PART 14
PART 14
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----------------------- #जीवन_विज्ञान -----------------------
#16_संस्कारो_का_विज्ञान - #भाग - 04
भारतीय संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है। प्राचीन काल में तो प्रत्येक कार्य का आरंभ संस्कार से ही होता था, किंतु वर्तमान में मनुष्य के पास न समय है न विश्वास। इसलिए आवश्यक प्रमुख कार्यों में ही संस्कार किये जाते हैं। यही कारण है कि संस्कारों की संख्या चालीस से घटकर सोलह रह गई है।
संस्कार व्युत्पत्तिपरक अर्थ- सम् पूर्वक कृञ् धातु से घञ् प्रत्यय होकर संस्कार शब्द निष्पन्न होता है। जिसका अर्थ है-
संस्करणं सम्यक्करणं वा संस्कारः अर्थात् परिष्कार करना अथवा भली प्रकार निर्माण करना ’ संस्कार’ है।
‘संस्कार- प्रकाश’ में संस्कार शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा गया है-
समुपसर्गात् कृञो घञि निष्पन्नोऽयं संस्कार
शब्दः स्वयमेव स्वलक्षणमप्यभिधत्ते ।।
तद्यथा- आत्मशरीरान्यतरनिष्ठो हीनाङ्गपूरको दोषापमार्जनकरोऽतिशयाधायकश्च विहितक्रियाजन्योऽतिशयविशेष एव ‘संस्कार’ इत्युच्यते।
#अर्थात् -
सम् उपसर्गपूर्वक कृ धातु से घञ् प्रत्यय होकर निष्पन्न ‘संस्कार’ शब्द स्वयमेव अपना लक्षण भी प्रकट कर देता है। यथा- शरीर और आत्मा में कमी या त्रुटि को पूर्ण करते हुए, दोषों का परिमार्जन करते हुए, अतिशय गुणों का आधान करने वाले शास्त्र विहित विधि (कर्मकाण्ड)से समुद्भूत अतिशय विशेष को ही ‘संस्कार’ कहा जाता है।
ऐसे तो गर्भाधान के समय से ही संस्कारों की श्रृंखला आरंभ हो जाती है। पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण और निष्क्रमण के विषय मे हम पिछली पोस्ट में चर्चा कर ही चुके है आज हम अन्न प्राशन और चूडाकर्म पर चर्चा करेंगे -
------------------------ #अन्नप्राशन ------------------------
इस संस्कार में बालक को अन्न ग्रहण कराया जाता है, शिशु माता का दुग्धपान करके ही वृद्धि पाता है। जन्म से छठे महीने में उसका अन्नप्राशन संस्कार होता है। जिसमें शिशु को चांदी की कटोरी या थाली में रखा भोजन परोसा जाता है। इसमें खास तौर पर उसे खीर खिलाई जाती है।
चांदी की कटोरी में जब गर्म दूध की खीर डाली जाती है, तो उसमें चांदी के पोषक तत्व शामिल हो जाते हैं। जो शरीर को मजबूत बनाने के लिए जरूरी हैं।
#आधुनिक_विज्ञान -
शिशु विशेषज्ञ नवजात को छह माह का होने तक, केवल स्तनपान कराने की सलाह देते है। छह माह के बाद केवल स्तन दूध शिशु को पर्याप्त पोषक तत्व प्रदान नहीं कर पाता, विशेषकर आयरन। इसी कारणवश आपके शिशु को अन्य स्वास्थ्यकर भोजन की जरुरत होती है।
शिशु के आहार में ठोस भोजन शामिल करने से पहले छह माह तक इंतजार करना सही है। इससे शिशु में भोजन के प्रति प्रतिकूल प्रतिक्रिया और एलर्जी विकसित होने का खतरा कम करने में मदद मिलती है। यदि आपके परिवार में छाजन (एक्जिमा), दमा जैसी एलर्जी या फिर भोजन के प्रति एलर्जी का इतिहास रहा है, तो यह विशेषतौर पर महत्वपूर्ण है। जब शिशु छह माह का हो जाए, तब आप सैद्धांतिक तौर पर उसे अधिकांश भोजन दे सकती हैं।
गाजर, कद्दू, आलू, शकरकंदी, तोरी, पेठा कद्दू आदि सब्जियों का गाढ़ा गूदा (प्यूरी)
पकाए हुए सेब और नाशपति का गूदा या मसला हुआ केला
