PART 6

PART 6

अमेरिका के हटिंगटन स्थित यूनाइटेड ब्रेदेन चर्च में बिशप के पद पर कार्यरत राइट ब्रदर्स के पिता ने बचपन में उन्हें एक खिलौना हेलीकॉप्टर दिया था जिसने दोनों भाइयों को असली का उड़न यंत्र बनाने के लिए प्रेरित किया।
कागज, रबर और बांस का बना हुआ यह हेलीकॉप्टर फ्रांस के एयरोनॉटिक विज्ञानी अल्फोंसे पेनाउड के एक अविष्कार पर आधारित था और उसी खिलौने को दोनो भाइयो ने वास्तविकता के धरातल पर उतारा 17 दिसंबर सन 1903 को पहली बार पूर्ण नियंत्रित मानव हवाई उड़ान को सफलतापूर्वक अंजाम देने वाले ऑरविल (Orville)और विलबर राइट (Wilbur) ने साइकिल की संरचना को ध्यान में रखकर उसमे अलग अलग कल पुर्जे जोड़कर हवाई जहाज का विकास करते रहे। उन्होंने कई बार हवा में उड़ने वाले ग्लाइडर बनाए और अंत में जाकर हवाई जहाज बनाने का उनका सपना सच हुआ।
जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि एयरोनॉटिक विज्ञानी अल्फोंसे पेनाउड इसपे पहले से काम कर रहे थे और उन्होंने अनेक मॉडल बनाये थे इसलिए ये सपष्ट हो जाता है कि कही न कही राइट बंधुओ की खोज के पहले भी ये सब अस्तित्व में थे भले कल्पना में ही सही ।
प्राचीन भारतीय लोग हवाई यात्रा के लिए वायुयान और समुद्री यात्रा के लिए ‘जलयान’ का प्रयोग करते थे । इसके अतिरिक्त एक शब्द मिलता है विमान ।
विमान शब्द ‘विमा’ से आया है जिसका अर्थ होता है आयाम (Dimension) । वास्तव में विमान एक ऐसा यन्त्र (Machine) था, जिसकी सहायता से (या जिसमे बैठ कर) ‘अंतर्विमीय’ (Inter-Dimensional) यात्रा की जा सकती थी । इसलिए ये समझने का विषय है कि विमान और वायुयान ये 2 प्रकार है जैसे राकेट और हवाईजहाज और इन दोनो को बनाए जाने रख रखाव यहाँ तक कि परिचालन के संदर्भ में भी विस्तृत वर्णन मिलता है ।
वैदिक साहित्यो में कही जगह और कई बार उल्लेख मिलते है आइये देखते है -
ऋगवेद में कम से कम 200 बार विमानों के बारे में उल्लेख है।
उन में तिमंजिला, त्रिभुज आकार के तथा तिपहिये विमानों का उल्लेख है, जिन्हें अश्विनी कुमारों (वैज्ञिानिकों) ने बनाया था। उनमें साधारणतया तीन यात्री जा सकते थे। इनविमानों के निर्माण के लिये स्वर्ण, )सोना) रजत )चाँदी) तथा लौह (लोहे) धातु का प्रयोग किया गया था तथा उनके दोनों ओर पंख लगे होते थे।
वेदों में विमानों के कई आकार-प्रकार उल्लेख किये गये हैं।
(1.) अहनिहोत्र विमानः-- इनके दो ईंजन तथा हस्तः विमान (हाथी की शक्ल का विमान) में दो से अधिक ईंजन होते थे।
(2.) एक अन्य विमान का रुप किंग-फिशर पक्षी के अनुरूप था।
इसी प्रकार कई अन्य जीवों के रूप वाले विमान थे।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि बीसवीं सदी की तरह पहले भी मानवों ने उड़ने की प्रेरणा पक्षियों से ही ली होगी।
(1.) जल-यान – यह वायु तथा जल दोनों तलों में चल सकता है।
यास्ते पृषन्नावो अन्तः समुद्रे हिरण्ययीरन्तरिक्षे चरन्ति । (ऋग्वेद 6.58.3)
(2.) कारा – यह भी वायु तथा जल दोनों तलों में चल सकता है।
परि प्रासिष्यदत् कविः सिन्धोरूर्मावधिं श्रितः । कारं बिभ्रत पुरुसपृहम् ।। (ऋग्वेद 9.14.1)
(3.) त्रिताला – इस विमान का आकार तिमंजिला है। (ऋग्वेद 3.14.1)
(4.) त्रिचक्र रथ – यह तिपहिया विमान आकाश में उड सकता है।
अनश्वो जातो अनभीशुरुक्थ्योः रथस्त्रिचक्रः परि वर्तते रजः ।। (ऋग्वेद 4.36.1)
(5.) वायु रथ – रथ की शक्ल का यह विमान गैस अथवा वायु की शक्ति से चलता है।
प्र वो वायुं रथयुजं कृणुध्वं प्र देवं विप्रं पनितारमर्कैः ।। (ऋग्वेद 5.41.6)
(6.) विद्युत रथ – इस प्रकार का रथ विमान विद्युत की शक्ति से चलता है।
विद्युद्रथः सहसस्पुत्रो अग्निः शोचिष्केशः पृथिव्यां पाजो अश्रेत् ।। (ऋग्वेद 3.14.1).
