CHANAKYA PART 3

•••••••••• #गुरु_शिरोमणि  #आचार्य_चाणक्य •••••••••
                         #तृतीय_भाग

आज की पोस्ट लिखने से पहले हम एक जरूरी बात पे विमर्श कर लेते है वो है #काल_निर्धारण क्योंकि काल निर्धारण एक बहोत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है इतिहास के किसी भी पात्र के विषय मे लिखने के लिए --

भारतीय दृष्टि से इतिहास एक विद्या विशेष है। विद्या के रूप में इतिहास का उल्लेख सर्वप्रथम अथर्ववेद में किया गया है। अथर्ववेद सृष्टि निर्माता ब्रह्मा जी की देन है, ऐसा माना जाता है। अतः भारत में ऐतिहासिक सामग्री की प्राचीनता असंदिग्ध है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि भारत में ऐतिहासिक सामग्री का अभाव था, वास्तविकता को जानबूझकर नकारने के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। व्यास शिष्य लोमहर्षण के अनुसार प्रत्येक राजा को अपने समय का काफी बड़ा भाग इतिहास के अध्ययन में लगाना चाहिए और राजमंत्री को तो इतिहास तत्त्व का विद्वान होना ही चाहिए। राजा के लिए प्रतिदिन इतिहास सुनना एक अनिवार्य कार्य था। यदि प्राचीन काल में ऐतिहासिक सामग्री नहीं थी तो वे लोग क्या सुनते थे?

#काल_निर्धारण_में_समस्या  --
विभिन्न लोगो के और एक ही राजा के अलग-अलग पुराणों में नाम अलग-अलग हैं- भारत के प्राचीन राजवंशों के कई राजाओं के नाम अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग मिलते हैं। इससे सन्देह होता है सही नाम कौन सा है और वह व्यक्ति हुआ भी है या नहीं। नामों में अन्तर कई कारणों से हुआ है, यथा-

(1) भिन्न-भिन्न पुराणों की प्रतिलिपियाँ तैयार करतेसमय अनजाने में ही नामों के अक्षर आगे-पीछे हो गए हैं या कहीं-कहीं ग्रन्थ की प्रति अधिक प्राचीन होने से लिखावट पढ़ पाने में कठिनाई के कारण अथवा कहीं-कहीं ध्वनि साम्य के कारण भी नामों के अक्षरों में अन्तर आ गया है, जैसे- सोमाधि और सोमापि, अयुतायु और अयुनायु, सूर्यक और सुबक या अजक या जनक, दर्भक और दर्शक, उदयन और उदायी आदि।

(2) कहीं-कहीं स्मृति-भेद के कारण भी नाम अलग-अलग हो गए हैं, जैसे- द्रुर्हसेन का द्रुदसेन या दृढ़सेन, उदयन का उदयाश्व या उदायी, आदि।

(3) नामों के अन्तर का एक कारण विभिन्न पुराणों का वर्णन कविता में होना भी है। कविता में छन्द, अलंकार, शब्द, मात्रा, वर्ण आदि के बन्धनों के कारण व्यक्तियों तथा स्थानों के नाम के खण्डों की मात्राओं और अक्षरों को आगे-पीछे कर दिया गया है और कहीं-कहीं समानार्थक शब्दों का प्रयोग भी कर दिया गया है, यथा- महाबल और महाबाहु, रिपुंजय और शत्रुंजय आदि।

#निष्कर्ष -- काल निर्धारण करना एक कठिन परिश्रम करने के बाद ही निर्धारित होता है जिसमे लिपि, काल ,अवशेष ,पुरातत्व सर्वेक्षण , भाषा विज्ञान और अध्धयन की जरूरत पड़ती है किसी के कपोल कल्पना से काल का निर्धारण नही किया जा सकता है ।।

