BRAHMIN RAJVANSH PART 4
------------- #ब्राम्हण_राजवंश - #भाग - 03 --------------
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#शुंग_राजवंश
#राजवंश_समयकाल - 185ई.पू.-75 ई.पू. (112 वर्ष )
#संस्थापक - #पुष्यमित्र_शुंग ( भारद्वाज और कश्यप द्वैयमुष्यायन गोत्र )
----------------- #महाराज_वसुज्येष्ठ_शुंग -----------------
(141 - 131 ई. पू.)
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यह भारत वर्ष अफगानिस्तान के हिन्दुकुश पर्वतमाला से अरुणाचल की पर्वत माला और कश्मीर की हिमाल की चोटियों से कन्याकुमारी तक फैला था। दूसरी और यह हिन्दूकुश से अरब सागर तक और अरुणाचल से बर्मा तक फैला था। इसके अंतर्गत वर्तमान के अफगानिस्तान बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, बर्मा, श्रीलंका, थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया आदि देश आते थे। इसके प्रमाण आज भी मौजूद हैं। भारत के शासन का केंद्र हर काल में अलग-अलग रहा है, कभी पुरुषपुर (पेशावर), तो कभी हस्तिनापुर (मेरठ), तो कभी इंद्रप्रस्थ (दिल्ली), कभी मथुरा तो कभी विजय नगरम रहा।
इस भरत खंड में कुरु, पांचाल, पुण्ड्र, कलिंग, मगध, दक्षिणात्य, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर, अर्बुदगण, कारूष, मालव, पारियात्र, सौवीर, सन्धव, हूण, शाल्व, कोशल, मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण आदि रहते हैं। इसके पूर्वी भाग में किरात और पश्चिमी भाग में यवन बसे हुए थे।
बाद में भारत में कृष्ण के काल में ये जनपद रहे:-अंग, अवंति, अश्मक, कंबोज, काशी, कुरु, कोशल, गांधार, चेदि, पंचाल, मगध, मत्स्य, मल्ल, वज्जि, वत्स और शूरसेन। हर काल में ये जनपद बदलते रहे। लेकिन जिस व्यक्ति ने उक्त संपूर्ण जनपदों पर राज किया वही चक्रवर्ती सम्राट कहलाया।
मौर्य वंश का नौवां सम्राट वृहद्रथ जब मगध की गद्दी पर बैठा, तब उस समय तक आज का अफगानिस्तान, उत्तरी पाकिस्तान, कश्मीर, पंजाब और लगभग पूरा उत्तरी भारत बौद्ध बन चुका था। इसके अलावा भूटान, चीन, बर्मा, थाईलैंड आदि अनेक दूसरे राष्ट्र भी बौद्ध धर्म के झंडे तले आ चुके थे, वृहद्रथ के बाद जब पुष्यमित्र शुंग राजा बने तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी सम्पूर्ण भारत का एकीकरण करना , वृहद्रथ का जो शासन सिंधु के इस पार तक सिमटकर रह गया था उसे पुनः अपने राज्य में सम्मिलित करना। पुष्यमित्र का शासनकाल चुनौतियों से भरा हुआ था। उस समय भारत पर कई विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किए, जिनका सामना पुष्यमित्र शुंग को करना पड़ा। पुष्यमित्र चारों तरफ से बौद्ध, शाक्यों आदि सम्राटों से घिरा हुआ था। फिर भी राजा बन जाने पर मगध साम्राज्य को बहुत बल मिला , और इसमे उनका साथ दिया उनके प्रिय पुत्र अग्निमित्र ने , सभी विद्रोही राज्यों को हराने जिसमे से विदर्भ की जीत सबसे मुख्य रही उसके बाद अग्निमित्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों से हो रहे विदेशी आक्रमण को रोकना , और इसकी जिम्मेदारी उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र वशुज्येष्ठ सुंग को जिनको कही कही सुयेष्ठ भी कहा गया है । वशुज्येष्ठ का शब्दिक अर्थ होता है जो रत्नों में श्रेष्ठ हो और ये कहना उचित होगा कि वाकई शुंग वंश का ये कुलदीपक रत्नों में श्रेष्ठ ही था ।