यजुर्वेद में भी एक अन्य विमान का तथा उन की संचलन प्रणाली का उल्लेख है, जिसका निर्माण महान् वैज्ञानिक अश्विनी कुमारों ने किया था ।
पुराणों में विभिन्न देवी-देवता, यक्ष, विद्याधर आदि विमानों द्वारा यात्रा करते हैं।
रामायण में पुष्पक विमान का वर्णन आता है।
महाभारत में श्रीकृष्ण, जरासंध आदि के विमानों का वर्णन आता है।
भागवतपुराण में कर्दम ऋषि की कथा आती है। तपस्या में लीन रहने के कारण वे अपनी पत्नी की ओर ध्यान नहीं दे पाए। इसका भान होने पर उन्होंने अपने विमान से उसे संपूर्ण विश्व का दर्शन कराया।
अभिज्ञान शाकुंतल में भी विमान के विषय का स्पष्ट उल्लेख और राजर्षि दुष्यंत के प्रयोग भासित होता है।
एक प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ “गयाचिन्तामणि” में मयूर जैसे आकार के विमान का उल्लेख है। भागवतम में शाल्व राजा के विमान का स्पष्ट उल्लेख मिलता है शाल्व का विमान भूमि आकाश, जाल, पहाड़ आदि पर चलता था। महाराजा भोज के ग्रन्थ समरांगण –सूत्रधार ग्रन्थ में भी विमान की रचना ‘दारुमयपक्षी’ की रचना के रूप में ही कहीं गयी है।
हजारों वर्ष पूर्व ऋषि भरद्वाज हुए, इन्होंने संसार में सर्वप्रथम विमानशास्त्र की रचना की और विमान यान का आविष्कार किया । इनकी पुस्तक के आधार पर सैकड़ों पुस्तकें लिखी गईं । भारत में जो पुस्तक उपलब्ध है उनमें सबसे पुरानी पुस्तक 1500 साल पुरानी है और महर्षि भरद्वाज तो उससे भी बहुत पहले हुए लेकिन वैदिक साहित्य में इनके अतिरिक्त भी अन्य विमानिकी के साहित्य उपलब्ध है ।
#प्रमुख_वैमानिकी_शास्त्र -
अगस्त्य कृत-शक्तिसूत्र, ईश्वर कृत-सौदामिनी कला, भरद्वाज कृत-अंशुबोधिनी, यंत्र सर्वस्व तथा आकाश शास्त्र, शाक्टायन कृत- वायुतत्व प्रकरण,नारायण कृत-विमान चंद्रिका ,शौनक कृत- व्योमयान तंत्र, गर्ग कृत-यंत्रकल्प , वाचस्पतिकृत-यान बिन्दु ,चाक्रायणीकृत- खेटयान प्रदीपिका , धुण्डीनाथ- वियोमयानार्क प्रकाश
नारद कृत-वैश्वानरतंत्र, धूम प्रकरण आदि, लेकिन आज हम महर्षि भारद्वाज के विमानिकी की चर्चा करेंगे और उसे आज के वर्तमान वैज्ञानिक कसौटियों पर कसेंगे भी -
भरद्वाज कृत विमान शास्त्र के कई टीका किये गए है इन्ही टीकाकारों में से एक बोधानंद जी लिखते हैं-
निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधिं भरद्वाजो महामुनि:।
नवनीतं समुद्घृत्य यंत्रसर्वस्वरूपकम्‌॥
प्रायच्छत्‌ सर्वकोकानामीपिस्तार्थफलप्रदम्‌॥
नानाविमानवैतित्र्यरचनाक्रमबोधकम्‌।
अष्टाध्यायैर्विभजितं शताधिकरणैयुर्तम्‌॥
सूत्रै: पश्चशतैर्युक्तं व्योमयानप्रधानकम्‌।
वैमानिकाधिकरणमुक्तं भगवता स्वयम्‌॥