#अब_आते_है_इंडिका_में_लिखे_कुछ_उल्लेखों_से --

चाणक्य का नाम भारतीय ग्रंथो और इतिहास में प्रसिद्ध है ,किन्तु यवन राजदूत मेगस्थनीज के यात्रा वृतान्तो में चाणक्य का कोई उल्लेख नही मिलता है | इस कारण अनेको अम्बेडकरवादी चाणक्य को काल्पनिक घोषित कर देते है । किन्तु इन लोगो को बौद्ध इतिहास गन्थ वे भी श्रीलंका के और जैन ग्रंथो को अवश्य मानना चाहिए क्यूंकि बौद्ध ग्रन्थ महावंस में चाणक्य का स्पष्ट उल्लेख है उसमे लिखा है कि - " महाक्रोधी ब्राह्मण चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को राजा बनाया । "
जैन ग्रन्थ मंजूश्री मूलकल्प में चाणक्य का उल्लेख है ।
इसके अतिरिक्त तमाम सनातन वैदिक साहित्यों में इसका उल्लेख है कि आचार्य चाणक्य थे ।।

अब देखते है #मेगस्थनीज द्वारा चाणक्य के नामोल्लेख न करने का कारण -
मेगस्थनीज के यात्रा वृत्तान्त में दो शब्द मिलते है तथा उनके निम्न अर्थ कल्पित किये है ।
1- पलिब्रोथ - पाटिलपुत्र
2- सैण्ड्रोकोटस - चन्द्रगुप्त
पलिब्रोथ के विषय में मेगस्थनीज लिखता है -
" The river jomanes flows through the palibothri into the ganges between the towns methora and carisobora - fargument 1 p. 36

जमुना नदी पलिब्रोथ में से बहती हुई मथुरा और करिसोबर के मध्य में गंगा में मिलती है ।
यहा पलिब्रोथ का जो लक्षण है कि उसमें से यमुना बहती थी तथा उसके एक और मथुरा और दूसरी और करिसोबर है ये लक्षण मगध के पाटिलपुत्र पर घटित नही होते है |
" the prasii surpass power , their capital being palibotra " - fragument 6 p. 141
अर्थात प्राच्य अपनी शक्ति में थे उनकी राजधानी पलिब्रोथ थी ।

प्रसिल का अर्थ यूनानी इतिहास कार जोन्स ने प्राच्य देश किया है । इस प्राच्य देश के सम्बन्ध में जोन्स लिखता है -
the induas skrits the frontiers of the prasii - pliny p. 52
अर्थात प्राच्य सिन्धु के तटो पर था ।
इन वर्णनों से स्पष्ट है कि पलिब्रोथ को मगध राजधानी पाटिलपुत्र मानने में भूल है ।
आगे मेगस्थनीज लिखता है -
" melues in palibotra " - frg.6 p51
अर्थात पलिब्रोथ में मलेउस पर्वत है । अनेक लोग यहा बिहार के पार्श्वनाथ पर्वत को मल्ल पर्वत बताते है लेकिन उसका नाम कभी मल्लपर्वत रहा ही नही है ।
पालिब्रोथ के सम्बन्ध में कैप्टन विल्फर्ड लिखता है -
" according to dionysius periegets ,it was called also nyssaean road because it led from palibothra to famous city nysa .it had been traced out with particular care ,and at the end of every indian itinerery measure,but says that it consisted of ten stades.this ,of course, could be no other than the astronomical ,or panjabi coss ,one of which is equal 1.23 british mile .- essay of anugangam vol9 p. 48
यवन लेखक दायोनिय्स के अनुसार नेश नगर से पलिब्रोथ तक एक पथ था । इस पर एक छोटा स्तम्भ रहता था | इस स्तम्भ पर दुरी अंकित थी । क्रोश 10 स्टेडिया का था । एक क्रोश 1.23 ब्रिटिश मील के बराबर है । इस प्रकार यवन लेखक के अनुसार पलिब्रोथ से नेश की दुरी 1000 क्रोश हुई । जो कि मील के हिसाब से 1250 मील बने । नेश जनपद काबुल में था और काबुल अफगानिस्थान में है । कोई भी अफगान से पटना तक 1250 मील नही मान सकता है ।

अत: उपरोक्त वर्णनों से स्पष्ट है कि पलिब्रोथ वास्तव में पाटिलपुत्र अर्थात पटना नही है । बल्कि सिन्धु या कालीसिन्धु के तट का कोई नगर है ।