इधर भारत मे शुंग वंश भारत के एकीकरण के लिए अपनी सीमा का विस्तार करता जा रहा था वही दूसरी ओर पारदेश्वर मिथ्रदात जिसने पार्थियन राजवंश की नींव रखी अपनी सीमा बढ़ाता भारत की ओर बढ़ता चला आ रहा था । ईरान के पूर्वी भाग में बौद्ध धर्म का प्रचार बहुत दिनों पहले से था। अगथाक्लीज नामक यूनानी राजा के सिक्के में जिसने ईरान के पूर्वी भाग में राज किया था, (ईसवी सन् 180 वर्ष पूर्व से 165 वर्ष पूर्व तक) एक बौद्ध स्तूप अंकित हैं। डिमिट्रियस के समय से यूनानियों ने भारतीय रीति-नीति ग्रहण की। उनके सिक्को पर भी भारतीय चिन्ह और अक्षर रहने लगे। काबुल प्रदेश उस समय हिन्दुस्तान में ही समझा जाता था। और वहाँ की भाषा हिन्दुस्तानी ही कही जाती थी। यूक्रेटाइडीज की मृत्यु के उपरान्त वाधीक, काम्बोज, शकस्थान (सीस्तान) आदि के यूनानी सरदार राज्य के लिए परस्पर लड़ने लगे। पारदेश्वर मिथ्रदात ने अच्छा अवसर देख वाधीक आदि भारत से लगे हुए प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। कुछ लेखकों ने लिखा है कि उसने पंजाब तक अपना अधिकार बढ़ा लिया था। पूर्व से छुट्टी पाकर उसने मद्र पर अधिकार किया और 140 ई.पू. में काबुल आदि डिमिट्रियस के बचे हुए प्रदेश को भी ले लिया। इस प्रकार सिकंदर द्वारा स्थापित पारस का यवन साम्राज्य नष्ट हुआ और पारद साम्राज्य की स्थापना हुई।
जब भारत मे पुष्यमित्र शुंग ने अश्वमेध यज्ञ किया और अपने घोड़े को छोड़ दिया कि ये जिस भी राज्य में जायेगा या तो उस राज्य का शासक शुंग वंश की अधीनता स्वीकार कर ले या फिर युद्ध करे , विदर्भ की जीत ने शुंगों का काम आसान कर दिया लेकिन जब ये विजय अश्व पारदेश्वर मिथ्रदात के शासित राज्य पंजाब पहुँचा तो इसे पकड़ लिया गया , सैनिको ने महाराज पुष्यमित्र शुंग को सूचना दी तो इस अश्व को छुड़ाने की जिम्मेदारी अग्निमित्र को मिली और अग्निमित्र ने अपने पुत्र वशुज्येष्ठ को मिथ्रदात से युद्ध के लिए भेजा जिस समय वशुज्येष्ठ युद्ध के लिए गए उस समय उनकी आयु मात्र 17 साल की थी , वशुज्येष्ठ के नेतृत्व में यवन सेना का भयंकर नरसंहार हुआ वो पंजाब हारकर पीछे हट गए ,अश्व छुड़ाने गए वशुज्येष्ठ ने पंजाब राज्य भी जीत लिया ।
#मालविकाग्निमित्रम् में कहा गया है कि, यज्ञभूमि से सेनापति पुष्यमित्र स्नेहालिंगन के पश्चात् विदिशा-स्थित कुमार अग्निमित्र को सूचित करता है कि मैंने राजसूय यज्ञ की दीक्षा लेकर सैकड़ों राजपुत्रों के साथ वसुमित्त की संरक्षता में एक वर्ष में और आने के नियम के अनुसार यज्ञ का अश्व बंधन से मुक्त कर दिया। सिन्धु नदी के दक्षिण तट पर विचरते हुए उस अश्व को यवनों ने पकड़ लिया। जिससे दोनों सेनाओं में घोर संग्राम हुआ। फिर वीर वसुमित्त ने शत्रुओं को परास्त कर मेरा उत्तम अश्व छुड़ा लिया। जैसे पौत्र अंशुमान के द्वारा वापस लाए हुए अश्व से राजा सगर ने, वैसे में भी अपने पौत्र द्वारा रक्षा किए हुए अश्व से यज्ञ किया। अतएव तुम्हें यज्ञ दर्शन के लिए वधू-जन-समेत शीघ्र आना चाहिए।
#चीन_और_वशुज्येष्ठ -