ग्लूटेन (आटे का लस) मुक्त शिशु आहार जैसे आयरन युक्त चावल के सीरियल। इन्हें आप उस दूध में भी मिलाकर दे सकती हैं, जो आपका शिशु रोज पीता है ।
#संस्कार - बालक को जब पेय पदार्थ, दूध आदि के अतिरिक्त अन्न देना प्रारम्भ किया जाता है, तो वह शुभारम्भ यज्ञीय वातावरण युक्त धर्मानुष्ठान के रूप में होता है। इसी प्रक्रिया को अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है।अन्नप्राशन 6 माह की आयु के आस-पास कराया जाता है। अन्न का शरीर से गहरा सम्बन्ध है। मनुष्यों और प्राणियों का अधिकांश समय साधन-आहार व्यवस्था में जाता है। उसका उचित महत्त्व समझकर उसे सुसंस्कार युक्त बनाकर लेने का प्रयास करना उचित है। अन्नप्राशन संस्कार में भी यही होता है। अच्छे प्रारम्भ का अर्थ है- आधी सफलता। अस्तु, बालक के अन्नाहार के क्रम को श्रेष्ठतम संस्कारयुक्त वातावरण में करना अभीष्ट है। यर्जुवेद 40 वें अध्याय का पहला मन्त्र 'तेन त्यक्तेन भुंजीथा' (त्याग के साथ भोग करने) का र्निदेश करता है।
अन्नप्राशन के लिए व्यवस्था विशेष रूप से बनाकर रखनी चाहिए। अन्नप्राशन के लिए प्रयुक्त होने वाली कटोरी तथा चम्मच। चाटने के लिए चाँदी का उपकरण हो सके, तो अच्छा है। शिशु को पेय से अन्न पर लाते समय लेह्य (चाटने योग्य) खीर दी जाती है। यह पेय और खाद्य के बीच की स्थिति है। अर्थात् उसकी आयु, पाचन- क्षमता तथा आवश्यकता को ध्यान में रखकर ही खाद्य का चयन किया जाना चाहिए। जब चाहे, सो खिलाते रहना ठीक नहीं। खीर के साथ मधु, घृत, तुलसीदल तथा गंगाजल मिलाते हैं। ये सभी पौष्टिक, रोगनाशक तथा पवित्र आध्यात्मिक गुण संवर्धक हैं। विशेष रूप से खीर सुपाच्य, सन्तुलित आहार, मधु- मधुरता, घी- स्नेह, तुलसी- विकारनाशक तथा गङ्गा जल पवित्रता का प्रतीक है।
#चांदी_का_प्रयोग -
अन्नप्राशन के समय से लेकर उसके थोड़े बड़े होने तक चांदी का प्रयोग शाश्त्रो बताया जाता है , आज के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखे तो चांदी हमेशा बैक्टीरिया फ्री एवं संक्रमण रहित होती है इसलिए इसके बर्तनों का प्रयोग हमें कई तरह की बीमारियों से बचाता है और शुद्धता प्रदान करता है। चांदी के बर्तन में खाना खाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। हम आमतौर पर अपने घरों में जिन बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं उनका खाना बनाने वक्त कुछ ना कुछ अंश भोजन में मिल जाता है। बच्चों का इम्यून सिस्टम बड़ों के बराबर मजबूत नहीं होता है। जिसके चलते ऐसा खाना खाने से बच्चे बीमार पड़ सकते हैं। जबकि चांदी के बर्तनों में ऐसा नहीं होता है। इन बर्तनों में खाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
चांदी शुद्धता का प्रतीक है। और शिशु को उसके बेहतर सुपाच्य भोजन देने के अलावा उसे बैक्टेरियल इन्फेक्शन से बचाना भी इस संस्कार का उद्देश्य है जिसकी पुष्टि विज्ञान भी करता है ।।
-------------------- #मुंडन/#चूड़ाकर्म --------------------
बच्चे के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है , मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है, नौ माह गर्भ में रहने के दौरान उसके बाल दूषित हो जाते हैं, चूंकि पहले उसे सिर की त्वचा काफी नर्म होती है इसलिए बालों को नहीं हटाया जाता, जैसे ही शिशु एक साल या उससे अधिक की आयु में पहुंचता है उसकी त्वचा परिपक्व हो जाती है, मुंडन संस्कार से कई दोषों की समाप्ति होती है, यह संस्कार पूरे मंत्रोउच्चार के साथ होता है, जिसमें मुहूर्त और नक्षत्र दशा का विशेष महत्व है।