अब सैण्ड्राकोटस के विषय में देखते है -
इसके बारे में मेगस्थनीज लिखता है -
" यह भारत का एक बड़ा राजा था तथा यह पोरोस की राज सभा में रहता था । पोरस सैण्ड्राकोटस से भी बड़ा राजा था - megastheness calcutta edition p.51
इसके अनुसार सैण्ड्राकोटस भारत का चक्रव्रती सम्राट नही था बल्कि पोरस के अधीन एक राजा था ।
सैण्ड्राकोटस के पुत्र का उल्लेख मेगस्थनीज इस प्रकार करता है -
amitrocedus the son of sandrakottas - fragument 6 p.173
अर्थात अमित्रोकेड्स अथवा अल्लित्रोकेडेस ,सैण्ड्राकोटस का पुत्र था ।
चन्द्रगुप्त के इन नामो या इन नामो के साम्य कोई पुत्र नही था ।
मेगस्थनीज के अपशिष्ट लेखो को प्रकाशित करते हुए अप्पिएंस लिखता है -
" sandrakottos was king of indians around the induas " - appianuas p . 9
अर्थात सैण्ड्राकोटस सिन्धु तट के आसपास का राजा था ।
अत: यह सम्पूर्ण भारत के चक्रवती सम्राट चन्द्रगुप्त नही है ।

इन विवरणों से स्पष्ट है कि पलिब्रोथ जिसे पाटिलपुत्र और सैण्ड्राकोटस जिसे चन्द्रगुप्त समझ मेगस्थनीज को चन्द्रगुप्त के राज्य में पाटिलपुत्र में ठहरने के वृत्तांत गढ़ा जाता है वो भ्रम है । क्यूंकि पालिब्रोथ कोई सिन्धु तट अंतर्गत प्रदेश है और सैण्ड्राकोटस चन्द्रगुप्त नही बल्कि उसी प्रदेश का पौरस अधीन कोई राजा था । अत: स्पष्ट है कि मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त के राजकाल के समय और पाटिलपुत्र में भारत नही आया था बल्कि नन्द,पौरस के समय सिन्धु या कालीसिन्धु के समीप किसी राज्य में पौरस अधीन राजा सैण्ड्राकोटस के दरबार में रुका था । यही कारण है कि मेगस्थनीज के लेखो में चाणक्य का उल्लेख न होने का क्यूंकि वो चन्द्रगुप्त के दरबार को पाटिलपुत्र में रुका ही नही था ।

#अन्य_यूनानी_साहित्यों_का_खंडन --

यूनानी साहित्य में बताया गया है कि सिकन्दर के भारत पर आक्रमण के समय यहाँ सेंड्रोकोट्टस नाम का एक बहुत वीर, योग्य और कुशल व्यक्ति था, जो सिकन्दर के भारत से चले जाने के बाद 320 ई.पू. में प्रस्सी की गद्दी पर बैठा था और भारत का सम्राट बना था। जोन्स ने उसे ही चन्द्रगुप्त मौर्य मानकर 28 फरवरी, 1793 को सगर्व यह घोषणा कर डाली कि उसने चन्द्रगुप्त मौर्य के रूप में सेंड्रोकोट्टस को पाकर भारत के इतिहास की सबसे बड़ी, सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे कठिन समस्या का निदान पा लिया।

इस प्रश्न पर कि क्या सेंड्रोकोट्टस ही चन्द्रगुप्त मौर्य है, विचार करने के लिए यह जान लेना उचित होगा कि सेंड्रोकोट्टस के सम्बन्ध में प्राचीन यूनानी साहित्य में जो कुछ लिखा मिलता है, क्या वह सब चन्द्रगुप्त मौर्य पर घटता है ? यूनानी साहित्य में सेंड्रोकोट्टस के संदर्भ में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें लिखी हुई मिलती हैं-

