PART 13
PART 13
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----------------------- #जीवन_विज्ञान -----------------------
#16_संस्कारो_का_विज्ञान - #भाग - 03
किसी व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने के लिए शिक्षा, सत्संग, वातावरण, परिस्थिति, सूझ-बूझ आदि अनेक बातों की आवश्यकता होती है। सामान्यत: ऐसे ही माध्यमों से लोगों की मनोभूमि विकसित होती है। इसके अतिरिक्त भारतीय तत्व वेत्ताओं ने मनुष्य की अन्त:भूमि को श्रेष्ठता की दिशा में विकसिम करने के लिए कुछ ऐसे सूक्ष्म उपचारों का भी आविष्कार किया है जिनका प्रभाव शरीर तथा मन पर ही नहीं सूक्ष्म अन्त:करण पर भी पड़ता है और उसके प्रभाव से मनुष्य को गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से समुन्नत स्तर की ओर उठने में सहायता मिलती है। इसी आध्यात्मिक उपचार का नाम ‘संस्कार’ है। अब तक कि क्रमशः पिछली पोस्ट में आप सभी ने 4 संस्कारो को पढा अब आगे -
-------------------- #नामकरण_संस्कार --------------------
जन्म के दसवें या बारहवें दिन बच्चे का नाम रखा जाता है। इस संस्कार के समय माता, बालक को शुद्ध वस्त्र से ढ़ँककर एवं उसके सिर को जल से गीला कर पिता की गोद में देती है। इसके पश्चात् प्रजापति, तिथि, नक्षत्र तथा उनके देवताओं, अग्नि तथा सोम की आहुतियाँ दी जाती हैं। तत्पश्चात् पिता शिशु के दाहिने कान की ओर झुकता हुआ उसके नाम का उच्चारण करता है। और इस तरह इस नामकरण संस्कार पूर्ण करते है ,आमतौर से यह संस्कार जन्म के दसवें दिन किया जाता है, उस दिन जन्म सूतिका का निवारण-शुद्धिकरण भी किया जाता है। इसकी विधि का वैज्ञानिक लाभ भी है जिसकी पुष्टि विज्ञान भी करता है ।।
#वैज्ञानिक_दृष्टिकोण1 -
अमेरिका में गिलफर्ड कॉलेज में मनोवैज्ञानिक रिचर्ड कि माने तो अजीब या असामान्य नाम का कोई बुरा प्रभाव तो नहीं होता है लेकिन मानसिक स्थिति में काफी अंतर आ जाता है और नाम का असर व्यक्तित्व पर पड़ता है । वहीं न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्री कॉनली का कहना है कि असामान्य नाम वाले बच्चे अपनी उत्तेजना पर काबू पाना सीख जाते है। यानी कि नाम का असर बच्चे के सामाजिक जीवन पर जरूर पड़ता है ।
अंक ज्योतिष कहता है कि जिस तरह मूलांक और भाग्यांक व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं, उसी प्रकार नाम का भी उन पर काफी असर होता है। अंकशास्त्री बताते हैं कि नाम के पहले अक्षर का प्रभाव खास तौर से व्यक्तित्व और व्यवहार पर पड़ता है।
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य को जिस तरह के नाम से पुकारा जाता है, उसे उसी प्रकार की छोटी सी अनुभूति होती रहती है, यानि उसके स्वभाव पर नाम का असर होता है, यही कारण है कि जब जीवन में परेशानियां आती हैं तो लोग अपना नाम बदलते हैं
ताकि, नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके।
#संस्कार_का_विज्ञान - किसी भी ध्वनि के साथ एक आवृति भी जुड़ी होती इसका उदाहरण है कि जब हम ऑसिलोस्कोप यानी ध्वनि मापक यंत्र में अलग-अलग तरह की आवाजें भेजते हैं तो उसमें से हर बार आपको हर स्वर की अलग और एक खास आवृति मिलती है। मतलब ध्वनि के साथ उसकी आवृत्ति भी जुड़ी होती है और हर आवृत्ति का अपना प्रभाव होता है । जब एक बच्चे का जन्म होता है तो उस दिन और समय के हिसाब से लोग सौरमंडल की ज्यामितीय स्थिती की गणना करते हैं और इसके आधार पर एक ऐसी खास ध्वनि तय करते हैं जो नवजात बच्चे के लिए सर्वश्रेष्ठ हो। जिसका बच्चे पर पोसिटिव प्रभाव हो न कि नकारात्मक प्रभाव लेकिन आजकल के दौर में लोग न तो समय देना चाहते है ना वैदिक संस्कारो के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझना चाहते है ।