#विज्ञानं -
जब बच्चा मां के पेट में होता तो सिर के बालों में बहुत से हानिकारक बैक्टीरिया लगे होते हैं जो साधारण तरीके से धोने से भी नहीं निकल पाते हैं, इसलिए एक बार बच्चे का मुंडन जरूरी होता है। मुंडन कराने से बच्चों के शरीर का तापमान सामान्य हो जाता है जिससे दिमाग व सिर ठंडा रहता है। साथ ही अनेक शारीरिक तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं जैसे फोड़े, फुंसी, दस्त से बच्चों की रक्षा होती है और दांत निकलते समय होने वाला सिरदर्द व तालू का कांपना भी बंद हो जाता है। शरीर पर और विशेषकर सिर पर विटामिन –डी (धूप के रूप में) पड़ने से कोशिकाएँ जागृत होकर खून का प्रसारण अच्छी तरह कर पाती हैं जिनसे भविष्य में आने वाले बाल बेहतर होते हैं। कुछ नवीन रिसर्च बताती है कि मुंडन करने से या बाल हटा देने से बच्चों में चिड़चिड़ापन खत्म हो जाता है जिससे उनका शारीरिक विकास काफी अच्छा होता है ।
#संस्कारम -
जन्म के बाद पहले वर्ष के अंत या फिर तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष की समाप्ति से पहले शिशु का मुंडन संस्कार करना आमतौर पर प्रचलित है। बच्चे के जन्म के 1 साल के भीतर एक बार मुंडन जरूर कराना अच्छा होता है। हालांकि बच्चे की उम्र पांच साल होने पर भी उसके बाल उतारे जाते हैं और यज्ञ किया जाता है, कहा जाता है कि इससे बच्चों का सिर मजबूत होता है और दिमाग भी तेज होता है (इसकी पुष्टि विज्ञान भी करता है)। हिंदू धर्म में मुंडन संस्कार की एक खास पद्धति है, जिसमें मुंडन के बाद चोटी रखना अनिवार्य है। आपको बता दें कि हिंदू धर्म में मुंडन संस्कार के बाद सिर पर चोटी छोड़ने का अपना एक वैज्ञानिक महत्व बताया जाता है, सिर में सहस्रार के स्थान यानि सिर के सभी बालों को काटकर सिर के बीचों- बीच चोटी रखी जाती है। कहा जाता है कि यह मस्तिष्क का केंद्र है और विज्ञान के अनुसार यह शरीर के अंगो, बुद्धि और मन को नियंत्रित करने का स्थान भी है। सिर पर जिस स्थान पर चोटी रख जाती है वहाँ से मस्तिष्क का संतुलन ठीक तरह से बना रहता है।
#विशेष -
कहावत है जैसा खाय अन्न-वैसा बने मन। इसलिए आहार स्वास्थ्यप्रद होने के साथ पवित्र, संस्कार युक्त हो इसके लिए भी अभिभावकों, परिजनों को जागरूक करना जरूरी होता है। अन्न को व्यसन के रूप में नहीं औषधि और प्रसाद के रूप में लिया जाय, इस संकल्प के साथ अन्नप्राशन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है। संस्कारो की सिर्फ धार्मिक मान्यता नहीं बल्कि कुछ वैज्ञानिक कारण भी हैं। हालांकि बहुत से लोग ये सब सिर्फ इसलिए करवाते हैं क्योंकि वो बचपन से अपने घरों में ऐसा देखते आए हैं। इसलिए लोग महज इसे एक आध्यात्मिक परंपरा समझकर संस्कार कराते हैं।
बालक तो अनेक योनियों में भ्रमण करता हुआ मानव शरीर में आया है, इसलिए उसके मन पर पाशविक संस्कारों की छाया रहनी स्वाभाविक है। इसको हटाया जाना आवश्यक है। यदि पशु- प्रवृत्ति बनी रही, तो मनुष्य शरीर की विशेषता ही क्या रही है उसके चिर संचित कुसंस्कारों को दूर किया ही जाना चाहिए। इस परिशोधन के लिए ही संस्कार होते है।।
।। #धर्मसंस्थापनार्थाय_सम्भवामि_युगे_युगे ।।