(1) सेंड्रोकोट्टस 6 लाख सेना लेकर सारे भारत में घूमा था और अनेक राजाओं को अपने अधीन किया था।
(2) सेंड्रोकोट्टस ने मगध के पहले सम्राट को मारकर साम्राज्य प्राप्त किया था।
(3) सेल्युकस ने युद्ध में हारने के पश्चात अपनी पुत्री का विवाह सेंड्रोकोट्टस से किया था।
(4) जिस क्षेत्र में पालीबोथ्रा स्थित है, वह भारत में बड़ा प्रसिद्ध था। वहाँ के राजा अपने नाम के साथ पालीबोथ्री उपनाम अवश्य लगाते थे।
उक्त बातों को भारतीय स्रोतों, यथा- पुराणों आदि में चन्द्रगुप्त मौर्य के संदर्भ में आए उल्लेखों से मिलान करने पर पाते हैं कि उसके सम्बन्ध में ये बातें तथ्यों से परे हैं, क्योंकि-

(1) चन्द्रगुप्त मौर्य को भारत में इतने विशाल सैनिक अभियान करने की आवश्यकता हुई ही नहीं।
(2) यूनानी लेखकों की इस स्थापना की पुष्टि में किसी भी अन्य स्रोत से कोई भी ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलता। ऐसा लगता है कि यह यूनानी लेखकों की अपनी ही कल्पना है। कारण मगध के सम्राट नन्द को तो चाणक्य ने अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति हेतु मरवाया था।
(3) चन्द्रगुप्त मौर्य का विवाह किसी यूनानी लड़की से हुआ था, इसका उल्लेख भी किसी भारतीय स्रोत में नहीं मिलता। पं. भगवद्दत्त ने भी अपनी पुस्तक ‘भारतवर्ष का बृहद् इतिहास‘, में माना है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के विदेशी लड़की के साथ विवाह का कोई भी ऐतिहासिक आधार उपलब्ध नहीं है।
चन्द्रगुप्त मौर्य के विदेशी कन्या के विवाह के सम्बन्ध में यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि सिकन्दर का आक्रमण 327 ई. पू. में हुआ था और उस समय चन्द्रगुप्त ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था। यदि उस समय चन्द्रगुप्त 24-25 वर्ष का भी रहाहोगा तो 320 ई. पू. में गद्दी पर बैठने के समय वह 31-32 वर्ष का अवश्य हो गया होगा। सिकन्दर के आक्रमण के 25 वर्ष बाद सेल्युकस ने भारत पर आक्रमण किया था। युद्ध में हारने के पश्चात यदि उसनेअपनी पुत्री की शादी चन्द्रगुप्त से की होगी तो उस समय उसकी आयु 57-58 वर्ष की अवश्य रही होगी। सामान्यः यह आयु नए विवाह करने की नहीं होती। इसके लिए कुछ विद्वानों का यह कहना है कि राजनीतिक विवाह में आयु का प्रश्न नहीं होता।

दूसरी ओर कुछ नाटकों आदि में चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्युकस की पुत्री हेलन या कार्नेलिया की सिकन्दर के आक्रमण के समय यूनानी शिविर में प्रणय चर्चा का उल्लेख किया गया है किन्तु क्या यहाँ से जाने के 25 वर्ष बाद तक वह चन्द्रगुप्त के लिए प्रेम संजोए अविवाहित बैठी रही होगी ? यह बात असंभव न होते हुए भी जमती नहीं।

इस संदर्भ में भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार द्वारा ‘प्राचीन भारत‘ के पृष्ठ 84 पर कहे गए ये शब्द भी उल्लेखनीय हैं कि- ‘‘चन्द्रगुप्त सेल्युकस की लड़ाई का विस्तृत वर्णन यवन लेखकों ने नहीं किया है। फलतः कुछ लोगों ने तो यह भी सन्देह प्रकट किया है कि उन दोनों में कोई युद्ध हुआ भी था ?‘‘ यदि युद्ध हुआ ही नहीं तो सेल्युकस की लड़की से विवाह का प्रश्न ही नहीं उठता।

