CHANAKYA PART 2

••••••••••#गुरु_शिरोमणि #आचार्य_चाणक्य ••••••••••
                           #द्वितीय_भाग
चाणक्य  (Chanakya) एक महान राजनेतिज्ञ सलाहकार थे । ऐसा कहा जाता हैं कि भगवान श्री कृष्ण ने गीता में राजनीति के लिए जो भी कहा वास्तव में उस नीति पर चाणक्य ने अमल किया जिसे हम चाणक्य नीति के नाम से सुनते एवम पढ़ते हैं । आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य अपने गुणों से पंडित, राजनीति विशारद्,आचार-विचार के मर्मज्ञ, कूटनीति में सिद्धहस्त एवं एक कठोर गुरु के रूप में विख्यात हैं और राजनीतिकारों व कूटनीतिकों के आदर्श हैं। जिन्होंने एक साधारण से व्यक्ति को असाधारण बना दिया क्योंकि यदि आचार्य चाणक्य जैसा शिक्षक ऐसा होता है जिसकी गोद मे विनाश और निर्माण दोनो पलते है ।।

#कल_की_पोस्ट_से_आगे बढ़ने से पहले एक आवश्यक चीज़ सपष्ट करनी जरूरी है कि
आचार्य चाणक्य घनानंद के यहाँ किस लिए गए थे --

सिकंदर, जिसका पूरा नाम मॅसेडोनिया का अलेक्ज़ेंडर तृतीय (Alexander III of Macedon) था, वह एक विशाल साम्राज्य ग्रीस, फारस, मिस्र, और भारत के संक्षिप्त भागों का विजेता था । सिकंदर मॅसेडोनिया के राजा फ़िलिप II ( King Philip II) का पुत्र और अरस्तू का शिष्य था। उसने 326 ईसा पूर्व के वसंत में केवल 30,000 पैदल सैनिकों और घुड़सवार सेना के साथ पंजाब को जीतने के लिए, अटक सिंधु पार करके उसने अपनी मकदूनियाई सेना का नेतृत्व किया। सिकंदर की महत्वाकांक्षा संपूर्ण भारत को जीतने की थी, भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के समय चाणक्य (विष्णुगुप्त अथवा कौटिल्य) तक्षशिला में प्राध्यापक थे। तक्षशिला और गान्धार के राजा आम्भि ने सर्वप्रथम सिकंदर का सामना किया परंतु उसने सिकन्दर से समझौता कर लिया। चाणक्य ने भारत की संस्कृति को विदेशियों से बचाने के लिए सभी राजाओं से आग्रह किया किन्तु सिकन्दर से लड़ने कोई नहीं आया। आचार्य चाणक्य घनानंद से मदद मांगने आये ताकि पुरु और सिकंदर के युद्ध मे पुरु की मदद कर सकें और सिंकंदर को वही रोका जा सके , पुरु और सिकन्दर में सिकन्दर की सेना की संख्या अधिक थी लेकिन पुरु को प्राकृतिक (सामरिक) लाभ झेलम नदी का मिल रहा था लेकिन इस युद्ध मे आम्भी के सिकंदर से मिल जाने से पुरु कमजोर पड़ जाता है  ।। नतीजा आपको पता है हम उसकी बात नही करते है .....चाणक्य को मदद तो नही मिलती लेकिन अपमान जरूर मिलता है और चाणक्य वचन लेते है की अखण्ड भारत का निर्माण और नंदवंश का विनाश।।

 चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को साथ लेकर एक नये साम्राज्य की स्थापना की और सिकन्दर द्वारा जीते गए राज्य पंजाब और उसके राजदूत सेल्यूकस को भी हराया।

#चंद्रगुप्त_कौन --

विज्ञात पिता के विख्यात पुत्र चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म लगभग 345 ईसा पूर्व उत्तरविहारट्टकथायं के अनुसार वैशाख,कृष्णपक्ष अष्टमी को हुआ था। प्राचीन पालि साहित्य ग्रन्थों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य के पूर्वज हिमालय की तराई में स्थित पिप्पलियवन के मोरिय गणराज्य में भगवान बुद्ध के समय शासन करते थे।भारत की सबसे प्राचीन भाषा पालि की इन गाथाओ में चन्द्रगुप्त मौर्य का परिचय इस प्रकार है।

आदिच्चा नाम गोतेन, सकिया नाम जातिया।
मोरियान खतियानं वसंजातं सिरिधरं।
चन्दगुप्तो ति पञ्ञातं,विण्हुगुप्तोति भतुकाततो।।
(उत्तरविहारट्टकथायं-थेरमहिंद)

#अर्थात --
 आदित्य-गोत्र, शाक्य-जाति,मौर्यवशं के क्षत्रियों में प्रज्ञा सम्पन्न श्रीमान चन्द्रगुप्त राजा हुए और उनके भाई विष्णुगुप्त।

