BRAHMIN RAJVANSH PART 6

------------- #ब्राम्हण_राजवंश - #भाग - 05 --------------
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                             #शुंग_राजवंश

#राजवंश_समयकाल - 185ई.पू.-75 ई.पू. (112 वर्ष )

#संस्थापक -  #पुष्यमित्र_शुंग ( भारद्वाज और कश्यप द्वैयमुष्यायन गोत्र )

----------------- #महाराज_भद्रक_शुंग -----------------
                   (124–122  ईसा पूर्व.)   
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कहते है कि दम्भ जब किसी को हो जाता है तो वो पतन की ओर अग्रसर होता है ,और यही हुआ शुंग सम्राट वशुमित्र के साथ , जब शक्ति आती है तो शक्ति के साथ मद और मद के साथ बुराइयां भी आती है , वशुमित्र जिसपर भी आक्रमण करते वो या तो शरणागत होकर आधीन हो जाता या हारकर अपना विनाश करवा लेता , इस मद में की वो ही सर्वशक्तिमान है वशुमित्र ने भी गलती की , उन्होंने आमोद-प्रमोद का चयन किया और जब एक योद्धा राजा विलासित जीवन जीने लगता है तो उक्त अंत निश्चित होता है । उसके इस कृत्य से फलस्वरूप शुंग साम्राज्य छिन्न भिन्न होने लगा ।

वशुमित्र को संगीत और नृत्य का बड़ा शौक था , एक दिन कौशल नरेश मूलदेव उनको अपने यहाँ नृत्य देखने के लिए आमंत्रित करता है , और जब वो नृत्य देखने मे मग्न थे तभी धोखे से मूलदेव उनकी हत्या कर देता है , पिछली पोस्ट में मैंने बताया था कि शुंग एक सुगठित शासन प्रणाली रखते थे और एक क्रमिक शासन था एक राजा और एक उपराजा (गोप्ता) और प्रमुख राज्यों के अधिपति जिन्हें हम गवर्नर कह सकते है , कौशल प्रदेश , पांचाल , मथुरा ,कौशाम्बी उनके ही प्रमुख राज्य थे , वशुमित्र की हत्या हो जाने के बाद इन राज्यों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया , महाराज वशुमित्र की हत्या की सूचना मिलते है , उपराजा आंध्रक जिन्हें भद्रक और कही कही ओद्रक कहा गया , राजमहल पहुँचते है तो उन्हें पूरी वस्तुस्थिति समझ मे आती है । वशुमित्र के बाद उनके पुत्र राजकुमार आंध्रक शुंग वंश के सम्राट बनते है ।।

"तत साकेतमाक्रम्य पंचालं मथुरांस्तथा ।
सवना: दुष्टविक्रान्ता: प्राप्स्यन्ति कुसुमध्वजम् ।।
तत: पुष्पपुरे प्राप्ते कर्दमे प्रथिते हिते।
आकुला विषया सर्वे भविष्यन्ति न संशय: ।।
मध्यदेशे न स्थास्यन्ति यवना युद्धदुर्मदा: ।
तेष: अन्योन्य सम्भावा भविष्यन्टि न संशय:।
आत्मचक्रोत्थितं घोरं युद्धं परमदारुणम् ।।
(युगपुराण - कर्न का वृहत्संहिता संस्करण, पृ0 37-38)