अर्थात्‌-भरद्वाज महामुनि ने वेदरूपी समुद्र का मन्थन करके यंत्र सर्वस्व नाम का एक मक्खन निकाला है, जो मनुष्य मात्र के लिए इच्छित फल देने वाला है। उसके चालीसवें अधिकरण में वैमानिक प्रकरण है जिसमें विमान विषयक रचना के क्रम कहे गये हैं। यह ग्रंथ आठ अध्याय में विभाजित है तथा उसमें एक सौ अधिकरण तथा पांच सौ सूत्र हैं तथा उसमें विमान का विषय ही प्रधान है।
#विमान_के_प्रकार- विमान विद्या के पूर्व आचार्य युग के अनुसार विमानों का वर्णन करते है। मंत्रिका प्रकार के विमान, जिसमें भौतिक एवं मानसिक शक्तियों के सम्मिश्रण की प्रक्रिया रहती थी, वह सतयुग और त्रेता युग में संभव था। इसमें 25 प्रकार के विमान का उल्लेख है। द्वापर युग में तांत्रिका प्रकार के विमान थे। इनके 56 प्रकार बताये गए हैं तथा कलियुग में कृतिका प्रकार के यंत्र चालित विमान थे, इनके 25 प्रकार बताये गए हैं। इनमें शकुन, रूक्म, हंस, पुष्कर, त्रिपुर आदि प्रमुख थे।
#विमान_के_यंत्र- विमान शास्त्र में 31 प्रकार के यंत्र तथा उनका विमान में निश्चित स्थान का वर्णन मिलता है। इन यंत्रों का कार्य क्या है? इसका भी वर्णन किया गया है।
#सर्वाइवल_तकनीकी - वैमानिक का खाद्य-इसमें किस ऋतु में किस प्रकार का अन्न हो, इसका वर्णन है। उस समय के विमान आज से कुछ भिन्न थे। आज तो विमान उतरने की जगह निश्चित है पर उस समय विमान कहीं भी उतर सकते थे। अत: युद्ध के दौरान जंगल में उतरना पड़ा तो जीवन निर्वाह कैसे करना, इसीलिए १०० वनस्पतियों का वर्णन दिया है जिनके सहारे दो-तीन माह जीवन चलाया जा सकता है।
पूरी दुनिया के लिए राइट ब्रदर्स ही हवाईजहाज के असली खोजकर्ता थे, मगर इतिहास के पन्नों में एक कहानी और भी है। वह कहानी है शिवकर बापूजी तलपड़े की, जिन्हें हवाई जहाज का असली जनक माना जाता है।
1864 को मुंबई में पैदा हुए शिवकर बापूजी तलपड़े शुरुआत से ही एक होनहार विद्यार्थी थे संस्कृत और पौराणिक वेद उनके सबसे प्रिय ग्रन्थ थे।
शिवकर बापूजी तलपड़े ने हजारों साल पहले भारद्वाज ऋषि द्वारा लिखी गई किताब वैमानिका शास्त्र को पढ़ा और उनकी सोच बदल गई, बाकियों के लिए तो यह सारी बातें महज़ एक कहानी भर थी मगर शिवकर बापूजी तलपड़े ने इसे हकीकत समझा।वस्तुतः वह एक पूर्ण विमान बनाना चाहते थे ताकि इंसान भी पक्षियों की भांति उड़ सके. अपनी इस सोच के साथ शिवकर बापूजी लग गए विमान की खोज में ,शिवकर बापूजी ने अपना विमान बना दिया था और अब बस उसे उड़ा के देखना बाकी रह गया था, उन्होंने उस विमान का नामा ‘#मरुत्सखा’ रखा था।
इस नाम का मतलब था ‘हवा का दोस्त’.