आधुनिक खोजो से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के पिता राजा चन्द्रवर्द्धन (340 ई0पू0) 34 वर्ष की अवस्था में मगध के विस्तारवादी सीमा सम्बन्धी युद्ध करते हुए मारे गये थे । इस घटना के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य की माँ धम्ममोरिया देवी, अपने पुत्र के साथ पाटलिपुत्र (पुष्पपुर) आ गयी और अपने राजवंश को गुप्त रखने के लिए संभवतः मयुर पालको के रूप में अज्ञातवास का जीवन व्यतीत करने लगी । यही चन्द्रगुप्त का शैसो काल मयूर पालको,शिकारीयों तथा ग्वालों के मध्य व्यतीत हुआ। इस प्रकार राजा चन्द्र व रानी मोरिया देवी के पुत्र को गुप्त रखने से उनका नाम चन्द्रगुप्त मौर्य ही पड़ गया। यही कारण है कि कुछ इतिहासकारों को भ्रमवश लगता है कि चन्द्रगुप्त निम्न कुल के है।
अन्य श्रोत जिससे सिद्ध होता है कि चंद्रगुप्त क्षत्रिय था --

#बौद्ध_ग्रंथों --
 ‘दीपवंश’ मौर्य काल के इतिहास की जानकारी देता है। ‘महावंश’ भी मौर्यकालीन इतिहास को बतलाता है। ‘महाबोधिवंश’ मौर्य काल का ही इतिहास माना जाता है।
और तीनों में चंद्रगुप्त को शाक्यवंशी क्षत्रिय कहा गया है ।

महापरिनिब्बान सुत्त के अनुसार मौर्य वंश पिप्पलिवंन के गणराज्य में शासन करता था। महापरिनिब्बानसुत्त के अनुसार मौयों ने गौतम बुद्ध के निधन पर भल्लो के पास (जिनके नगर में बुद्ध का देहावसान हुआ था) यह सन्देश भेजा कि- बुद्ध जी क्षत्रिय थे, हम भी क्षत्रिय हैं। अतएव हमें भी उनकी अस्थि-अवशेष का एक अंश मिलना चाहिए। क अन्य बौद्ध ग्रन्थ दिव्यावदान में मौयों को क्षत्रिय कहा गया है। इस ग्रन्थ में एक स्थल पर अशोक अपनी पत्नी तिष्यरक्षिता से कहता है, हो देवि मैं क्षत्रिय हूँ। मैं प्याज कैसे खा सकता हूँ देवि अह क्षत्रिय : कथन लाण्डुम महयामि। महाबोधिवश में चन्द्रगुप्त को नरिन्दकुल सम्भव (राजवंश में जन्मा) कहा गया है। इस राजवंश का सम्बंध मोरिय नगर से बताया जाता है जिसे शाम्य वंशजों ने बसाया था। महावंश की टीका तथा कुछ अन्य उत्तरकालीन बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार मौर्य लोग शाक्यों की शाखा थे।

#जैन_ग्रंथो --

भद्रबाहु चरित्र’  प्रसिद्ध जैन ग्रन्थ है जिसमें जैनाचार्य भद्रबाहु के साथ-साथ चन्द्रगुप्त मौर्य के संबंध  में भी उल्लेख मिलता है। इन ग्रन्थों के अतिरिक्त कथा-कोष, पुण्याश्रव-कथाकोष, त्रिलोक प्रज्ञस्ति, आवश्यक सूत्र, कालिका पुराण, कल्प सूत्र, उत्तराध्ययन सूत्र , दीपवंश, महावंश, मिलन्दिपन्हो,  दिव्यावदान आदि ग्रन्थ की इन दोनों धर्मों तथा मौर्य साम्राज्य के संबंध में यत्र-तत्र उल्लेख करते हैं। और हर जगह चंद्रगुप्त को उच्चकुलीन क्षत्रिय योद्धा कहा गया है ।।

#हिन्दू_धर्म_ग्रंथो_में --

विष्णु पुराण में चाणक्य के अलावा एक क्षत्रिय योद्धा का वर्णन मिलता है जो नंद वंश का संहारक होगा --

येनशस्त्रम च शास्त्रम च, नंद राजगता च भू:
.................. शास्त्रमिदम कृतं।।

नावनन्दा भविष्यन्ति चाणकनास्तान हनिष्यति ।।
अर्थात --
भविष्य में चाणक्य होगा तो नव नंदो के वंश का नाश करेगा और इसके ऊपर के श्लोक में उच्चकुलीन योद्धा कहा गया है ।।