बच्चे का नाम उसकी पहचान के लिए नहीं रखा जाता। मनोविज्ञान एवं अक्षर-विज्ञान के जानकारों का मत है कि नाम का प्रभाव व्यक्ति के स्थूल-सूक्ष्म व्यक्तित्व पर गहराई से पड़ता रहता है। नाम सोच-समझकर तो रखा ही जाय, उसके साथ नाम रोशन करने वाले गुणों के विकास के प्रति जागरूक रहा जाय, यह जरूरी है।
--------------------- #निष्क्रमण_संस्कार --------------------
निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना, शिशु का नाम रख लिए जाने के बाद भी उसे कुछ दिनों के लिए मां के पास ही रखा जाता है, निष्क्रमण् संस्कार के तहत पहली बार नवजात शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है, विज्ञान भी इस बात को स्वीकार करता है कि यदि सुबह की ठंडी धूप और शाम को चंद्रमा की शीतल छाया नवजात पर पडती है तो वह पीलिया, टाइफाइड जैसे गंभीर रोगों से सुरक्षित रहता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है। उसे चौथे माह में बाहरी वातावरण में लाया जाता है और फिर धीरे-धीरे वह उसका आदि हो जाता है। निष्क्रमण संस्कार जातक के स्वास्थ्य व उसकी दीर्घायु की कामना के लिये किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णन भी मिलता है कि
“निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युदृष्टा मनीषिभि:”
#वैज्ञानिक_दृष्टिकोण - प्रकाश से लाभन्वित होने के लिए औसतन एक इनसान को 1,000 लक्स (प्रकाश की तीव्रता को मापने वाली इकाई) के संपर्क में रहने की जरूरत होती है। घर के अंदर लाइट 300 लक्स होती है।
सूरज की रोशनी का पांच फीसदी से भी कम हिस्सा इमारतों में पहुंच पाता है। और यह रोशनी एक लाख लक्स के बराबर होती है । प्रमुख शोधकर्ता रसेल फोस्टर कहते है, 'प्राकृतिक रोशनी के संपर्क में रहने से मस्तिष्क से सरोटोनिन हार्मोन का स्राव होता है। इसे हैप्पी हार्मोन भी कहते है। यह इनसान का मूड सुधारने और उसे खुशमिजाज बनाने के लिए जिम्मेदार होता है।'
वाटसन (Watson) ने जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के फिप्स क्लीनिक (Phipps Clinic of John Hopkins University) में किए गए अध्ययनों के आधार पर यह पाया कि शिशुओं के जन्मकाल से ही ये तीनों संवेग – भय क्रोध तथा प्रेम – विद्यमान रहते हैं । शिशु को अन्धकार से प्रकाश में लाया जाता है, तब उसकी शारीरिक क्रियाओं में कमी पाई जाती है, लेकिन इसके विपरीत उन्हें प्रकाश से अन्धकार में लाने पर क्रियाओं में वृद्धि होती है । प्रैट ने यह भी पाया कि 74'-88'तक के तापमान और आर्द्रता में 22-90% तक के बीच परिवर्तन लाने पर शिशुओं की शारीरिक क्रियाओं पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता । वैज्ञानिकों ने इस बात का भी पता लगाया हैं, कि नवजात शिशु के शरीर का कौनसा भाग अधिक क्रियाशील रहता है । उन्होंने पाया कि शिशु के शरीर के विभिन्न अंगों की क्रियाओं का औसत प्रतिशत इस प्रकार है- सिर में 4%, धड़ में 28%, बाँहों में 21% तथा पैरों में 27% । यानी प्रकाश और अंधकार का बच्चे पर असर पड़ता है पहली बार ।।
#संस्कार_विज्ञान -
निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान् भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो।
#विशेष -
संस्कारों के अध्ययन से पता चलता है कि उनका सम्बन्ध संपूर्ण मानव जीवन से रहा है। मानव जीवन एक महान रहस्य है। संस्कार इसके उद्भव, विकास और ह्रास होने की समस्याओं का समाधान करते थे। जीवन भी संसार की अन्य कलाओं के समान कला माना जाता है। उस कला की जानकारी तथा परिष्करण संस्कारों द्वारा होता था। संस्कार पशुता को भी मनुष्यता में परिणत कर देते थे।
जीवन एक चक्र माना गया है। यह वहीं आरम्भ होता है, जहाँ उसका अंत होता है। जन्म से मृत्यु पर्यंत जीवित रहने, विषय भोग तथा सुख प्राप्त करने, चिंतन करने तथा अंत में इस संसार से प्रस्थान करने की अनेक घटनाओं की श्रृंखला ही जीवन है। संस्कारों का सम्बन्ध जीवन की इन सभी घटनाओं से था।
क्रमशः
।। #धर्मसंस्थापनार्थाय_सम्भवामि_युगे_युगे ।।