(4) यूनानी साहित्य में सेंड्रोकोट्टस के सम्बन्ध में यह भी लिखा मिलता है कि जिस क्षेत्र में ‘पालीबोथ्रा‘ स्थित है वह भारत भर में बड़ा प्रसिद्ध है और वहाँ के राजा अपने नाम के साथ ‘पालीबोथ्री‘ उपनाम भी लगाते थे। उदाहरण के लिए जैसे सेंड्रोकोट्टस ने किया था। इस सम्बन्ध में यह उल्लेखनीय है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने ‘मौर्य‘ तो अपने पारिवारिक नाम केरूप में लगाया था, उपनाम के रूप में नहीं।
ऐतिहासिक दृष्टि से विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि उक्त बातों का मौर्य वंश के पश्चात मगध साम्राज्य पर आने वाले चौथे राजवंश ‘गुप्त वंश‘ के राजाओं के साथ कुछ-कुछ मेल हो जाता है। जैसे, जहाँ तक बड़ी सेना लेकर भारत-विजय करने और विदेशी राजा की पुत्री से विवाह करने की बात है, तो यह दोनों बातें गुप्त राजवंश के दूसरे राजासमुद्रगुप्त से मेल खाती हैं। समुद्रगुप्त ने विशाल सेना के बल पर भारत विजय करके अश्वमेध यज्ञ किया था। उसके सम्बन्ध में हरिषेण द्वारा इलाहाबाद में स्थापित स्तम्भ पर खुदवाए विवरण से उसकी विजय आदि के अलावा यह भी ज्ञात होता है कि पश्चिमोत्तर क्षेत्र में युद्ध-विजय के पश्चात उसे किसी विदेशी राजा नेअपनी कन्या उपहार में दी थी।

जहाँ तक मगध के सम्राट को मारकर राज्य हथियाने की बात है तो यह बात तो गुप्त वंश के प्रथम पुरुष ‘चन्द्रगुप्त‘ से मेल खाती है। उसने ही पहले आन्ध्र वंश के अन्तिम राजा चन्द्रश्री या चन्द्रमस को और बाद में उसके पुत्र को मारकर गद्दी हथियाई थी।

नाम के साथ उपनाम जोड़ने की जहाँ तक बात है तो यहप्रथा भी गुप्त वंश के राजाओं में थी, जैसे-

क्र.सं. -- राजा का नाम -- उपनाम

1. चन्द्रगुप्त प्रथम—विजयादित्य

2. समुद्रगुप्त -- अशोकादित्य

3. चन्द्रगुप्त द्वितीय -- विक्रमादिव्य

4. कुमारगुप्त प्रथम—महेन्द्रादित्य आदि

सूची से स्पष्ट हो जाता है कि इस वंश के हर राजा ने अपने नाम के साथ उपनाम ‘आदित्य‘ जोड़ा है। गुप्त वंश के राजा सूर्यवंशी थे। उनमें सूर्य के लिए ‘आदित्य‘ शब्द उपनाम में जोड़ने की परम्परा थी अर्थात नाम के साथ उपनाम जोड़ने की बात भी चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ मेल नहीं खाती।

स्पष्ट है कि सेंड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य नहीं है, जिसे जोन्स ने जबरदस्ती बनाया है।

#भौगोलिक_स्थिति_के_आधार_पर_खण्डन --

यूनानी साहित्य के अनुसार पालीबोथ्रा चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र ही था। इस पर भी भारतीय दृष्टिकोण से विचार किया जाना आवश्यक हैकिन्तु पहले यह जान लेना उचित होगा कि पालीबोथ्रा को पाटलिपुत्र मानने की दृष्टि से मेगस्थनीज तथा अन्य यूनानी लेखकों की विभिन्न रचनाओं में क्या-क्या कहा गया है-

