या सरकारी स्कूल में अध्यापन कार्य हेतु ये अनिवार्य योग्यता निर्धारित कर दी गई।

क्यों??

अब एक बात स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि

1.जिस विद्यार्थी ने कॉलेज मे 90 प्रतिशत से B.Sc या M.Sc किया है वो अधिक बुद्धिमान होगा या जिसने 60% से यही डिग्री+ बीएड किया है वो?

वर्तमान मापदंड के अनुसार 60% वाले प्रत्याशी को नौकरी हेतु योग्य माना जाएगा क्योंकि उनके पास B. Ed की डिग्री नही है।

क्या ये आश्चर्य की बात नहीं?

आखिर इन बीएड और एमएड पाठ्यक्रम का उद्देश्य क्या है ?

तो उद्देश्य ये है कि विद्यार्थियों का पैसा व्यर्थ करवाना 2 साल का कीमती समय नष्ट करवाना और सबसे महत्वपूर्ण ये कि योग्य प्रत्याशी यदि आर्थिक रूप से सक्षम नही है तो उसको अध्यापन कार्य में नहीं आने देना बल्कि पैसे के बल पर जो डिग्री हासिल कर ले उसको ही शिक्षक बनने का अवसर मिले और बच्चों का भविष्य खराब हो।

और यही इल्लु का उद्देश्य है जो पैसे देकर डिग्री लेता है वो अध्यापन में बिल्कुल भी लगाव नही रखता।

साथ ही इन पाठ्यक्रमो में देखिये पूरी तरह यूरोप के मनोविज्ञान के अध्याय लिखे हुए हैं भारत से सम्बंधित तथ्यों का उल्लेख ना के बराबर है।

जबकि होना ये चाहिए इस बीएड पाठ्यक्रम में स्कूल में पढ़ने वाला विद्यार्थी यदि किसान या मोची या रिक्शेवाले की सन्तान है तो कैसे उसको प्रोत्साहित किया जाए संस्कारित कैसे किया जाए भारतीय किशोर, युवतियों को किस तरह से समझाया जाए।

किंतु बी एड,एम एड की किताबो में पूरी तरह यूरोपीय विद्वानों का साहित्य भरा हुआ है जोकि भारत के किसी भी सन्दर्भ में उपयुक्त नही।

और 2 वर्ष के लंबे पाठ्यक्रम की क्या आवश्यकता यदि केवल teaching techniques ही सिखानी है और इन बीएड कोर्सेस की विफलता स्पष्ट दिखाई देती है जब हम लोग साल में कई महीने बच्चों को क्राफ्ट वर्क हाथ में लिये हुए ऑटो या बस या रिक्शे में सवार देखते है और कॉपी चेक करिये तो चित्र बनाने के नाम पर व्यर्थ के चित्र बने हुए रहते है।

क्या बस या प्लेन या मॉल या बाँध का चित्र या क्राफ्ट बनाना जरूरी है जबकि आजकल हर चीज का वीडियो , फोटो गूगल पर उपलब्ध है?

अनेक अनुभवी शिक्षकों का कहना है कि बच्चों को पढ़ाने और सम्भालने का तरीका कोई किताब नही सीखा सकती ये शिक्षक अपने अनुभव से सीखता है।

साथ ही 2 साल के कोर्स में पढ़ा हुआ कुछ याद नही रह जाता वर्तमान कक्षा के अनुरूप पढाना पड़ता है विशेषकर बीएड,एमएड के पाठ्यक्रम में भारतीय सभ्यता,गुरु शिक्षक सम्बन्ध,व्यवहार के विपरीत लैंगिक तथ्य दिए होते है जोकि पूर्णत: यूरोप से आयातित कापी पेस्ट है( संविधान की तरह) और कुछ आपात्तिजनक, कुछ अव्यावहारिक।

भारत के स्नातक विद्यार्थियों का समय नष्ट कराने,पैसा खींचने (अस्पताल की तरह), निर्धन योग्य प्रत्याशियों को नौकरी से दूर रखने,यूरोपीय साहित्य मनोविज्ञान को जबर्दस्ती प्रसारित करने और अंततः स्कुली बच्चों को मायाजाल में फंसाकर रखने का माध्यम है ये पाठ्यक्रम।

क्योंकि अध्यापक किसी कक्षा में वही पढ़ाता है जोकि पाठ्यक्रम में है जोकि अभ्यास क्रम में है जोकि क्राफ्ट वर्क या चित्र बनाने हेतु निर्देश है।

और इन सब कार्यो में बच्चों के माता पिता तक शामिल, व्यस्त हो जाते है तो फिर शिक्षक की बीएड डिग्री की उपयोगिता कहाँ है ??

संज्ञान लीजिए

जय श्री राम
⚔️🦁🚩

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