स्कन्दपुराण में भी नंदकुल के उच्छेदनकरता आदित्यकुल योद्धा का उल्लेख है ।।

पाणिनी का ‘अष्टाध्यायी’ एक व्याकरण ग्रन्थ होते हुए भी मौर्य पूर्व तथा मौर्यकालीन राजनीतिक अवस्था पर प्रकाश डालता है इसमे भी चंद्रगुप्त को आदित्य गोत्र का कहा गया है । इसी तरह पातंजलि का ‘महाभाष्य’ भी राजनीति के संबंध में चर्चा करता है। ‘शुक्रनीतिसार’ भी एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रन्थ है जिसमें तत्कालीन भारतीय समाज का वर्णन मिलता है। ज्योतिष ग्रन्थ गार्गी संहिता पुराण का एक भाग है जिसमें यवनों के आक्रमण का उल्लेख किया गया है।

मध्यकालीन शिलालेखों के अनुसार मौर्यवंश सूर्यवंशियों में सम्बन्धित था। सूर्यवंश के एक राजकुमार मान्धाृत से मौर्यवंश का उद्भव हुआ था ।।

#निष्कर्ष --

 नन्दों को शूद्रवंशीय और मौयों को अभिजात क्षत्रिय वंशीय कहा गया है। एरियन ने भी इस प्रसंग में कहा है कि पाटलिपुत्र में मोर पक्षी रखे जाते थे। कर्टियस, डियोडोरस तथा प्लुटार्क आदि यूनानी लेखकों ने भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त किए हैं। केवल जस्टिन ने यह बतलाया है कि चन्द्रगुप्त साधारण कुल में उत्पन्न हुआ था। ब्राह्य ग्रन्थों में भी मोरिय नामक एक गण का उल्लेख है। राजपूतान गजेरियट में मौयों को राजपूत कहा गया है। कर्नल टाड ने भी इस कथन का समर्थन किया है। अभिलेखीय साक्ष्य भी मौयों को क्षत्रिय मानते हैं। अंत में डॉ. हेमचन्द्र राय चौधरी के शब्दों में कह सकते हैं, मध्यकालीन अभिलेखों में अनुश्रुति, मौर्यवंश को जिसमें वह जन्मा था को सूर्यवंशीय क्षत्रिय कहा गया है। इस प्रकार साहित्यिक, वेदेशिक एवं अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मौर्य वंश के शासक क्षत्रिय थे।

#चंद्रगुप्त_परिचय_के_बाद अब पुनः विषय पे आते है  --

 शकटार और चाणक्य के बीच धनानंद के शासन को उखाड़ फेंकने पर विचार-मंत्रणा हुई। तब चाणक्य ने कहा कि हमें मगध के भावी शासक की खोज करना होगी। बड़े ही विचार और विमर्श करने के बाद शकटार ने बताया कि एक युवक है, जो धनानंद के अत्याचारों से त्रस्त है। उसका नाम है- चंद्रगुप्त...।

चाणक्य चंद्रगुप्त की माँ मूरा से चंद्रगुप्त को सम्राट बनाने का वचन देकर ले आते है  और चंद्रगुप्त का शिक्षण प्रारंभ करते है , शिक्षण पूर्ण होने पे चंद्रगुप्त जहाँ आदिवासी और ग्रामीणों को घनानंद के कष्ट से मुक्ति के लिए जोड़ने के लिए भेज देते है वही आचार्य चाणक्य शहरी क्षेत्रों के लोगो को इस लड़ाई में सम्मिलित करने का काम करते है ।।

और सभी को एक सूत्र में बांध कर चाणक्य घनानंद को पदच्युत करते है  और मगध के राजा के रूप में चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक होता है ।।आचार्य चाणक्य की सीख से चंद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य वंश को एक नया रूप दिया, इस वंश को दुनिया के शक्तिशाली वंश के रूप में प्रकट किया और खुद को एक महान राजा की छवि प्रदान की।।

#विशेष --
कौटिल्य राजतंत्र के समर्थक थे। उनका कहना था कि प्रजा के सुख में राजा का सुख होना चाहिए और प्रजा के हित में ही राजा का हित निहित होना चाहिए। इसके लिए उसे बाल्यकाल से ही शिक्षित किया जाना चाहिए। एक अच्छे शासक बनने की प्रक्रिया मुंडन संस्कार से शुरू हो जानी चाहिए। सर्व प्रथम वर्णमाला तथा अंकमाल का अभ्यास कराना चाहिए और उपनयन के बाद नई आंविक्षिकी वार्ता और दंडनीति का ज्ञान कराया जाना चाहिए। कौटिल्य ने अपनी इसी निती से चंद्र गुप्त मौर्य को बाल्यकाल से ही एक श्रेष्ठ शासक के रुप में शिक्षित किया।चाणक्य की शिक्षा से परांगत होकर चंद्रगुप्त ने सिकंदर को पराजित ही नही किया बल्की अपने कार्यकौशल तथा बौद्धिक कौशल से एक श्रेष्ठ शासक के रूप में इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।

कल और आज की परिचय पोस्ट के बाद कल चंद्रगुप्त आचार्य चाणक्य के विषय मे तुलनात्मक पोस्ट होगी इंडिका व अन्य ग्रंथो से .…....


#क्रमशः ...

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