पंजाब की जीत के बाद सीमापवर्ती राज्यों को जीतते हुए वशुज्येष्ठ चीन के राज्यों को भी जीतना शुरू किया , उस समय चीन पर हान साम्राज्य का अधिकार था , वशुज्येष्ठ लगातार हान क्षेत्रों पर हमला कर रहे थे। वशुज्येष्ठ के हान सरदार के हारने पर (आज का तिब्बत) हान साम्राज्य उनसे समझौता करने पर मजबूर हो गया जिसमें एक हान चीनी राजकुमारी महाराज वशुज्येष्ठ से ब्याही गई। चीनी इतिहासग्रंथ महान इतिहासकार के अभिलेख में उसके लेखक सीमा चियान ने लिखा कि हान का सोचना था कि समय के साथ उस राजकुमारी का पुत्र शुंग साम्राज्य का राजा बनेगा और वह चीनी सम्राट को अपना नाना मानेगा। उसने कहा कि 'भला कभी कोई बच्चा अपने नाना पर हमला करता है क्या?' लेकिन ऐसा नहीं हुआ और ऐसे विवाहों के बावजूद हाथापाई जारी रही जिसमें कभी हान चीनियों का पलड़ा भारी होता था और कभी शुंग लोगों का। बाद में महाराज भागभद्र के समय शुंगों ने आक्रमण बन्द कर दिया ततपश्चात धीरे-धीरे हान साम्राज्य मध्य एशिया में फैला और तारिम द्रोणी तक पहुँच गया, जिस क्षेत्र में आगे चलकर यूरोप और एशिया के बीच का प्रसिद्ध रेशम मार्ग व्यापार के लिए स्थापित हुआ।
#चीन_पर_आक्रमण_का_रास्ता -
भारतीय प्रदेश अरुणाचल के रास्ते लोग चीन जाते थे और वहीं से आते थे। दूसरा आसान रास्ता था बर्मा। हालांकि लेह, लद्दाख, सिक्किम से भी लोग चीन आया-जाया करते थे, लेकिन तब तिब्बत को पार करना होता था। तिब्बत को प्राचीनकाल में #त्रिविष्टप कहा जाता था। और वशुज्येष्ठ ने यही तिब्बत के रास्ते ही जाकर चीन अधिकतर भागो को जीत लिया था ।।
#विशेष -
शुंग राजाओं का शासनकाल वैदिक अथवा ब्राह्मण धर्म के पुनर्जागरण का काल माना जाता है। वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान पुनः प्रारम्भ हुआ। स्वयं पुष्यमित्र ने दो अश्वमेध यज्ञ किये थे। वशुज्येष्ठ के शासन काल मे सनातन धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया गया। समाज में भागवत धर्म का उदय हुआ तथा वासुदेव विष्णु की उपासना प्रारम्भ हुई । मथुरा के समीप ‘मोरा’ नामक स्थान से प्राप्त प्रथम शताब्दी ई. के एक लेख से ज्ञात होता है कि ‘तोस’ नामक किसी विदेशी स्त्री ने संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न, शाम्ब तथा अनिरुद्ध की मूर्तियों की स्थापना की थी इसे वशुज्येष्ठ की पत्नी भी माना जाता है ।भागवत धर्म के साथ-साथ महेश्वर तथा पाशुपत सम्प्रदाय का भी प्रचार था लेकिन उन्होंने बौद्ध मतावलम्बियों को भी संरक्षण दिया। दिव्यावदान में कुछ बौद्धों को अमात्य के पद पर नियुक्त किया था। शुंगकाल में संस्कृत काव्य की भाषा न रहकर लोकभाषा में परिणत हो गई।महर्षि पतंजलि ने पाणिनि के सूत्रों पर एक महाभाष्य लिखा। मौर्यकाल एक दरबारी कला थी जिसका प्रधान विषय धर्म था। शुंग कला के विषय धार्मिक जीवन की अपेक्षा लौकिक जीवन से अधिक सम्बन्धित है। शुंगकाल के उत्कृष्ट नमूने मध्यप्रदेश के भरहुत सांची, बेसनगर तथा बिहार के बौद्ध गया से प्राप्त होते हैं। वशुज्येष्ठ शुंग ने अपना साम्राज्य तिब्बत तक फैलाया और तिब्बत भारत का अंग बन गया। वो बौद्धों को भगाता चीन तक ले गया। वहां चीन के सम्राट ने अपनी बेटी की शादी वशुज्येष्ठ से करके सन्धि की। उनके वंशज आज भी चीन में “शुंग” surname ही लिखते हैं।
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#शुंग_राजवंश
#राजवंश_समयकाल - 185ई.पू.-75 ई.पू. (112 वर्ष )
#संस्थापक - #पुष्यमित्र_शुंग ( भारद्वाज और कश्यप द्वैयमुष्यायन गोत्र )
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(141 - 131 ई. पू.)
