BRAHMIN RAJVANSH PART 5
------------- #ब्राम्हण_राजवंश - #भाग - 04 --------------
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#शुंग_राजवंश
#राजवंश_समयकाल - 185ई.पू.-75 ई.पू. (112 वर्ष )
#संस्थापक - #पुष्यमित्र_शुंग ( भारद्वाज और कश्यप द्वैयमुष्यायन गोत्र )
----------------- #महाराज_वसुमित्र_शुंग -----------------
(131-124 ईसा पूर्व.)
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पिछली पोस्ट में आप सभी ने पढ़ा कि किस तरह महाराज पुष्यमित्र शुंग राजवंश की नींव डालते है , और उनके प्रतापी पुत्र अग्निमित्र अपने साम्राज्य का विस्तार करते है, जिसमे उनके पुत्र परम प्रतापी महाराज वशुज्येष्ठ शुंग बढ़चढ़ कर सहयोग करते है । महाराज वशुज्येष्ठ महाराज अग्निमित्र और महारानी मालविका के जेष्ठ पुत्र थे , शुंग राजवंश का नियम था कि एक विशाल साम्राज्य होने के कारण 2 राजा राज्य करते थे दूसरे राजा को उपराजा या गोप्ता कहते थे , जिस समय महाराज पुष्यमित्र शुंग राजा थे उनके पुत्र अग्निमित्र उपराजा थे , महाराज अग्निमित्र के राजा बनने पर वशुज्येष्ठ उपराजा बने और वशुज्येष्ठ के महाराज बनने के बाद गोप्ता बने उनके भाई महाराज वशुमित्र जिन्हें सुमित्र के नाम से भी जाना जाता है । वशुमित्र शुंग राजवंश के 4th राजा थे जो पहले गोप्ता और बाद में महाराज बने ।।
भारत मे शुंग वंश भारत के एकीकरण के लिए अपनी सीमा का विस्तार करता जा रहा था उसके अंतर्गत जब विदर्भ युद्ध के कारण मालविका अपनी बुआ कौशिकी के साथ अज्ञातवास में रह रही थी वो भी अग्निमित्र के राजमहल में ही , अग्निमित्र की पहली पत्नी महारानी धारिणी मालविका को संगीत- नृत्य सिखाने हेतु नाट्यचार्य गणदास को नियुक्त करती हैं। धारिणी प्रयत्न करती है कि राजा मालविका के रूप- सौन्दर्य पर मुग्ध न हो जाएं। इसलिए वह उसे छिपा लेती हैं। लेकिन बाद में परिस्थिति ऐसी बनती है कि मालविका को अपना वास्तविक परिचय देना पड़ता है और मालविका और अग्निमित्र एक दूसरे से विवाह कर लेते है , और जब महारानी मालविका को पुत्र होता है तो उसे ही अपना उत्तराधिकारी घोषित करते है लेकिन साथ ही साथ महारानी धारिणी के जेष्ठ पुत्र वशुमित्र को भी राज्य संचालन का भार देते है बाद में जब वशुज्येष्ठ राजा बनते है तो वशुमित्र गोप्ता बनाये जाते है वशुज्येष्ठ शुंग ने अपना साम्राज्य तिब्बत तक फैलाया और तिब्बत भारत का अंग बन गया। वो बौद्धों को भगाता चीन तक ले गया। वहां चीन के सम्राट ने अपनी बेटी की शादी वशुज्येष्ठ से करके सन्धि की। उनके वंशज आज भी चीन में “शुंग” surname ही लिखते हैं। और बाद में जब वशुमित्र राजा बने तो उन्होंने अपने साम्राज्य को और विस्तृत किया ।।
#प्रमुख_लड़ाइयां -
भारत विजय का सपना यवनो ने कभी नही त्यागा , सेल्यूकसवंशी यवन राजा अंटिओकस सप्तम ने एक बार फिर भाग्य की परीक्षा की। वह माद प्रदेश पर चढ़ आया पर पारदों की 12000 सेना के सामने पराजित हुआ , और उस विजय के बाद पारदों (पारसियों) ने भारत के सीमापवर्ती क्षेत्रों पर कई बार आक्रमण किया और हर बार मार खाकर गए । फ्रावत्ति के समय तूरानी शकों का भारी आक्रमण हुआ। दजला के किनारे तक का देश उन्होंने लूटा और फ्रावत्ति को 128 ई.पू.. में मार डाला। फ्रावत्ति का उत्तराधिकारी रत्तावान या अर्दवान (प्रथम) शकों को कर देने पर बाध्य हुआ। शकों ने ईरान के एक पूर्वी प्रदेश पर अधिकार करके अपनी बस्ती बसाई और उसका नाम शकस्थान रखा जो आगे चलकर सीस्तान कहलाया। पुराणों में शक जाति की उत्पत्ति सूर्यवंशी राजा नरिष्यंत से कही गई है। राजा सगर ने राजा नरिष्यंत को राज्यच्युत तथा देश से निर्वासित किया था। वर्णाश्रम आदि के नियमों का पालन न करने के कारण तथा ब्राह्मणों से अलग रहने के कारण वे म्लेच्छ हो गए थे। उन्हीं के वंशज शक कहलाए।