(1) ...... परन्तु प्रस्सई शक्ति में बढ़े-चढ़े हैं .... उनकी राजधानी पालीबोथ्रा ही है। यह बहुत बड़ा और धनी नगर है। इस नगर के कारण अनेक लोग इस प्रदेश के निवासियों को पालीबोथ्री कहते हैं। यही नहीं, गंगा के साथ-साथ का सारा भू-भाग इसी नाम से पुकारा जाता है।
(2) वह (हरकुलिश-सरकुलेश-विष्णु) अनेक नगरों का निर्माता था। उनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध पालीबोथ्रा था।
(3) जोमेनस (यमुना) नदी पालीबोथ्रा (पाटलिपुत्र) में से होकर बहती हुई मेथोरा (मथुरा) और करिसोबोरा के मध्य में गंगा से मिलती है।
(4) परन्तु एक पथ भी है, जो पालीबोथ्रा में से होकर भारत को जाता है।
(5) प्रस्सी राज्य की सीमा सिन्धु पुलिंद तक है।
(6) पालीबोथ्रा गंगा-यमुना के संगम से 425 मील है और समुद्र में गंगा के गिरने के स्थान से 738 मील है।
(7) पालीबोथ्रा गंगा और इरेन्नोबोस के संगम पर स्थित है।
यूनानियों द्वारा कथित उक्त आधारों पर विचार करने के उपरान्त इनमें से किसी आधार पर भी यह नहीं माना जा सकता कि पालीबोथ्रा पाटलिपुत्र था, क्योंकि-

(1) यूनानियों द्वारा उल्लिखित पालीबोथ्रा को प्रस्सी राज्य की राजधानी बताया गया था, भारतवर्ष की या मगध राज्य की राजधानी नहीं। जहाँ तक पालीबोथ्रा के आसपास के गंगा क्षेत्र के ‘पालीबोथ्री‘ कहलाने और वहाँ के निवासियों के अपने नाम के साथ ‘पालीबोथ्री‘ जोड़ने की बात है, पाटलिपुत्र के साथ मिलान करने पर दोनों ही बातें मेल नहीं खाती क्योंकि वह सारा क्षेत्र मगध कहलाता था और सामान्यतः वहाँ का कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ अपने देश के नाम के अनुसार ‘मागधी‘ नहीं लगाता था।
(2) यूनानियों का पालीबोथ्रा नगर हरकुलिश-विष्णु का बसाया हुआ था। जबकि पाटलिपुत्र नगर सम्राट बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु द्वारा सैनिक दृष्टि से बसाया गया था। यह ठीक है कि कुछ स्थानों पर इस नगर के किसी अन्य व्यक्ति द्वारा बसाए जाने का उल्लेखभी मिलता है लेकिन अधिकतर विद्वान इसे अजातशत्रु द्वारा ही बसाया गया मानते हैं।
(3) यमुना नदी पालीबोथ्रा से होकर बहती थी और उसके एक ओर मथुरा तथा दूसरी ओर करिसोबोरा था किन्तु पाटलिपुत्र के आसपास तो क्या मीलों दूर तक यमुना नदी का न तो पहले ही पता था और न ही अब है।
(4) यूनानियों की कल्पना का भारत पालीबोथ्रा के आगे था क्योंकि उनके अनुसार पालीबोथ्रा में से होकर एक पथ भारत को जाता था। यदि ऐसा ही था तो क्या यूनानियों की दृष्टि में पाटलिपुत्र के पश्चिम में फैला इतना बड़ा भू-भाग, भारत नहीं था ? लेकिन ऐसा नहीं था क्योंकि विभिन्न यूनानी लेखकों ने अपनी रचनाओं में भारत की जो लम्बाई-चौड़ाई बताई है, वह पूरे भारत की माप है।
(5) सिन्धु पुलिन्द को प्रस्सी राज्य की सीमा पर बताया है। यदि पाटलिपुत्र से इसका सम्बन्ध जोड़ा जाए तो बिहार में कौन सा सिन्धु पुलिन्द था ? यह बात एकदम असंभव लगती है। महाभारत के अनुसार तो सिन्धु-पुलिन्दक उस समय अलग राज्य थे जो संभवतः भारत के मध्य क्षेत्र में थे-
चेदिवत्सः करुपाश्च भोजाः सिन्धुपुलिन्दकाः (म. भी. पर्व)
(6) पालीबोथ्रा को पाटलिपुत्र मान लेने पर न तो वहाँसे गंगा-यमुना का संगम 425 मील ही बनता है और न ही समुद्र तट से पाटलिपुत्र 738 मील ही बनता है। समुद्रसे पाटलिपुत्र की दूरी तभी निश्चित की जा सकती है, जब पालीबोथ्रा का स्थान निश्चित हो जाए।
(7) मेगस्थनीज के अनुसार पालीबोथ्रा गंगा और इरेन्नोबोस (Errannoboas / हिरण्यबाहु) के संगम पर बसा हुआ है, जबकि पाटलिपुत्र गंगा और सोन नदी के संगम पर बसा हुआ है। यूनानी लेखक एरियन ने लिखा है कि यह संगम प्रस्सी राज्य की सीमाओं में था और मेगस्थनीज के अनुसार प्रस्सी राज्य की सीमा सिन्धु पुलिन्द तक थी। अब कहाँ गंगा-जमुना का संगम, कहाँ गंगा और सोन का संगम और कहाँ सिन्धु-पुलिन्द, फिर इन सबके साथ पाटलिपुत्र का सम्बन्ध कैसे जोड़ा गया, यह सब बड़ा विचित्र लगता है।
उक्त सभी तथ्यों और अन्य बातों को देखते हुए ऐसा लगता है कि मेगस्थनीज या अन्य यूनानी लेखक भारत की सही भौगोलिक स्थिति को समझ पाने में असमर्थ रहे हैं।