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यह भारत वर्ष अफगानिस्तान के हिन्दुकुश पर्वतमाला से अरुणाचल की पर्वत माला और कश्मीर की हिमाल की चोटियों से कन्याकुमारी तक फैला था। दूसरी और यह हिन्दूकुश से अरब सागर तक और अरुणाचल से बर्मा तक फैला था। इसके अंतर्गत वर्तमान के अफगानिस्तान बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, बर्मा, श्रीलंका, थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया आदि देश आते थे। इसके प्रमाण आज भी मौजूद हैं। भारत के शासन का केंद्र हर काल में अलग-अलग रहा है, कभी पुरुषपुर (पेशावर), तो कभी हस्तिनापुर (मेरठ), तो कभी इंद्रप्रस्थ (दिल्ली), कभी मथुरा तो कभी विजय नगरम रहा।
इस भरत खंड में कुरु, पांचाल, पुण्ड्र, कलिंग, मगध, दक्षिणात्य, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर, अर्बुदगण, कारूष, मालव, पारियात्र, सौवीर, सन्धव, हूण, शाल्व, कोशल, मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण आदि रहते हैं। इसके पूर्वी भाग में किरात और पश्चिमी भाग में यवन बसे हुए थे।
बाद में भारत में कृष्ण के काल में ये जनपद रहे:-अंग, अवंति, अश्मक, कंबोज, काशी, कुरु, कोशल, गांधार, चेदि, पंचाल, मगध, मत्स्य, मल्ल, वज्जि, वत्स और शूरसेन। हर काल में ये जनपद बदलते रहे। लेकिन जिस व्यक्ति ने उक्त संपूर्ण जनपदों पर राज किया वही चक्रवर्ती सम्राट कहलाया।
मौर्य वंश का नौवां सम्राट वृहद्रथ जब मगध की गद्दी पर बैठा, तब उस समय तक आज का अफगानिस्तान, उत्तरी पाकिस्तान, कश्मीर, पंजाब और लगभग पूरा उत्तरी भारत बौद्ध बन चुका था। इसके अलावा भूटान, चीन, बर्मा, थाईलैंड आदि अनेक दूसरे राष्ट्र भी बौद्ध धर्म के झंडे तले आ चुके थे, वृहद्रथ के बाद जब पुष्यमित्र शुंग राजा बने तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी सम्पूर्ण भारत का एकीकरण करना , वृहद्रथ का जो शासन सिंधु के इस पार तक सिमटकर रह गया था उसे पुनः अपने राज्य में सम्मिलित करना। पुष्यमित्र का शासनकाल चुनौतियों से भरा हुआ था। उस समय भारत पर कई विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किए, जिनका सामना पुष्यमित्र शुंग को करना पड़ा। पुष्यमित्र चारों तरफ से बौद्ध, शाक्यों आदि सम्राटों से घिरा हुआ था। फिर भी राजा बन जाने पर मगध साम्राज्य को बहुत बल मिला , और इसमे उनका साथ दिया उनके प्रिय पुत्र अग्निमित्र ने , सभी विद्रोही राज्यों को हराने जिसमे से विदर्भ की जीत सबसे मुख्य रही उसके बाद अग्निमित्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों से हो रहे विदेशी आक्रमण को रोकना , और इसकी जिम्मेदारी उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र वशुज्येष्ठ सुंग को जिनको कही कही सुयेष्ठ भी कहा गया है । वशुज्येष्ठ का शब्दिक अर्थ होता है जो रत्नों में श्रेष्ठ हो और ये कहना उचित होगा कि वाकई शुंग वंश का ये कुलदीपक रत्नों में श्रेष्ठ ही था ।