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----------------------- #जीवन_विज्ञान -----------------------
#16_संस्कारो_का_विज्ञान - #भाग - 04
भारतीय संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है। प्राचीन काल में तो प्रत्येक कार्य का आरंभ संस्कार से ही होता था, किंतु वर्तमान में मनुष्य के पास न समय है न विश्वास। इसलिए आवश्यक प्रमुख कार्यों में ही संस्कार किये जाते हैं। यही कारण है कि संस्कारों की संख्या चालीस से घटकर सोलह रह गई है।
संस्कार व्युत्पत्तिपरक अर्थ- सम् पूर्वक कृञ् धातु से घञ् प्रत्यय होकर संस्कार शब्द निष्पन्न होता है। जिसका अर्थ है-
संस्करणं सम्यक्करणं वा संस्कारः अर्थात् परिष्कार करना अथवा भली प्रकार निर्माण करना ’ संस्कार’ है।
‘संस्कार- प्रकाश’ में संस्कार शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा गया है-
समुपसर्गात् कृञो घञि निष्पन्नोऽयं संस्कार
शब्दः स्वयमेव स्वलक्षणमप्यभिधत्ते ।।
तद्यथा- आत्मशरीरान्यतरनिष्ठो हीनाङ्गपूरको दोषापमार्जनकरोऽतिशयाधायकश्च विहितक्रियाजन्योऽतिशयविशेष एव ‘संस्कार’ इत्युच्यते।
#अर्थात् -
सम् उपसर्गपूर्वक कृ धातु से घञ् प्रत्यय होकर निष्पन्न ‘संस्कार’ शब्द स्वयमेव अपना लक्षण भी प्रकट कर देता है। यथा- शरीर और आत्मा में कमी या त्रुटि को पूर्ण करते हुए, दोषों का परिमार्जन करते हुए, अतिशय गुणों का आधान करने वाले शास्त्र विहित विधि (कर्मकाण्ड)से समुद्भूत अतिशय विशेष को ही ‘संस्कार’ कहा जाता है।
ऐसे तो गर्भाधान के समय से ही संस्कारों की श्रृंखला आरंभ हो जाती है। पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण और निष्क्रमण के विषय मे हम पिछली पोस्ट में चर्चा कर ही चुके है आज हम अन्न प्राशन और चूडाकर्म पर चर्चा करेंगे -
------------------------ #अन्नप्राशन ------------------------
इस संस्कार में बालक को अन्न ग्रहण कराया जाता है, शिशु माता का दुग्धपान करके ही वृद्धि पाता है। जन्म से छठे महीने में उसका अन्नप्राशन संस्कार होता है। जिसमें शिशु को चांदी की कटोरी या थाली में रखा भोजन परोसा जाता है। इसमें खास तौर पर उसे खीर खिलाई जाती है।
चांदी की कटोरी में जब गर्म दूध की खीर डाली जाती है, तो उसमें चांदी के पोषक तत्व शामिल हो जाते हैं। जो शरीर को मजबूत बनाने के लिए जरूरी हैं।
#आधुनिक_विज्ञान -
शिशु विशेषज्ञ नवजात को छह माह का होने तक, केवल स्तनपान कराने की सलाह देते है। छह माह के बाद केवल स्तन दूध शिशु को पर्याप्त पोषक तत्व प्रदान नहीं कर पाता, विशेषकर आयरन। इसी कारणवश आपके शिशु को अन्य स्वास्थ्यकर भोजन की जरुरत होती है।
शिशु के आहार में ठोस भोजन शामिल करने से पहले छह माह तक इंतजार करना सही है। इससे शिशु में भोजन के प्रति प्रतिकूल प्रतिक्रिया और एलर्जी विकसित होने का खतरा कम करने में मदद मिलती है। यदि आपके परिवार में छाजन (एक्जिमा), दमा जैसी एलर्जी या फिर भोजन के प्रति एलर्जी का इतिहास रहा है, तो यह विशेषतौर पर महत्वपूर्ण है। जब शिशु छह माह का हो जाए, तब आप सैद्धांतिक तौर पर उसे अधिकांश भोजन दे सकती हैं।
गाजर, कद्दू, आलू, शकरकंदी, तोरी, पेठा कद्दू आदि सब्जियों का गाढ़ा गूदा (प्यूरी)
पकाए हुए सेब और नाशपति का गूदा या मसला हुआ केला
ग्लूटेन (आटे का लस) मुक्त शिशु आहार जैसे आयरन युक्त चावल के सीरियल। इन्हें आप उस दूध में भी मिलाकर दे सकती हैं, जो आपका शिशु रोज पीता है ।