इतिहासकार मानते हैं कि शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाली स्किथी लोगों की एक जनजाति या जनजातियों का समूह था, जो सीर नदी की घाटी में रहता था। 'युइशि' लोग तिब्बत के उत्तर-पश्चिम में तकला-मकान की मरुभूमि के सीमांत पर निवास करते थे। युइशि लोगों पर जब चीन के हूणों ने आक्रमण किया तो उनको अपना स्थान छोड़कर जाना पड़ा। उन्होंने शकों पर आक्रमण कर उनका स्थान हड़प लिया तब शकों को अपना स्थान छोड़कर जाना पड़ा। हूणों ने युइशियों को धकेला और युइशियों ने शकों को। शकों ने बाद में बैक्ट्रिया पर विजय प्राप्त कर हिन्दूकुश के मार्ग से भारत में प्रवेश किया। बैक्ट्रिया के यवन राज्य का अंत शक जाति के आक्रमण द्वारा ही हुआ था। शकों ने फिर पार्थिया के साम्राज्य पर आक्रमण किया। पारसी राजा मिथिदातस द्वितीय (123-88 ईपू) ने शकों के आक्रमणों से अपने राज्य की रक्षा की। मिथिदातस की शक्ति से विवश शकों ने वहां से ध्यान हटाकर भारत की ओर लगा दिया।
अब यहां से शकों के आक्रमण भारत पर आरम्भ हुए जिनका प्रतिरोध शुंग शाशक अंत तक करते रहे ,और भारत को किसी भी बाहरी आक्रमण से बचाते रहे। उन्होंने न सिर्फ भारत की सीमाओं की रक्षा की अपितु अपनी सीमा का विस्तार भी किया वो महाराज वशुमित्र ही थे जिन्होंने शको को रोके रखा , एक दिन नाटक देखने के दौरान उनकी हत्या कर दी गई और सत्ता भद्रक AKA आन्ध्रक के हाथों में गयी जो वशुज्येष्ठ के पुत्र थे ।।
#विशेष -
वशुमित्र शुंग के शाशन काल में सामाजिक विषयों को कला में स्थान दिया जाने लगा। इन्हीं कारणों से शुंगकालीन कला में जीवन का प्रवाह परिलक्षित होता है, तत्कालीन प्रतिमाओं में सौन्दर्य, वस्त्राभूषण एवं रत्नों की सजावट. केश विन्यास, मुद्रा की गंभीरता का जो निरूपण है, उसके अवलोकन से मध्यम वर्ग के समाज का अध्ययन सहज तौर पर हो जाता है। शुंग कला का मुख्य उद्देश्य मध्यदेशीय लोगों के सामूहिक विचार तथा सामाजिक भावना को व्यक्त करना था। इस दौर में कला किसी विशेष व्यक्तित्व की आभा से मुक्त होकर सामूहिक कल्पना का प्रतिनिधित्व करती है तथा जनसमुदाय की परंपरा की भी सक्षम अभिव्यक्ति करती है। यही नहीं शुंग काल में हीनयान मत के प्रचार से अनेक बौद्ध गुफाओं का निर्माण किया गया। भिक्षुओं के निवास हेतु आवश्यकता महसूस की गई कि वह सांसारिक वातावरण से अलग प्राकृतिक वातावरण में हो, इसी कारण से पश्चििमी भारत के ठोस पर्वतों में विहार तैयार किए गए जो प्राय: नगरों से लगभग आठ दस मील की दूरी पर हुआ करते थे। इन विहार व चैत्यों में पत्थरों को उत्कीर्ण कर उसे अलंकृत भी किया जाता रहा। कला , नागरिकों की सुरक्षा , सामाजिक उत्थान के कार्य महाराज वशुमित्र ने अच्छे से किया जहाँ उनके शासन काल मे उन्होंने शको को रोके रखा वही सनातन संस्कृति के उत्थान के लिए भी कदम उठाए ।।
#क्रमशः
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#शुंग_राजवंश
#राजवंश_समयकाल - 185ई.पू.-75 ई.पू. (112 वर्ष )
#संस्थापक - #पुष्यमित्र_शुंग ( भारद्वाज और कश्यप द्वैयमुष्यायन गोत्र )
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(131-124 ईसा पूर्व.)
