PART 16

PART 16

---------------------- #जीवन_विज्ञान -----------------------

---------- #यज्ञोपवीत_या_उपनयन_संस्कार ----------

यज्ञोपवीत (संस्कृत संधि विच्छेद= यज्ञ+उपवीत) उप यानी पास और नयन यानी ले जाना, गुरू के पास ले जाने का अर्थ है-उपनयन संस्कार, इसमें बालक को जनेऊ पहना जाता है। सूत से बना वह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है, हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है।

#जनेऊ_को_उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र के नाम से भी जाना जाता है ।।

हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों (आप सभी को 16 संस्कार पता होंगे लेकिन वो प्रधान संस्कार है 8 उप संस्कार है जिनके विषय मे आगे आपको जानकारी दूँगा ) में से एक ‘उपनयन संस्कार’ के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे ‘यज्ञोपवीतधारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। उपनयन का शाब्दिक अर्थ है "सन्निकट ले जाना" और उपनयन संस्कार का अर्थ है --
"ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना"

 ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।

#जनेऊ_में_तीन_सूत्र –  त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक – देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक – सत्व, रज और तम के प्रतीक होते है। साथ ही ये तीन सूत्र गायत्री मंत्र के तीन चरणों के प्रतीक है तो तीन आश्रमों के प्रतीक भी। जनेऊ के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। अत: कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। इनमे एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। इनका मतलब है – हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने। जनेऊ में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। ये पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों के भी प्रतीक है।

#जनेऊ_में_नियम_है_कि -
मल-मूत्र विसर्जन के दौरान जनेऊ को दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका मूल भाव यह है कि जनेऊ कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। यह बेहद जरूरी होता है।

मतलब साफ है कि जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति ये ध्यान रखता है कि मलमूत्र करने के बाद खुद को साफ करना है इससे उसको इंफेक्शन का खतरा कम से कम हो जाता है

#वो_लाभ_जो_अप्रत्यक्ष_है जिसे कम लोग जानते है -

शरीर में कुल 365 एनर्जी पॉइंट होते हैं। अलग-अलग बीमारी में अलग-अलग पॉइंट असर करते हैं। कुछ पॉइंट कॉमन भी होते हैं। एक्युप्रेशर में हर पॉइंट को दो-तीन मिनट दबाना होता है। और जनेऊ से हम यही काम करते है उस point को हम एक्युप्रेश करते है ।।
 कैसे आइये समझते है

#कान_के_नीचे_वाले_हिस्से (इयर लोब) की रोजाना पांच मिनट मसाज करने से याददाश्त बेहतर होती है। यह टिप पढ़नेवाले बच्चों के लिए बहुत उपयोगी है।अगर भूख कम करनी है तो खाने से आधा घंटा पहले कान के बाहर छोटेवाले हिस्से (ट्राइगस) को दो मिनट उंगली से दबाएं। भूख कम लगेगी। यहीं पर प्यास का भी पॉइंट होता है। निर्जला व्रत में लोग इसे दबाएं तो प्यास कम लगेगी।

एक्युप्रेशर की शब्दवली में इसे  point जीवी 20 या डीयू 20 -
इसका लाभ आप देखे  -

#जीबी 20 -
कहां : कान के पीछे के झुकाव में।
उपयोग: डिप्रेशन, सिरदर्द, चक्कर और सेंस ऑर्गन यानी नाक, कान और आंख से जुड़ी बीमारियों में राहत। दिमागी असंतुलन, लकवा, और यूटरस की बीमारियों में असरदार।

इसके अलावा इसके कुछ अन्य लाभ जो क्लीनिकली सत्यापित  है -

1. #बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से ऐसे स्वप्न नहीं आते।
2. #जनेऊ_के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।
3. #जनेऊ_पहनने वाला व्यक्ति सफाई नियमों में बंधा होता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है।
4. #जनेऊ_को_दायें कान पर धारण करने से कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है।
5. #दाएं_कान_की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।
6. #कान_में_जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।
7. #कान_पर_जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।

---------------------  #वेदारम्भ_संस्कार --------------------

इसके अंतर्गत व्यक्ति को वेदों का ज्ञान दिया जाता है, हालांकि, आज के परिदृश्य में यह लगभग खत्म हो गया है पर कुछ परिवारों ने इस परंपरा की जीवित रखा हुआ है, बालक को स्कूल में वेदों की जानकारी नहीं हो पाती है, तो यह परिवार का दायित्व है कि वह उसे अपने धर्म, संस्कृति, वेदों की जानकारी दे। प्रचीन काल में वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे, साथ ही उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे।

ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत कापालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं।

वैदिक परंपरा और अपनी वैदिक मातृ भाषा को हम भुला बैठे जिसके परिणामस्वरूप आज की स्थिति ये है कि हम सिर्फ बौद्धिक गुलाम बन के रह गए चलिए इसको देखते है कैसे -

#आंकड़े -

#अविष्कार  (Invention) के मामले में विश्व के 128 देशों में भारत का स्थान 66वा है ।
2015 में दाखिल पेटेंट --
चीन  - मातृभाषा चायनीज राष्ट्रभाषा चायनीज  
पेटेंट - 1101864
जापान -  मातृभाषा जापानी , राष्ट्रभाषा जापानी
पेटेंट - 318721
दक्षिण कोरिया  - मातृ भाषा कोरियन राष्ट्रभाषा कोरियन पेटेंट - 213694
जर्मनी - मातृभाषा - जर्मन  राष्ट्रभाषा - जर्मन  -
पेटेंट - 66893
भारत -  मातृ भाषा हिंदी  शिक्षा की भाषा  अंग्रेजी -
पेटेंट - 45858
#स्रोत  -- अंतर्राष्ट्रीय शोध सूचकांक 2016