#विशेष --
यूनानी इतिहासकार भले ही पाटलिपुत्र को मौर्य साम्राज्य की राजधानी मानते रहे हों किन्तु भारतीय पुराणों के अनुसार वह कभी भी मौर्यों की राजधानी नहीं रहा। पुराणों के अनुसार जब से मगध राज्य की स्थापना हुई थी तभी से अर्थात जरासन्ध के पिता बृहद्रथ के समय के पूर्व से ही मगध साम्राज्य की राजधानी गिरिब्रज (वर्तमान राजगृह) रही है। महाभारत युद्ध के पश्चात मगध साम्राज्य से सम्बंधित बार्हद्रथ, प्रद्योत, शिशुनाग, नन्द, मौर्य, शुंग, कण्व, आन्ध्र-आठों वंशों के समय में इसकी राजधानीगिरिब्रज ही रही है। पाटलिपुत्र की स्थापना तो शिशुनाग वंश के अजातशत्रु ने कराई थी और वह भीमात्र सैनिक दृष्टि से सुरक्षा के लिए

मैक्समूलर ने कहा है कि -

यह निश्चित हो चुका है कि हम सब पूर्व की ओर से आए हैं। इतना ही नहीं हमारे जीवन की जितनी भी प्रमुख और महत्त्वपूर्ण बातें हैं, सबकी सब हमें पूर्व से मिली हैं। ऐसी स्थिति में जब हम पूर्व की ओर जाएं तब हमें यह सोचना चाहिए कि पुरानी स्मृतियों को संजोए हम अपने पुराने घर की ओर जा रहे हैं।
(‘इण्डिया, व्हाट इट कैन टीच अस‘, पृ. 29)

कर्जन तो स्पष्ट रूप से कहता है कि- ‘‘गोरी जाति वालों का उद्गम स्थान भारत ही है।‘‘ (जनरल ऑफ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी‘, खण्ड 16, पृ.172-200)

#संदर्भित_ग्रन्थ_एवम_पुस्तके_डीक़्शनरी -
(1) वृहद भारत का इतिहास - भगवद्दत्त जी
(2) महावंस - प्रकाशन - वाराणसी बौद्ध साहित्य
3 इण्डिया, व्हाट इट कैन टीच अस
Greek-English/English-Greek dictionary, (यूनानी)
Translatum - The Greek translation Vortal (Dictionaries and terminology forum)
Greek Lexical Aids, descriptions of both online lexica (with appropriate links) and Greek Lexica in Print.
Wikipedia
Online Greek-English and English-Greek dictionary (Modern Greek)
Online Greek English Dictionary with gender and type of words

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