इधर भारत मे शुंग वंश भारत के एकीकरण के लिए अपनी सीमा का विस्तार करता जा रहा था वही दूसरी ओर पारदेश्वर मिथ्रदात जिसने पार्थियन राजवंश की नींव रखी अपनी सीमा बढ़ाता भारत की ओर बढ़ता चला आ रहा था । ईरान के पूर्वी भाग में बौद्ध धर्म का प्रचार बहुत दिनों पहले से था। अगथाक्लीज नामक यूनानी राजा के सिक्के में जिसने ईरान के पूर्वी भाग में राज किया था, (ईसवी सन् 180 वर्ष पूर्व से 165 वर्ष पूर्व तक) एक बौद्ध स्तूप अंकित हैं। डिमिट्रियस के समय से यूनानियों ने भारतीय रीति-नीति ग्रहण की। उनके सिक्को पर भी भारतीय चिन्ह और अक्षर रहने लगे। काबुल प्रदेश उस समय हिन्दुस्तान में ही समझा जाता था। और वहाँ की भाषा हिन्दुस्तानी ही कही जाती थी। यूक्रेटाइडीज की मृत्यु के उपरान्त वाधीक, काम्बोज, शकस्थान (सीस्तान) आदि के यूनानी सरदार राज्य के लिए परस्पर लड़ने लगे। पारदेश्वर मिथ्रदात ने अच्छा अवसर देख वाधीक आदि भारत से लगे हुए प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। कुछ लेखकों ने लिखा है कि उसने पंजाब तक अपना अधिकार बढ़ा लिया था। पूर्व से छुट्टी पाकर उसने मद्र पर अधिकार किया और 140 ई.पू. में काबुल आदि डिमिट्रियस के बचे हुए प्रदेश को भी ले लिया। इस प्रकार सिकंदर द्वारा स्थापित पारस का यवन साम्राज्य नष्ट हुआ और पारद साम्राज्य की स्थापना हुई।
जब भारत मे पुष्यमित्र शुंग ने अश्वमेध यज्ञ किया और अपने घोड़े को छोड़ दिया कि ये जिस भी राज्य में जायेगा या तो उस राज्य का शासक शुंग वंश की अधीनता स्वीकार कर ले या फिर युद्ध करे , विदर्भ की जीत ने शुंगों का काम आसान कर दिया लेकिन जब ये विजय अश्व पारदेश्वर मिथ्रदात के शासित राज्य पंजाब पहुँचा तो इसे पकड़ लिया गया , सैनिको ने महाराज पुष्यमित्र शुंग को सूचना दी तो इस अश्व को छुड़ाने की जिम्मेदारी अग्निमित्र को मिली और अग्निमित्र ने अपने पुत्र वशुज्येष्ठ को मिथ्रदात से युद्ध के लिए भेजा जिस समय वशुज्येष्ठ युद्ध के लिए गए उस समय उनकी आयु मात्र 17 साल की थी , वशुज्येष्ठ के नेतृत्व में यवन सेना का भयंकर नरसंहार हुआ वो पंजाब हारकर पीछे हट गए ,अश्व छुड़ाने गए वशुज्येष्ठ ने पंजाब राज्य भी जीत लिया ।
#मालविकाग्निमित्रम् में कहा गया है कि, यज्ञभूमि से सेनापति पुष्यमित्र स्नेहालिंगन के पश्चात् विदिशा-स्थित कुमार अग्निमित्र को सूचित करता है कि मैंने राजसूय यज्ञ की दीक्षा लेकर सैकड़ों राजपुत्रों के साथ वसुमित्त की संरक्षता में एक वर्ष में और आने के नियम के अनुसार यज्ञ का अश्व बंधन से मुक्त कर दिया। सिन्धु नदी के दक्षिण तट पर विचरते हुए उस अश्व को यवनों ने पकड़ लिया। जिससे दोनों सेनाओं में घोर संग्राम हुआ। फिर वीर वसुमित्त ने शत्रुओं को परास्त कर मेरा उत्तम अश्व छुड़ा लिया। जैसे पौत्र अंशुमान के द्वारा वापस लाए हुए अश्व से राजा सगर ने, वैसे में भी अपने पौत्र द्वारा रक्षा किए हुए अश्व से यज्ञ किया। अतएव तुम्हें यज्ञ दर्शन के लिए वधू-जन-समेत शीघ्र आना चाहिए।
#चीन_और_वशुज्येष्ठ -