#प्रमुख_लड़ाइयां -
शुंग साम्राज्य दक्षिण में नर्मदा तक फैल गया। पाटलिपुत्र, अयोध्या तथा विदिशा इस बड़े राज्य के केंद्र नगर थे। विदिशा में उपराजा को प्रशासक नियुक्त किया जाता था । मथुरा का भी शासन कुछ समय तक विदिशा केन्द्र द्वारा ही संचालित होता रहा। दिव्यावदान तथा बौद्ध लेखक तारानाथ के अनुसार जालंधर और शाकल भी शुंग साम्राज्य के अन्तर्गत थे ,महाराज वशुमित्र ही थे जिन्होंने शको को रोके रखा , नाटक देखने के दौरान उनकी हत्या कर दी गई और सत्ता भद्रक AKA आन्ध्रक के हाथों में गयी जो वशुज्येष्ठ के पुत्र थे । शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाली स्किथी लोगों की एक जनजाति या जनजातियों का समूह था, जो सीर नदी की घाटी में रहता था। 'युइशि' लोग तिब्बत के उत्तर-पश्चिम में तकला-मकान की मरुभूमि के सीमांत पर निवास करते थे। युइशि लोगों पर जब चीन के हूणों ने आक्रमण किया तो उनको अपना स्थान छोड़कर जाना पड़ा। उन्होंने शकों पर आक्रमण कर उनका स्थान हड़प लिया तब शकों को अपना स्थान छोड़कर जाना पड़ा। हूणों ने युइशियों को धकेला और युइशियों ने शकों को। शकों ने बाद में बैक्ट्रिया पर विजय प्राप्त कर हिन्दूकुश के मार्ग से भारत में प्रवेश किया। बैक्ट्रिया के यवन राज्य का अंत शक जाति के आक्रमण द्वारा ही हुआ था। शकों ने फिर पार्थिया के साम्राज्य पर आक्रमण किया। पारसी राजा मिथिदातस द्वितीय (123-88 ईपू) ने शकों के आक्रमणों से अपने राज्य की रक्षा की। मिथिदातस की शक्ति से विवश शकों ने वहां से ध्यान हटाकर भारत की ओर लगा दिया। जब शकों को ये सूचना मिली कि शुंग साम्राज्य के राजा की हत्या हो चली है ,और शुंग साम्राज्य के लगभग सभी सशक्त राज्यों ने विद्रोह कर दिया है तो शकों ने भी इसका लाभ उठाने की सोची ,और भारत पर आक्रमण किया जिसे सही समय पर सम्राट आंध्रक ने रोक लिया ,और उनका तीव्र प्रतिरोध करके उन्हें भागने पर विवश किया , जो भी राज्य खुद को स्वतंत्र घोषित कर चुके थे उनका मजबूती से दमन किया पिता के हत्यारे कौशल नरेश को हराकर उसको मृत्युदंड दिया ।
उधर दूसरी ओर शकों ने ईरान के एक पूर्वी प्रदेश पर अधिकार करके अपनी बस्ती बसाई और उसका नाम शकस्थान रखा जो आगे चलकर सीस्तान कहलाया।।

#विशेष -
शुंग कला के निर्मित भवनों के स्तम्भ, वेदिका तथा तोरण उत्कीर्णन के आधार थे जिन पर नाना प्रकार की आकृतियों के अंकन मिलते हैं। समस्त कलाकृतियों में वस्त्रों का भारीपन, अलंकरण की बहुलता तथा अंगों की स्थिरता के बावजूद शारीरिक सुंदरता का उच्च प्रतिमान बरकरार रहा। इन रचनाओं की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि कला में सजीवता लाने के लिए कथानक का प्रदर्शन किया गया तथा कहानी के प्रसंग में मुख्य पात्र को शिला के सीमित क्षेत्र में अनेक बार प्रस्तुत किया गया ताकि उस कथानक का प्रवाह बना रहे। काल की अभिव्यक्ति के उद्देश्य से दो घटनाओं के मध्य संबंध को दर्शाने के लिए अक्सर मुख्य पात्र को दो या तीन बार अंकित किया। इस प्रकार काल तथा स्थान का विभेद एक ही प्रदर्शन में स्पष्ट हो जाता है। अगर देखा जाए तो विभिन्न आकृतियों में संयोजन की परंपरा की यह एक तरह से शुरूआत मानी जा सकती है। कालक्रम के अनुसार पूना के समीप भाजा की गुफाओं के उत्कीर्णन को सबसे प्राचीन समझा जाता है। चैत्य के स्तम्भ सादे हैं पर विहार से संबंधित उत्कीर्णन के नमूने यहां मिलते हैं। एक जगह सूर्य रथ दर्शाया गया है, इस णत का एक पहिया आैर चार घोड़े दिख रहे हैं, रथ के नीचे अंधकार रूपी विशालकाय राक्षसी दिखाई देती है। दूसरा एक संयोजन है जिसमें हाथी पर सवार इंद्र का निरूपण है, हाथी ने अपनी सूंढ़ से उखाड़े गए एक वृक्ष को लपेट रखा है। यहीं पर छोटे कद के मनुष्याकृतियां हैं। इन संयोजनों में आकृतियों के अनुपातिकता का ध्यान नहीं रखा गया है, रथ, राक्षसी, हाथी, इंद्र व वृक्ष के अंकन में कलाकार द्वारा अनुपात की अनभिज्ञता का दृष्टिगत होना कला की दृष्टि से दोषपूर्ण है। भाजा के बौद्ध विहार में ब्रााह्मण- मूर्तियों का भी अंकन है, वैसे तो इस प्रकार के उत्कीर्णन के निश्चित प्रयोजन कोे समझना थोड़ा कठिन है किन्तु एक आशय यह ता बनता ही है कि इन अलग अलग धार्मिक विचारों को लेकर कोई कट्टरता समाज में विद्यमान नहीं थी।

#क्रमशः

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