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पिछली पोस्ट में आप सभी ने पढ़ा कि किस तरह महाराज पुष्यमित्र शुंग राजवंश की नींव डालते है , और उनके प्रतापी पुत्र अग्निमित्र अपने साम्राज्य का विस्तार करते है, जिसमे उनके पुत्र परम प्रतापी महाराज वशुज्येष्ठ शुंग बढ़चढ़ कर सहयोग करते है । महाराज वशुज्येष्ठ महाराज अग्निमित्र और महारानी मालविका के जेष्ठ पुत्र थे , शुंग राजवंश का नियम था कि एक विशाल साम्राज्य होने के कारण 2 राजा राज्य करते थे दूसरे राजा को उपराजा या गोप्ता कहते थे , जिस समय महाराज पुष्यमित्र शुंग राजा थे उनके पुत्र अग्निमित्र उपराजा थे , महाराज अग्निमित्र के राजा बनने पर वशुज्येष्ठ उपराजा बने और वशुज्येष्ठ के महाराज बनने के बाद गोप्ता बने उनके भाई महाराज वशुमित्र जिन्हें सुमित्र के नाम से भी जाना जाता है । वशुमित्र शुंग राजवंश के 4th राजा थे जो पहले गोप्ता और बाद में महाराज बने ।।
भारत मे शुंग वंश भारत के एकीकरण के लिए अपनी सीमा का विस्तार करता जा रहा था उसके अंतर्गत जब विदर्भ युद्ध के कारण मालविका अपनी बुआ कौशिकी के साथ अज्ञातवास में रह रही थी वो भी अग्निमित्र के राजमहल में ही , अग्निमित्र की पहली पत्नी महारानी धारिणी मालविका को संगीत- नृत्य सिखाने हेतु नाट्यचार्य गणदास को नियुक्त करती हैं। धारिणी प्रयत्न करती है कि राजा मालविका के रूप- सौन्दर्य पर मुग्ध न हो जाएं। इसलिए वह उसे छिपा लेती हैं। लेकिन बाद में परिस्थिति ऐसी बनती है कि मालविका को अपना वास्तविक परिचय देना पड़ता है और मालविका और अग्निमित्र एक दूसरे से विवाह कर लेते है , और जब महारानी मालविका को पुत्र होता है तो उसे ही अपना उत्तराधिकारी घोषित करते है लेकिन साथ ही साथ महारानी धारिणी के जेष्ठ पुत्र वशुमित्र को भी राज्य संचालन का भार देते है बाद में जब वशुज्येष्ठ राजा बनते है तो वशुमित्र गोप्ता बनाये जाते है वशुज्येष्ठ शुंग ने अपना साम्राज्य तिब्बत तक फैलाया और तिब्बत भारत का अंग बन गया। वो बौद्धों को भगाता चीन तक ले गया। वहां चीन के सम्राट ने अपनी बेटी की शादी वशुज्येष्ठ से करके सन्धि की। उनके वंशज आज भी चीन में “शुंग” surname ही लिखते हैं। और बाद में जब वशुमित्र राजा बने तो उन्होंने अपने साम्राज्य को और विस्तृत किया ।।
#प्रमुख_लड़ाइयां -
भारत विजय का सपना यवनो ने कभी नही त्यागा , सेल्यूकसवंशी यवन राजा अंटिओकस सप्तम ने एक बार फिर भाग्य की परीक्षा की। वह माद प्रदेश पर चढ़ आया पर पारदों की 12000 सेना के सामने पराजित हुआ , और उस विजय के बाद पारदों (पारसियों) ने भारत के सीमापवर्ती क्षेत्रों पर कई बार आक्रमण किया और हर बार मार खाकर गए । फ्रावत्ति के समय तूरानी शकों का भारी आक्रमण हुआ। दजला के किनारे तक का देश उन्होंने लूटा और फ्रावत्ति को 128 ई.पू.. में मार डाला। फ्रावत्ति का उत्तराधिकारी रत्तावान या अर्दवान (प्रथम) शकों को कर देने पर बाध्य हुआ। शकों ने ईरान के एक पूर्वी प्रदेश पर अधिकार करके अपनी बस्ती बसाई और उसका नाम शकस्थान रखा जो आगे चलकर सीस्तान कहलाया। पुराणों में शक जाति की उत्पत्ति सूर्यवंशी राजा नरिष्यंत से कही गई है। राजा सगर ने राजा नरिष्यंत को राज्यच्युत तथा देश से निर्वासित किया था। वर्णाश्रम आदि के नियमों का पालन न करने के कारण तथा ब्राह्मणों से अलग रहने के कारण वे म्लेच्छ हो गए थे। उन्हीं के वंशज शक कहलाए।