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#16_संस्कारो_का_विज्ञान - #भाग - 03
किसी व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने के लिए शिक्षा, सत्संग, वातावरण, परिस्थिति, सूझ-बूझ आदि अनेक बातों की आवश्यकता होती है। सामान्यत: ऐसे ही माध्यमों से लोगों की मनोभूमि विकसित होती है। इसके अतिरिक्त भारतीय तत्व वेत्ताओं ने मनुष्य की अन्त:भूमि को श्रेष्ठता की दिशा में विकसिम करने के लिए कुछ ऐसे सूक्ष्म उपचारों का भी आविष्कार किया है जिनका प्रभाव शरीर तथा मन पर ही नहीं सूक्ष्म अन्त:करण पर भी पड़ता है और उसके प्रभाव से मनुष्य को गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से समुन्नत स्तर की ओर उठने में सहायता मिलती है। इसी आध्यात्मिक उपचार का नाम ‘संस्कार’ है। अब तक कि क्रमशः पिछली पोस्ट में आप सभी ने 4 संस्कारो को पढा अब आगे -
-------------------- #नामकरण_संस्कार --------------------
जन्म के दसवें या बारहवें दिन बच्चे का नाम रखा जाता है। इस संस्कार के समय माता, बालक को शुद्ध वस्त्र से ढ़ँककर एवं उसके सिर को जल से गीला कर पिता की गोद में देती है। इसके पश्चात् प्रजापति, तिथि, नक्षत्र तथा उनके देवताओं, अग्नि तथा सोम की आहुतियाँ दी जाती हैं। तत्पश्चात् पिता शिशु के दाहिने कान की ओर झुकता हुआ उसके नाम का उच्चारण करता है। और इस तरह इस नामकरण संस्कार पूर्ण करते है ,आमतौर से यह संस्कार जन्म के दसवें दिन किया जाता है, उस दिन जन्म सूतिका का निवारण-शुद्धिकरण भी किया जाता है। इसकी विधि का वैज्ञानिक लाभ भी है जिसकी पुष्टि विज्ञान भी करता है ।।
#वैज्ञानिक_दृष्टिकोण1 -
अमेरिका में गिलफर्ड कॉलेज में मनोवैज्ञानिक रिचर्ड कि माने तो अजीब या असामान्य नाम का कोई बुरा प्रभाव तो नहीं होता है लेकिन मानसिक स्थिति में काफी अंतर आ जाता है और नाम का असर व्यक्तित्व पर पड़ता है । वहीं न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्री कॉनली का कहना है कि असामान्य नाम वाले बच्चे अपनी उत्तेजना पर काबू पाना सीख जाते है। यानी कि नाम का असर बच्चे के सामाजिक जीवन पर जरूर पड़ता है ।
अंक ज्योतिष कहता है कि जिस तरह मूलांक और भाग्यांक व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं, उसी प्रकार नाम का भी उन पर काफी असर होता है। अंकशास्त्री बताते हैं कि नाम के पहले अक्षर का प्रभाव खास तौर से व्यक्तित्व और व्यवहार पर पड़ता है।
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य को जिस तरह के नाम से पुकारा जाता है, उसे उसी प्रकार की छोटी सी अनुभूति होती रहती है, यानि उसके स्वभाव पर नाम का असर होता है, यही कारण है कि जब जीवन में परेशानियां आती हैं तो लोग अपना नाम बदलते हैं
ताकि, नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके।
#संस्कार_का_विज्ञान - किसी भी ध्वनि के साथ एक आवृति भी जुड़ी होती इसका उदाहरण है कि जब हम ऑसिलोस्कोप यानी ध्वनि मापक यंत्र में अलग-अलग तरह की आवाजें भेजते हैं तो उसमें से हर बार आपको हर स्वर की अलग और एक खास आवृति मिलती है। मतलब ध्वनि के साथ उसकी आवृत्ति भी जुड़ी होती है और हर आवृत्ति का अपना प्रभाव होता है । जब एक बच्चे का जन्म होता है तो उस दिन और समय के हिसाब से लोग सौरमंडल की ज्यामितीय स्थिती की गणना करते हैं और इसके आधार पर एक ऐसी खास ध्वनि तय करते हैं जो नवजात बच्चे के लिए सर्वश्रेष्ठ हो। जिसका बच्चे पर पोसिटिव प्रभाव हो न कि नकारात्मक प्रभाव लेकिन आजकल के दौर में लोग न तो समय देना चाहते है ना वैदिक संस्कारो के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझना चाहते है ।
बच्चे का नाम उसकी पहचान के लिए नहीं रखा जाता। मनोविज्ञान एवं अक्षर-विज्ञान के जानकारों का मत है कि नाम का प्रभाव व्यक्ति के स्थूल-सूक्ष्म व्यक्तित्व पर गहराई से पड़ता रहता है। नाम सोच-समझकर तो रखा ही जाय, उसके साथ नाम रोशन करने वाले गुणों के विकास के प्रति जागरूक रहा जाय, यह जरूरी है।