#संस्कार - बालक को जब पेय पदार्थ, दूध आदि के अतिरिक्त अन्न देना प्रारम्भ किया जाता है, तो वह शुभारम्भ यज्ञीय वातावरण युक्त धर्मानुष्ठान के रूप में होता है। इसी प्रक्रिया को अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है।अन्नप्राशन 6 माह की आयु के आस-पास कराया जाता है। अन्न का शरीर से गहरा सम्बन्ध है। मनुष्यों और प्राणियों का अधिकांश समय साधन-आहार व्यवस्था में जाता है। उसका उचित महत्त्व समझकर उसे सुसंस्कार युक्त बनाकर लेने का प्रयास करना उचित है। अन्नप्राशन संस्कार में भी यही होता है। अच्छे प्रारम्भ का अर्थ है- आधी सफलता। अस्तु, बालक के अन्नाहार के क्रम को श्रेष्ठतम संस्कारयुक्त वातावरण में करना अभीष्ट है। यर्जुवेद 40 वें अध्याय का पहला मन्त्र 'तेन त्यक्तेन भुंजीथा' (त्याग के साथ भोग करने) का र्निदेश करता है।
अन्नप्राशन के लिए व्यवस्था विशेष रूप से बनाकर रखनी चाहिए। अन्नप्राशन के लिए प्रयुक्त होने वाली कटोरी तथा चम्मच। चाटने के लिए चाँदी का उपकरण हो सके, तो अच्छा है। शिशु को पेय से अन्न पर लाते समय लेह्य (चाटने योग्य) खीर दी जाती है। यह पेय और खाद्य के बीच की स्थिति है। अर्थात् उसकी आयु, पाचन- क्षमता तथा आवश्यकता को ध्यान में रखकर ही खाद्य का चयन किया जाना चाहिए। जब चाहे, सो खिलाते रहना ठीक नहीं। खीर के साथ मधु, घृत, तुलसीदल तथा गंगाजल मिलाते हैं। ये सभी पौष्टिक, रोगनाशक तथा पवित्र आध्यात्मिक गुण संवर्धक हैं। विशेष रूप से खीर सुपाच्य, सन्तुलित आहार, मधु- मधुरता, घी- स्नेह, तुलसी- विकारनाशक तथा गङ्गा जल पवित्रता का प्रतीक है।
#चांदी_का_प्रयोग -
अन्नप्राशन के समय से लेकर उसके थोड़े बड़े होने तक चांदी का प्रयोग शाश्त्रो बताया जाता है , आज के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखे तो चांदी हमेशा बैक्टीरिया फ्री एवं संक्रमण रहित होती है इसलिए इसके बर्तनों का प्रयोग हमें कई तरह की बीमारियों से बचाता है और शुद्धता प्रदान करता है। चांदी के बर्तन में खाना खाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। हम आमतौर पर अपने घरों में जिन बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं उनका खाना बनाने वक्त कुछ ना कुछ अंश भोजन में मिल जाता है। बच्चों का इम्यून सिस्टम बड़ों के बराबर मजबूत नहीं होता है। जिसके चलते ऐसा खाना खाने से बच्चे बीमार पड़ सकते हैं। जबकि चांदी के बर्तनों में ऐसा नहीं होता है। इन बर्तनों में खाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
चांदी शुद्धता का प्रतीक है। और शिशु को उसके बेहतर सुपाच्य भोजन देने के अलावा उसे बैक्टेरियल इन्फेक्शन से बचाना भी इस संस्कार का उद्देश्य है जिसकी पुष्टि विज्ञान भी करता है ।।
-------------------- #मुंडन/#चूड़ाकर्म --------------------
बच्चे के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है , मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है, नौ माह गर्भ में रहने के दौरान उसके बाल दूषित हो जाते हैं, चूंकि पहले उसे सिर की त्वचा काफी नर्म होती है इसलिए बालों को नहीं हटाया जाता, जैसे ही शिशु एक साल या उससे अधिक की आयु में पहुंचता है उसकी त्वचा परिपक्व हो जाती है, मुंडन संस्कार से कई दोषों की समाप्ति होती है, यह संस्कार पूरे मंत्रोउच्चार के साथ होता है, जिसमें मुहूर्त और नक्षत्र दशा का विशेष महत्व है।