इतिहासकार मानते हैं कि शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाली स्किथी लोगों की एक जनजाति या जनजातियों का समूह था, जो सीर नदी की घाटी में रहता था। 'युइशि' लोग तिब्बत के उत्तर-पश्चिम में तकला-मकान की मरुभूमि के सीमांत पर निवास करते थे। युइशि लोगों पर जब चीन के हूणों ने आक्रमण किया तो उनको अपना स्थान छोड़कर जाना पड़ा। उन्होंने शकों पर आक्रमण कर उनका स्थान हड़प लिया तब शकों को अपना स्थान छोड़कर जाना पड़ा। हूणों ने युइशियों को धकेला और युइशियों ने शकों को। शकों ने बाद में बैक्ट्रिया पर विजय प्राप्त कर हिन्दूकुश के मार्ग से भारत में प्रवेश किया। बैक्ट्रिया के यवन राज्य का अंत शक जाति के आक्रमण द्वारा ही हुआ था। शकों ने फिर पार्थिया के साम्राज्य पर आक्रमण किया। पारसी राजा मिथिदातस द्वितीय (123-88 ईपू) ने शकों के आक्रमणों से अपने राज्य की रक्षा की। मिथिदातस की शक्ति से विवश शकों ने वहां से ध्यान हटाकर भारत की ओर लगा दिया।
अब यहां से शकों के आक्रमण भारत पर आरम्भ हुए जिनका प्रतिरोध शुंग शाशक अंत तक करते रहे ,और भारत को किसी भी बाहरी आक्रमण से बचाते रहे। उन्होंने न सिर्फ भारत की सीमाओं की रक्षा की अपितु अपनी सीमा का विस्तार भी किया वो महाराज वशुमित्र ही थे जिन्होंने शको को रोके रखा , एक दिन नाटक देखने के दौरान उनकी हत्या कर दी गई और सत्ता भद्रक AKA आन्ध्रक के हाथों में गयी जो वशुज्येष्ठ के पुत्र थे ।।
#विशेष -
वशुमित्र शुंग के शाशन काल में सामाजिक विषयों को कला में स्थान दिया जाने लगा। इन्हीं कारणों से शुंगकालीन कला में जीवन का प्रवाह परिलक्षित होता है, तत्कालीन प्रतिमाओं में सौन्दर्य, वस्त्राभूषण एवं रत्नों की सजावट. केश विन्यास, मुद्रा की गंभीरता का जो निरूपण है, उसके अवलोकन से मध्यम वर्ग के समाज का अध्ययन सहज तौर पर हो जाता है। शुंग कला का मुख्य उद्देश्य मध्यदेशीय लोगों के सामूहिक विचार तथा सामाजिक भावना को व्यक्त करना था। इस दौर में कला किसी विशेष व्यक्तित्व की आभा से मुक्त होकर सामूहिक कल्पना का प्रतिनिधित्व करती है तथा जनसमुदाय की परंपरा की भी सक्षम अभिव्यक्ति करती है। यही नहीं शुंग काल में हीनयान मत के प्रचार से अनेक बौद्ध गुफाओं का निर्माण किया गया। भिक्षुओं के निवास हेतु आवश्यकता महसूस की गई कि वह सांसारिक वातावरण से अलग प्राकृतिक वातावरण में हो, इसी कारण से पश्चििमी भारत के ठोस पर्वतों में विहार तैयार किए गए जो प्राय: नगरों से लगभग आठ दस मील की दूरी पर हुआ करते थे। इन विहार व चैत्यों में पत्थरों को उत्कीर्ण कर उसे अलंकृत भी किया जाता रहा। कला , नागरिकों की सुरक्षा , सामाजिक उत्थान के कार्य महाराज वशुमित्र ने अच्छे से किया जहाँ उनके शासन काल मे उन्होंने शको को रोके रखा वही सनातन संस्कृति के उत्थान के लिए भी कदम उठाए ।।
#क्रमशः
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