पंजाब की जीत के बाद सीमापवर्ती राज्यों को जीतते हुए वशुज्येष्ठ चीन के राज्यों को भी जीतना शुरू किया , उस समय चीन पर हान साम्राज्य का अधिकार था , वशुज्येष्ठ लगातार हान क्षेत्रों पर हमला कर रहे थे। वशुज्येष्ठ के हान सरदार के हारने पर (आज का तिब्बत) हान साम्राज्य उनसे समझौता करने पर मजबूर हो गया जिसमें एक हान चीनी राजकुमारी महाराज वशुज्येष्ठ से ब्याही गई। चीनी इतिहासग्रंथ महान इतिहासकार के अभिलेख में उसके लेखक सीमा चियान ने लिखा कि हान का सोचना था कि समय के साथ उस राजकुमारी का पुत्र शुंग साम्राज्य का राजा बनेगा और वह चीनी सम्राट को अपना नाना मानेगा। उसने कहा कि 'भला कभी कोई बच्चा अपने नाना पर हमला करता है क्या?' लेकिन ऐसा नहीं हुआ और ऐसे विवाहों के बावजूद हाथापाई जारी रही जिसमें कभी हान चीनियों का पलड़ा भारी होता था और कभी शुंग लोगों का। बाद में महाराज भागभद्र के समय शुंगों ने आक्रमण बन्द कर दिया ततपश्चात धीरे-धीरे हान साम्राज्य मध्य एशिया में फैला और तारिम द्रोणी तक पहुँच गया, जिस क्षेत्र में आगे चलकर यूरोप और एशिया के बीच का प्रसिद्ध रेशम मार्ग व्यापार के लिए स्थापित हुआ।
#चीन_पर_आक्रमण_का_रास्ता -
भारतीय प्रदेश अरुणाचल के रास्ते लोग चीन जाते थे और वहीं से आते थे। दूसरा आसान रास्ता था बर्मा। हालांकि लेह, लद्दाख, सिक्किम से भी लोग चीन आया-जाया करते थे, लेकिन तब तिब्बत को पार करना होता था। तिब्बत को प्राचीनकाल में #त्रिविष्टप कहा जाता था। और वशुज्येष्ठ ने यही तिब्बत के रास्ते ही जाकर चीन अधिकतर भागो को जीत लिया था ।।
#विशेष -
शुंग राजाओं का शासनकाल वैदिक अथवा ब्राह्मण धर्म के पुनर्जागरण का काल माना जाता है। वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान पुनः प्रारम्भ हुआ। स्वयं पुष्यमित्र ने दो अश्वमेध यज्ञ किये थे। वशुज्येष्ठ के शासन काल मे सनातन धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया गया। समाज में भागवत धर्म का उदय हुआ तथा वासुदेव विष्णु की उपासना प्रारम्भ हुई । मथुरा के समीप ‘मोरा’ नामक स्थान से प्राप्त प्रथम शताब्दी ई. के एक लेख से ज्ञात होता है कि ‘तोस’ नामक किसी विदेशी स्त्री ने संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न, शाम्ब तथा अनिरुद्ध की मूर्तियों की स्थापना की थी इसे वशुज्येष्ठ की पत्नी भी माना जाता है ।भागवत धर्म के साथ-साथ महेश्वर तथा पाशुपत सम्प्रदाय का भी प्रचार था लेकिन उन्होंने बौद्ध मतावलम्बियों को भी संरक्षण दिया। दिव्यावदान में कुछ बौद्धों को अमात्य के पद पर नियुक्त किया था। शुंगकाल में संस्कृत काव्य की भाषा न रहकर लोकभाषा में परिणत हो गई।महर्षि पतंजलि ने पाणिनि के सूत्रों पर एक महाभाष्य लिखा। मौर्यकाल एक दरबारी कला थी जिसका प्रधान विषय धर्म था। शुंग कला के विषय धार्मिक जीवन की अपेक्षा लौकिक जीवन से अधिक सम्बन्धित है। शुंगकाल के उत्कृष्ट नमूने मध्यप्रदेश के भरहुत सांची, बेसनगर तथा बिहार के बौद्ध गया से प्राप्त होते हैं। वशुज्येष्ठ शुंग ने अपना साम्राज्य तिब्बत तक फैलाया और तिब्बत भारत का अंग बन गया। वो बौद्धों को भगाता चीन तक ले गया। वहां चीन के सम्राट ने अपनी बेटी की शादी वशुज्येष्ठ से करके सन्धि की। उनके वंशज आज भी चीन में “शुंग” surname ही लिखते हैं।
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