#विज्ञानं -
जब बच्चा मां के पेट में होता तो सिर के बालों में बहुत से हानिकारक बैक्टीरिया लगे होते हैं जो साधारण तरीके से धोने से भी नहीं निकल पाते हैं, इसलिए एक बार बच्चे का मुंडन जरूरी होता है। मुंडन कराने से बच्चों के शरीर का तापमान सामान्य हो जाता है जिससे दिमाग व सिर ठंडा रहता है। साथ ही अनेक शारीरिक तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं जैसे फोड़े, फुंसी, दस्त से बच्चों की रक्षा होती है और दांत निकलते समय होने वाला सिरदर्द व तालू का कांपना भी बंद हो जाता है। शरीर पर और विशेषकर सिर पर विटामिन –डी (धूप के रूप में) पड़ने से कोशिकाएँ जागृत होकर खून का प्रसारण अच्छी तरह कर पाती हैं जिनसे भविष्य में आने वाले बाल बेहतर होते हैं। कुछ नवीन रिसर्च बताती है कि मुंडन करने से या बाल हटा देने से बच्चों में चिड़चिड़ापन खत्म हो जाता है जिससे उनका शारीरिक विकास काफी अच्छा होता है ।
#संस्कारम -
जन्म के बाद पहले वर्ष के अंत या फिर तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष की समाप्ति से पहले शिशु का मुंडन संस्कार करना आमतौर पर प्रचलित है। बच्चे के जन्म के 1 साल के भीतर एक बार मुंडन जरूर कराना अच्छा होता है। हालांकि बच्चे की उम्र पांच साल होने पर भी उसके बाल उतारे जाते हैं और यज्ञ किया जाता है, कहा जाता है कि इससे बच्चों का सिर मजबूत होता है और दिमाग भी तेज होता है (इसकी पुष्टि विज्ञान भी करता है)। हिंदू धर्म में मुंडन संस्कार की एक खास पद्धति है, जिसमें मुंडन के बाद चोटी रखना अनिवार्य है। आपको बता दें कि हिंदू धर्म में मुंडन संस्कार के बाद सिर पर चोटी छोड़ने का अपना एक वैज्ञानिक महत्व बताया जाता है, सिर में सहस्रार के स्थान यानि सिर के सभी बालों को काटकर सिर के बीचों- बीच चोटी रखी जाती है। कहा जाता है कि यह मस्तिष्क का केंद्र है और विज्ञान के अनुसार यह शरीर के अंगो, बुद्धि और मन को नियंत्रित करने का स्थान भी है। सिर पर जिस स्थान पर चोटी रख जाती है वहाँ से मस्तिष्क का संतुलन ठीक तरह से बना रहता है।
#विशेष -
कहावत है जैसा खाय अन्न-वैसा बने मन। इसलिए आहार स्वास्थ्यप्रद होने के साथ पवित्र, संस्कार युक्त हो इसके लिए भी अभिभावकों, परिजनों को जागरूक करना जरूरी होता है। अन्न को व्यसन के रूप में नहीं औषधि और प्रसाद के रूप में लिया जाय, इस संकल्प के साथ अन्नप्राशन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है। संस्कारो की सिर्फ धार्मिक मान्यता नहीं बल्कि कुछ वैज्ञानिक कारण भी हैं। हालांकि बहुत से लोग ये सब सिर्फ इसलिए करवाते हैं क्योंकि वो बचपन से अपने घरों में ऐसा देखते आए हैं। इसलिए लोग महज इसे एक आध्यात्मिक परंपरा समझकर संस्कार कराते हैं।
बालक तो अनेक योनियों में भ्रमण करता हुआ मानव शरीर में आया है, इसलिए उसके मन पर पाशविक संस्कारों की छाया रहनी स्वाभाविक है। इसको हटाया जाना आवश्यक है। यदि पशु- प्रवृत्ति बनी रही, तो मनुष्य शरीर की विशेषता ही क्या रही है उसके चिर संचित कुसंस्कारों को दूर किया ही जाना चाहिए। इस परिशोधन के लिए ही संस्कार होते है।।
।। #धर्मसंस्थापनार्थाय_सम्भवामि_युगे_युगे ।।
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