#शिक्षा - वर्तमान में भारत में 700 से ज्यादा विश्वविद्यालय है लेकिन विश्व के शीर्ष 100 में आज एक भी नहीं है।
आई आई एस सी बंगलौर  विश्व में स्थान - 152
भारतीय प्रौधौगिकी संस्थान नई दिल्ली - 185
भारतीय प्रौधौगिकी संस्थान मुम्बई - 219
भारतीय प्रौधौगिकी संस्थान - 249
#स्रोत -- विश्वविद्यालय सूचकांक

अपनी मातृ भाषा को राष्ट्र भाषा बनाने वाले ये  देश आज शीर्ष पर है   ये विज्ञान एवं  तकनीकी या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है । अब आप लोग स्वयं आंकलन कीजिये क्या विज्ञान और तकनीकी के लिए मातृ भाषा जरूरी है या अन्य भाषा ?

विलियम एडम के द्वारा किया गया सर्वेक्षण यह स्पष्ठ करता है की सन् 1830 -1840 के वर्षो में बंगाल बिहार के गाँवो में लगभग एक लाख गुरुकुल थे । मद्रास प्रेसिडेंसी के लिए टोमस मुनरो ने बताया की यहाँ प्रत्येक गावँ में एक गुरुकुल था ।इसी प्रकार बॉम्बे  प्रेसीडेन्सी  के जी एल . एनटरगाट नामक वरिष्ठ अधिकारी ने लिखा है छोटे बड़े सभी गाँवो में कम से कम एक गुरुकुल था बड़े गावँ में तो एक से अधिक गुरुकुल थे । श्री धर्मपाल  जी ने 18 वी शताब्दी में इस भारतीय शिक्षा को रमणीय वृक्ष कहा था । इसीको गांधी जी ने इंग्लैंड में जाकर अंग्रेजो को चुनौती दी थी की आप ने हमारे इस रमणीय वृक्ष की जड़े काट दी और हमारे शिक्षा के स्वरुप को बिगाड़ दिया । मैकाले ने 1835 में जो लिखा था हमे एक ऐसा वर्ग तैयार करना है जिसका रक्त रूप  रंग देखने में भारतीय हो परंतु उनकी अक्ल आचरण व्यवहार और शैली अंग्रेजियत में रंगी हो ।  आज मैकाले का सपना वर्तमान बन कर हमारे आँखों के सामने घटित हो रहा है परंतु आधुनिकता अंग्रेजियत की   काली पट्टी जो हमारे आँखों पर ऐसी बंधी है जिससे दूर दूर तक भारतीयता नजर ही नहीं आती । मैकाले ने ऐसा  हीनता का भाव भरा जिसमे हम अपने महापुरुषो ,ज्ञानवेक्ताओ और ऋषियो वैज्ञानिकों  की खोज को भूल गए ।

हम न्यूटन को तो जानते है परंतु आर्यभट्ट को भूल गए । हम नहीं जानना चाहते की कोपरनिकस से बहुत पहले हमारे देश में सूर्य के केंद्र की व्यवस्था को हमने जान लिया था । बौधायन को कॉपी पेस्ट करने वाले पाइथागोरस को हम पूजने लगे । शल्य चिकित्सा के जनक महर्षि सुश्रुत अणु के अविष्कारक महर्षि कणाद के गौरवशाली इतिहास हमको नहीं पढ़ाया गया कारण मात्र केवल एक भारतीय युवा मानशिक गुलामी में डूबे रहे और जो प्राचीन है उसको हीन माने और जो अंग्रेजियत है उसे  आधुनिक समझे ।

#विशेष - 'संस्कार' शब्द का अधिक उपयुक्त पर्याय अंग्रेजी का 'सेक्रामेंट' शब्द हो सकता है। संस्कार का सामान्य अर्थ है-किसी को संस्कृत करना या शुद्ध करके उपयुक्त बनाना। किसी साधारण या विकृत वस्तु को विशेष क्रियाओं द्वारा उत्तम बना देना ही उसका संस्कार है। इसी तरह किसी साधारण मनुष्य को विशेष प्रकार की धार्मिक क्रिया-प्रक्रियाओं द्वारा श्रेष्ठ बनाना ही सुसंस्कृत करना कहा जाता है। मन, वचन, कर्म और शरीर को पवित्र करना ही संस्कार है। हमारी सारी प्रवृतियों और चित्तवृत्तियों का संप्रेरक हमारे मन में पलने वाला संस्कार होता है। संस्कार से ही हमारा सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन पुष्ट होता है और हम सभ्य कहलाते हैं। व्यक्तित्व निर्माण में हिन्दू संस्कारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संस्कार विरुद्ध आचरण असभ्यता की निशानी है। 'संस्कार' मनुष्य को पाप और अज्ञान से दूर रखकर आचार-विचार और ज्ञान-विज्ञान से संयुक्त करते हैं।

#नोट - आंकड़े नेट से साभार लिए गए है ।

    ।। #धर्म_संस्थापनार्थाय_संभवामि_युगे_युगे ।।

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