--------------------- #निष्क्रमण_संस्कार --------------------
निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना, शिशु का नाम रख लिए जाने के बाद भी उसे कुछ दिनों के लिए मां के पास ही रखा जाता है, निष्क्रमण् संस्कार के तहत पहली बार नवजात शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है, विज्ञान भी इस बात को स्वीकार करता है कि यदि सुबह की ठंडी धूप और शाम को चंद्रमा की शीतल छाया नवजात पर पडती है तो वह पीलिया, टाइफाइड जैसे गंभीर रोगों से सुरक्षित रहता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है। उसे चौथे माह में बाहरी वातावरण में लाया जाता है और फिर धीरे-धीरे वह उसका आदि हो जाता है। निष्क्रमण संस्कार जातक के स्वास्थ्य व उसकी दीर्घायु की कामना के लिये किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णन भी मिलता है कि
“निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युदृष्टा मनीषिभि:”
#वैज्ञानिक_दृष्टिकोण - प्रकाश से लाभन्वित होने के लिए औसतन एक इनसान को 1,000 लक्स (प्रकाश की तीव्रता को मापने वाली इकाई) के संपर्क में रहने की जरूरत होती है। घर के अंदर लाइट 300 लक्स होती है।
सूरज की रोशनी का पांच फीसदी से भी कम हिस्सा इमारतों में पहुंच पाता है। और यह रोशनी एक लाख लक्स के बराबर होती है । प्रमुख शोधकर्ता रसेल फोस्टर कहते है, 'प्राकृतिक रोशनी के संपर्क में रहने से मस्तिष्क से सरोटोनिन हार्मोन का स्राव होता है। इसे हैप्पी हार्मोन भी कहते है। यह इनसान का मूड सुधारने और उसे खुशमिजाज बनाने के लिए जिम्मेदार होता है।'
वाटसन (Watson) ने जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के फिप्स क्लीनिक (Phipps Clinic of John Hopkins University) में किए गए अध्ययनों के आधार पर यह पाया कि शिशुओं के जन्मकाल से ही ये तीनों संवेग – भय क्रोध तथा प्रेम – विद्यमान रहते हैं । शिशु को अन्धकार से प्रकाश में लाया जाता है, तब उसकी शारीरिक क्रियाओं में कमी पाई जाती है, लेकिन इसके विपरीत उन्हें प्रकाश से अन्धकार में लाने पर क्रियाओं में वृद्धि होती है । प्रैट ने यह भी पाया कि 74'-88'तक के तापमान और आर्द्रता में 22-90% तक के बीच परिवर्तन लाने पर शिशुओं की शारीरिक क्रियाओं पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता । वैज्ञानिकों ने इस बात का भी पता लगाया हैं, कि नवजात शिशु के शरीर का कौनसा भाग अधिक क्रियाशील रहता है । उन्होंने पाया कि शिशु के शरीर के विभिन्न अंगों की क्रियाओं का औसत प्रतिशत इस प्रकार है- सिर में 4%, धड़ में 28%, बाँहों में 21% तथा पैरों में 27% । यानी प्रकाश और अंधकार का बच्चे पर असर पड़ता है पहली बार ।।
#संस्कार_विज्ञान -
निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान् भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो।
#विशेष -
संस्कारों के अध्ययन से पता चलता है कि उनका सम्बन्ध संपूर्ण मानव जीवन से रहा है। मानव जीवन एक महान रहस्य है। संस्कार इसके उद्भव, विकास और ह्रास होने की समस्याओं का समाधान करते थे। जीवन भी संसार की अन्य कलाओं के समान कला माना जाता है। उस कला की जानकारी तथा परिष्करण संस्कारों द्वारा होता था। संस्कार पशुता को भी मनुष्यता में परिणत कर देते थे।
जीवन एक चक्र माना गया है। यह वहीं आरम्भ होता है, जहाँ उसका अंत होता है। जन्म से मृत्यु पर्यंत जीवित रहने, विषय भोग तथा सुख प्राप्त करने, चिंतन करने तथा अंत में इस संसार से प्रस्थान करने की अनेक घटनाओं की श्रृंखला ही जीवन है। संस्कारों का सम्बन्ध जीवन की इन सभी घटनाओं से था।
क्रमशः
।। #धर्मसंस्थापनार्थाय_सम्भवामि_युगे_युगे ।।
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