साल 1895 की उस सुबह शिवकर बापूजी अपना विमान लेकर मुंबई के चौपाटी पर गए। उनके इस आविष्कार को देखने के लिए कोई पत्रकार वहां मौजूद नहीं था। वहां थे तो बस बापूजी के कुछ अपने जिन्हें उन पर पूरा भरोसा था। उन्होंने अपना विमान तैयार किया उड़ान के लिए। मन ही मन सबने उनकी कामयाबी की दुआ मांगी।
कहते हैं कि करीब 1500 फीट की ऊंचाई बापूजी के विमान ने पा ली थी और उसके बाद वह नीचे आ गिरा।
वायुगतिकी (Aerodynamics) गतिविज्ञान की वह शाखा है जिसमें वायु तथा अन्य गैसीय तरलों (gaseous fluids) की गति का और इन तरलों के सापेक्ष गतिवान ठोसों पर लगे बलों का विवेचन होता है। इस विज्ञान के सार्वाधिक महत्वपूर्ण अनुप्रयोगों में से एक अनुप्रयोग वायुयान की अभिकल्पना है।जब वायु में गतिवान पिंड का वेग ध्वनि वेग के समीप आ जाता है, या उससे भी अधिक हो जाता हैं तब धनत्व और ताप में परिवर्तनों का प्रभाव पिंड पर क्रियान्वित दाबबलों की व्याख्या में महत्वपूर्ण हो जाता है। तब तरल को असंपीड्य नहीं माना जा सकता और दाब, घनत्व तथा ताप के पारस्परिक संबंध का ज्ञात होना आवश्यक है।
सीधे और आसान शब्दो मे यदि मैं कोई भी विमान का मॉडल बनाकर दे दु की ये उड़ेगा तो सबसे पहले उसे वायुगतिकी (Aerodynamics) के नियमो पर खरा उतरना होगा यदि ऐसा नही होता है तो वो सिर्फ एक मॉडल ही रहेगा वो कभी उड़ान नही भर सकेगा ।
अब आते है भरद्वाज कृत विमान के मॉडल पर जिसे तलपड़े जी ने बनाकर उड़ाया था और भरद्वाज कृत विमान शास्त्र में लिखित मॉडल का स्वरूप है -
2017 में काव्या वड़ाडी नामक एयरक्रॉफ्ट डिजाइनर ने 3d प्रिन्टर की मदद से मरुत्सखा की एक नकल बनाई जिसको तलपड़े जी ने बनाया था उन्होंने वो डिजिटल फ़ाइल (3d मॉडल) एयरो स्पेस सिस्टम इंजीनियर ट्रेविस स्टेलर को भेजी की वो इसकी जांच कर सके कि जो विमान शास्त्र में उल्लेखित विमान के मॉडल का उन्होंने 3d मॉडल तैयार किया है क्या वो वायुगतिकी (Aerodynamics) के नियमो पर खरा है या ये सिर्फ कपोल कल्पना ही है जिसे कुछ लोगो ने अपने मन के बहलावे के लिए गढ़ लिया है ।
और जब ट्रेविस स्टेलर ने उस 3d मॉडल को Aerodynamics tunnel में उसकी जांच की तो वो खुद हैरान थे क्योंकि ये मॉडल वायुगतिकी (Aerodynamics) के सभी परीक्षण पर सिर्फ खरा ही नही था बल्कि अब तक के बनाये हुए किसी भी आधुनिक विमान की अपेक्षा कही बेहतर था ।
आज के कुछ समय पहले तक जब तक 3d प्रिंटिंग चलन में नही था तबतक ये बाते कपोल कल्पित जरूर लगती थी लेकिन आज के समय मे जैसे जैसे विज्ञान उन्नति कर रहा है भारतीय संस्कृति के प्रचीन विज्ञान के ऊपर छाया धुंध भी खत्म होता जा रहा है ।।
#विशेष -
भारतीय विमान की उपलब्धि प्राचीन संस्कृत भाषा में सैंकडों की संख्या प्राप्त है, किन्तु खेद का विषय है कि उन्हें अभी तक किसी आधुनिक भाषा में अनुवादित ही नहीं किया गया। प्राचीन भारतीयों ने जिन विमानों का अविष्कार किया था, उन्होंने विमानों की संचलन प्रणाली तथा उन की देख भाल सम्बन्धी निर्देश भी संकलित किये थे, जो आज भी उपलब्ध हैं और उन में से कुछ का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया जा चुका है।
इस धरती ने कई बार विनाश देखा है, प्रचंड विनाश ! आखिरी बार इसने, आज से पांच हज़ार साल पहले, महाभारत काल में देखा था । उस समय, उस महायुद्ध को एकदम से आसन्न देख कर, अर्जुन ने कृष्ण से प्रश्न किया था कि “हे केशव अगर ये युद्ध हुआ तो सारा ज्ञान-विज्ञान, सब कुछ नष्ट हो जाएगा,.फिर क्या होगा ?”
अर्जुन की ये चिंता एकदम उचित थी क्योकि उस समय टेक्नोलॉजी काफी उन्नत (Advanced) अवस्था में थी ।
फिर भी महाभारत युद्ध की वजह से प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की अभूतपूर्व क्षति हुई और रही सही कसर पूरी कर दी मध्य काल के अति बर्बर और जाहिल आतताइयों और आक्रमणकारियों ने । इन रक्त-पिपासु पिशाचों ने यहाँ के विश्वविद्यालयों में तथा आचार्यों के पास पीढ़ी-दर-पीढ़ी संभाल कर रखे गए अमूल्य ज्ञान की निधियों को अग्नि में भस्मिसात कर दिया ।
#पिक - भारद्वाज कृत विमान शास्त्र के आधार पर तलपड़े जी का बनाया मॉडल मरुत्सखा जिसका परीक्षण काव्या वड़ाडी द्वारा किया गया है ।।

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